मणिपुर टेप्स: सुप्रीम कोर्ट ने फॉरेंसिक रिपोर्ट जमा करने में देरी पर केंद्र सरकार से सवाल किए

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के कथित ऑडियो टेप की प्रामाणिकता की फॉरेंसिक रिपोर्ट अदालत द्वारा मांगे जाने के तीन महीने बाद भी क्यों नहीं जमा की गई है. अदालत ने मई में रिपोर्ट जमा करने के लिए कहा था. अब केंद्र ने यह कहते हुए कि रिपोर्ट तैयार नहीं है, अतिरिक्त समय मांगा है.

कुकी ऑर्गनाइज़ेशन फॉर ह्यूमन राइट्स (कोहूर) ने एक हलफनामा में आरोप लगाया है कि मणिपुर पुलिस ने पूरी 48 मिनट 46 सेकंड की रिकॉर्डिंग के बजाय बहुत ज़्यादा काटे गए ऑडियो क्लिप्स फोरेंसिक जांच के लिए भेजे. (फोटो: पीटीआई और एक्स)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 जुलाई) को केंद्र सरकार से पूछा कि मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के कथित ऑडियो टेप की प्रामाणिकता की फॉरेंसिक रिपोर्ट अदालत द्वारा मांगे जाने के तीन महीने बाद भी क्यों नहीं जमा की गई है.

इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पीवी संजय कुमार और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से यह सवाल पूछा, जब मेहता ने अदालत को बताया कि फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (सीएसएल) को सौंपे गए टेप तैयार नहीं हैं और उन्होंने दो हफ्ते का समय और मांगा.

पीठ ने मेहता से पूछा, ‘फॉरेंसिक रिपोर्ट का क्या हुआ? कम से कम वह तो आ जानी चाहिए थी. यह आदेश मई 2025 में पारित किया गया था. तीन महीने बीत चुके हैं. अब तक फॉरेंसिक रिपोर्ट लैब ने आपको रिपोर्ट दे दी होगी. कम से कम हमें यह तो बताइए कि रिपोर्ट आ गई है या अभी भी पाइपलाइन में है.’

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, जब मेहता ने जवाब दिया कि रिपोर्ट अभी नहीं आई है, तो जस्टिस कुमार ने पूछा, ‘सीएफएसएल को आवाज़ के विश्लेषण पर एक निश्चित रिपोर्ट देने में कितना समय लगेगा? हम इसे पास कर देंगे. यह अंतहीन नहीं चल सकता.’

पिछली सुनवाई में 5 मई को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और जस्टिस कुमार की पीठ ने मेहता से कहा था कि अगर कोई व्यक्ति उत्तर-पूर्वी सीमावर्ती राज्य में कुकी-मेईतेई जातीय हिंसा से संबंधित किसी भी गलत काम में शामिल पाया जाता है, तो उसे संरक्षण देने की कोई आवश्यकता नहीं है.

अदालत की यह टिप्पणी मेहता द्वारा याचिकाकर्ता, कुकी ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स ट्रस्ट (कोहूर) की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के बाद आई थी.

कोहूर ने ऑडियो टेप की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें एन. बीरेन सिंह जैसी आवाज़ सुनाई दे रही थी और दावा किया था कि जातीय हिंसा भड़कने के पीछे उनका हाथ है.

इस हिंसा में कम से कम 250 से अधिक लोग मारे गए और कई घायल हुए, साथ ही दोनों समुदायों के 50,000 से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए, जिनमें से ज़्यादातर अभी भी राज्य भर के विभिन्न राहत शिविरों में शरण लिए हुए हैं. इसी फरवरी में केंद्र सरकार ने राज्य में छह महीने के लिए राष्ट्रपति शासन लागू किया था और इस महीने इसे छह महीने के लिए और बढ़ा दिया है.

बीरेन सिंह के कार्यालय ने तब दावा किया था कि ऑडियो टेप प्रामाणिक नहीं हैं और उनका उपयोग करने वाले मीडिया संगठनों और अन्य लोगों के खिलाफ कार्रवाई की धमकी दी थी.

हालांकि, कोहूर की याचिका पर कार्रवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 में टेपों की जांच करने पर सहमति जताई थी. तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता से टेपों की प्रामाणिकता प्रमाणित करने को कहा था.

उल्लेखनीय है कि मणिपुर में हिंसा पर केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित जांच आयोग को सौंपी गई ऑडियो रिकॉर्डिंग– जो 2023 में बीरेन के आधिकारिक आवास पर हुई एक बैठक की है- के बारे में पिछले साल की शुरुआत में द वायर की संगीता बरुआ पिशारोती ने रिपोर्ट की एक श्रृंखला लिखी थी.

हालांकि द वायर यह स्वतंत्र तौर पर रिकॉर्डिंग में आ रही आवाज के वास्तव में बीरेन सिंह के होने की पुष्टि नहीं कर पाया था, लेकिन उस मीटिंग में शामिल कुछ लोगों से स्वतंत्र तौर पर इस मीटिंग की तारीख, इसके विषय और इसमें की गई बातों पुष्टि की है. उनमें से कोई भी अपनी सुरक्षा पर खतरे के डर से पहचान को उजागर नहीं करना चाहता था.

ऑडियो रिकॉर्डिंग इस संवाददाता को कुछ लोगों ने दी थी, जिन्होंने बताया था कि उन्होंने सिंह से जुड़े आधिकारिक परिसर में इसे रिकॉर्ड किया था. उन्होंने बताया था कि इसकी एक प्रति सेवानिवृत्त जस्टिस अजय लांबा को सौंपी गई थी, जो मणिपुर हिंसा पर न्यायिक आयोग के अध्यक्ष हैं. आयोग का गठन गृह मंत्रालय ने 3 मई, 2024 से शुरू हुई हिंसा की जांच के लिए किया था.

इसके तुरंत बाद कुकी ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स ट्रस्ट (केओएचयूआर) ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर ऑडियो टेप की अदालत की निगरानी में जांच की मांग की थी.

इसके बाद याचिकाकर्ता ने इसकी प्रामाणिकता के लिए एक अत्यंत प्रतिष्ठित निजी लैब, ट्रुथ लैब से संपर्क किया, जिसके रिपोर्ट में कहा गया था कि क्लिप और बीरेन सिंह की आवाज के नमूनों में 93% समानता है. और इस बात की ‘बहुत संभावना’ है कि वे एक ही आवाज हैं.

हालांकि, सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल मेहता ने एक सरकारी प्रयोगशाला द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुत करने का अनुरोध किया, जिसकी अनुमति दे दी गई. अप्रैल में सरकार ने अतिरिक्त समय मांगा क्योंकि उस दिन सॉलिसिटर जनरल रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए उपलब्ध नहीं थे. मेहता वक्फ (संशोधन) अधिनियम की सुनवाई में एक अन्य अदालत में व्यस्त थे.

मेहता ने सोमवार को शीर्ष अदालत को बताया कि रिपोर्ट तैयार नहीं है, जबकि सॉलिसिटर जनरल की अनुपस्थिति में 17 अप्रैल को सरकार की ओर से पेश हुए वकील ने अदालत को बताया था कि रिपोर्ट तैयार है.

मई में इस मामले में पेश होते हुए मेहता ने पीठ को एक सीलबंद लिफाफा सौंपा, जिसमें कहा गया था, ‘मामले को और बढ़ाने के बजाय, जांच जारी रहने दी जाए. हमारे पास सीलबंद लिफ़ाफ़े में एफएसएल रिपोर्ट है, हाईकोर्ट भी इसकी जांच कर सकता है. शांति कायम है.’

हालांकि, रिपोर्ट पढ़ने के बाद अदालत ने कहा था, ‘मेहता, आपको कार्यालयों से बात करनी होगी, कृपया कार्यालयों से बात करें… यह एफएसएल रिपोर्ट क्या है?’

जवाब में मेहता ने कहा था कि उन्होंने रिपोर्ट की विषय-वस्तु की जांच नहीं की है. इसके बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने जवाब दिया था: ‘विषय-वस्तु पढ़ें और फिर अधिकारियों से बात करें, कृपया जांच करें और एक नई रिपोर्ट लाएं.’

इसके बाद पीठ ने सरकार से कहा कि वह 21 जुलाई से शुरू होने वाले सप्ताह में एक नई एफएसएल रिपोर्ट पेश करे.

हालांकि, सोमवार को जस्टिस कुमार और जस्टिस शर्मा की पीठ के समक्ष खड़े होकर मेहता ने कहा कि रिपोर्ट तैयार नहीं है और उन्होंने और समय मांगा. अदालत ने सरकार द्वारा मांगा गया समय मंजूर कर लिया है और मामले को 19 अगस्त के लिए सूचीबद्ध करने को कहा है.

इस बीच, कोहूर के अध्यक्ष एचएस बेंजामिन मेट ने द वायर को बताया, ‘कुकी-ज़ो समुदाय को अभूतपूर्व हिंसा सहते हुए दो साल से ज़्यादा हो गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप जान-माल का भारी नुकसान हुआ है और लोग विस्थापित हुए हैं. तत्कालीन मुख्यमंत्री बीरेन सिंह पर समुदाय के खिलाफ जातीय नरसंहार की घटनाओं में शामिल होने के प्रथमदृष्टया सबूत मौजूद होने के बावजूद, उन्हें माननीय न्यायालय द्वारा संरक्षण नहीं दिया जा रहा है. ‘न्याय में देरी न्याय से इनकार के समान है’ की कहावत के मद्देनजर, हम माननीय न्यायालय से इस मामले को सर्वोच्च प्राथमिकता और शीघ्रता से निपटाने का अनुरोध करते हैं.’

उन्होंने कहा कि अदालत का हस्तक्षेप अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ जातीय सफाए को रोकने में सहायक है.

उन्होंने आगे कहा, ‘हमने जातीय नरसंहार में सरकार की कथित मिलीभगत की माननीय न्यायालय की निगरानी में गहन जांच की मांग की है. यह ऑडियो टेप कुकी-ज़ो समुदाय को वह प्रक्रियात्मक न्याय दिलाने में एक महत्वपूर्ण सबूत है जिसके वे इस देश के वास्तविक नागरिक होने के नाते हकदार हैं.’