नई दिल्ली: असम सरकार नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) का हवाला देते हुए ने जिला अधिकारियों और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल्स (एफटी अथवा विदेशी न्यायाधिकरण) के सदस्यों से अनुरोध किया है कि वे 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले राज्य में प्रवेश करने वाले छह समुदायों – हिंदू, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी – के सदस्यों के खिलाफ मामले वापस लें.
स्क्रोल डॉट इन की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के गृह एवं राजनीतिक विभाग ने 17 जुलाई को एक बैठक की और सीएए के संदर्भ में विदेशी न्यायाधिकरण से संबंधित मुद्दों और मामलों को वापस लेने पर चर्चा की. यह बैठक असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा के निर्देश के बाद आयोजित की गई थी.
मालूम हो कि सीएए का उद्देश्य बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान से आए छह अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों (मुसलमानों को छोड़कर) के शरणार्थियों को नागरिकता का प्रदान करना है, बशर्ते कि वे छह साल तक भारत में रहे हों और 31 दिसंबर, 2014 तक देश में प्रवेश कर चुके हों.
इस कानून को दिसंबर 2019 में संसद द्वारा पारित किया गया था. केंद्र सरकार ने मार्च 2024 में अधिनियम के तहत नियमों को अधिसूचित किया.
ज्ञात हो कि असम में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल्स अर्ध-न्यायिक निकाय हैं जो वंश और 1971 की कट-ऑफ तिथि के आधार पर नागरिकता के मामलों पर निर्णय लेते हैं. वे मुख्य रूप से 1971 से पहले असम या भारत में अपने परिवार के निवास को स्थापित करने के लिए व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों पर निर्भर करते हैं.
उल्लेखनीय है कि न्यायाधिकरणों पर मनमानी और पक्षपात करने तथा मामूली वर्तनी की गलतियों, दस्तावेजों की कमी जैसे चूक के आधार पर लोगों को विदेशी घोषित करने का आरोप लगते रहे हैं.
स्क्रोल के अनुसार, अब तक विदेशी घोषित किए गए 1.6 लाख लोगों में से 69,500 से अधिक हिंदू हैं.
गृह विभाग, जिसके अंतर्गत सीमा पुलिस और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल्स कार्य करते हैं, ने जिला आयुक्तों, पुलिस प्रमुखों और न्यायाधिकरणों के सदस्यों को इस मामले में की गई कार्रवाई की रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया.
गृह एवं राजनीतिक विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अजय तिवारी द्वारा हस्ताक्षरित बैठक के विवरण में कहा गया है, ‘नागरिकता अधिनियम में किए गए संशोधनों के अनुसार, एफटी को छह निर्दिष्ट समुदायों (हिंदू, ईसाई, बौद्ध, सिख, पारसी और जैन समुदाय) से संबंधित विदेशियों, जिन्होंने 31.12.2014 को या उससे पहले असम में प्रवेश किया था, के मामलों को आगे नहीं बढ़ाना है.’
इसमें आगे कहा गया, ‘ऐसे सभी मामलों को समाप्त करने का सुझाव दिया गया.’
इसमें आगे कहा गया: ‘इस संबंध में जिला आयुक्त और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को तुरंत अपने-अपने एफटी सदस्यों के साथ बैठक करनी चाहिए और समय-समय पर घटनाक्रम की समीक्षा करनी चाहिए और इस विभाग को कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करनी चाहिए.’
जिला अधिकारियों को भेजी गई अधिसूचना में कहा गया है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने हेतु ‘विदेशियों को प्रोत्साहित और समर्थन’ दिया जाना चाहिए.
इसने यह भी उल्लेख किया कि असम सरकार ने गोरखा और कोच-राजबोंगशी समुदायों के लोगों के खिलाफ दर्ज सभी मामलों को वापस लेने के लिए ‘स्पष्ट’ निर्देश जारी किए हैं. सरकार ने कहा, ‘इसका तुरंत पालन किया जाना चाहिए.’
इससे पहले जुलाई 2024 में असम सरकार ने राज्य की सीमा पुलिस से कहा था कि वे 2014 से पहले अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने वाले गैर-मुस्लिमों के मामलों को विदेशी न्यायाधिकरणों को न भेजें.
सीमा पुलिस, जो नागरिकता के मामलों की जांच करती है, को उस समय असम गृह विभाग द्वारा बताया गया था कि छह समुदायों के अनिर्दिष्ट प्रवासियों को नागरिकता संशोधन अधिनियम पोर्टल पर नागरिकता के लिए आवेदन करने की ‘सलाह’ दी जानी चाहिए, और उनके मामलों का निर्णय केंद्र सरकार द्वारा किया जाएगा.
शर्मा ने उस समय कहा था कि मौजूदा मामले वापस नहीं लिए जाएंगे.
असमिया राष्ट्रवादी ‘अवैध प्रवासियों’ को, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, राज्य की संस्कृति और संसाधनों के लिए खतरा मानते हैं.
सीएए के खिलाफ 2019 और 2020 में असम और देश के कई अन्य हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए थे. हालांकि, संशोधित कानून का असम के बंगाली हिंदुओं ने स्वागत किया था.
मार्च 2024 में मुख्यमंत्री शर्मा ने कहा था कि पांच लाख बंगाली हिंदू, दो लाख असमिया हिंदू समूह – कोच-राजबोंगशी, दास, कलीता और शर्मा (असमिया), और 1.5 लाख गोरखाओं को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से बाहर रखा गया है.
मुख्यमंत्री ने यह भी दावा किया था कि रजिस्टर से बाहर किए गए 19 लाख लोगों में सात लाख मुसलमान भी शामिल हैं.
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने दावा किया था कि असम में रजिस्टर से बाहर किए गए हिंदू संशोधित कानून के तहत नागरिकता प्राप्त कर सकेंगे. ऐसी आशंकाएं जताई जा रही हैं कि इस तरह की कवायद में केवल मुसलमान ही अपनी नागरिकता खो देंगे.
सरकार के इस कदम का विरोध
सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (एएएसयू) जैसे संगठनों ने इस कदम का कड़ा विरोध किया है.
उनका तर्क है कि यह 1971 के असम समझौते को कमजोर करता है, जिसमें अवैध प्रवासियों का पता लगाने और उन्हें निर्वासित करने की समयसीमा 24 मार्च, 1985 तय की गई थी, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो.
मूलनिवासी समूहों ने चेतावनी दी है कि इन मानदंडों में ढील देने से असम में जनसांख्यिकीय परिवर्तन तेज़ हो सकते हैं.
