इधर ऐसे लोगों और संस्थाओं की संख्या बढ़ी है जो वैदिक ज्ञान, वैदिक संपदा, वैदिक गणित आदि का ज़िक्र बहुत करते हैं जिन्होंने कभी जतन और ध्यान से वेद पढ़े नहीं हैं. एक लोकप्रिय मिथक यह भी है कि वेदों में सब कुछ है कि सब कुछ वेदों से ही शुरू हुआ, और उसी में समाहित है. कुछ अनुष्ठानों आदि को भी जब-तब उनकी वैधता और प्रामाणिकता के लिए वेदों से जोड़ा जाता है.
हालांकि आदिकवि हमारे यहां वाल्मीकि को माना जाता है, वैदिक ऋषि, जिनमें कई ऋषिकाएं और संभवतः आदिवासी ऋषि भी शामिल हैं, हमारे आदिकवि हैं: ऋग्वेद हमारा प्रथम काव्यग्रंथ है. ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 112 सूक्तों का कवि-विद्वान् मुकुन्द लाठ द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद ‘स्वस्ति’ शीर्षक से रज़ा पुस्तकमाला के अंतर्गत सेतु प्रकाशन से इसी सप्ताह आया है.
दुर्भाग्य है कि मुकुन्द जी के जीवनकाल में यह प्रकाशित नहीं हो पाया. ऋग्वेद में स्तुति, आह्वान, आवाहन, आद्यबिम्ब आदि कविता के अनेक रूप हैं. लगता है कि यह कविता देवताओं और प्रकृति के पंच तत्वों से, ज्ञात-अज्ञात शक्तियों से समीपता, सहचारिता और सान्निध्य की कोशिश में लगी कविता है.
यह अलक्षित नहीं जा सकता कि एक वैदिक कवि विधाता से कहता है कि ‘यह जगत् काव्य है तुम्हारा’. इस काव्य में पवित्रता और पदार्थमयता का, पारलौकिकता और इहलौकिकता का, प्राकृतिक और दिव्य का जो सम्गुंफन है वह उसे जो ऊंचाई और उज्ज्वलता देता है वे अपनी ऊष्मा और आशय में बेहद मानवीय हैं. उसमें ‘प्रथमता’ का आत्मविश्वास और परिष्कार का निष्कलंक आभा दोनों साथ हैं.
इस विपुल संपदा से गुज़रते हुए कुछ शब्द, कुछ युग्म अनायास सूझते हैं: उज्ज्वल और उदात्त, कॉस्मिक और स्थानीय, उल्लास और विनय, सर्वत्र और एकत्र, दैनंदिनता और अनुष्ठान, दीप्ति और प्रखरता, आत्मीयता और साहचर्य, घर-गृहस्थी. दिव्य और भव्य में निकट साधारण की भी जगह है. जब-तब यथार्थ में अतियथार्थ की घुसपैठ भी है. लगभग पांच सौ पृष्ठों की पुस्तक पढ़ते हुए अंशों पर विशेष ध्यान अटका. वे इस प्रकार हैं:
पहले ऋषि हो तुम अग्नि
देव हो, देवों के शिव सखा हो
तुम्हारे व्रत में कवि
मर्म जान लेते हैं कर्म का
दीप्तायुघ मसद्गण जन्म लेते हैं
. . . .
तीन दिवलोक हैं
दो सविता की गोद में हैं
एक यम के भुवन में मृतों का वहन करता है
अमृत रहता है उनमें
जैसे रथ के अक्ष में कील
जो सविता को जानता है
वही कुछ कह सकता है यहां
. . . .
कुशल गृहिणी हैं देवी उषा
प्रकर्ष के साथ सबका पालन करती हैं
पुराना कर देती हैं
घर को
चरिष्णु करती हैं
पादयुक्त प्राणियों को
उड़ने देती हैं
चिड़ियों को
. . . .
हे उषा,
अपनी ज्योति से आज
अंतरिक्ष के द्वार खोल दिये हैं
विस्तीर्ण और तेजमय घर दो हमें
जो हिंसा से दूर हो
. . . .
जो अग्नि विराट् वनस्पतियों में समाया है
जो उनके भीतर फूल-फल जगाता है
जो जल के बीच चेतन है
मेधावी उस अग्नि की अर्चना करते हैं
उनमें प्रवेश करते हैं
जैसे घर की पूजा कर उसमें प्रवेश किया जाता है
. . . .
अंजलि बांधे साथ रहती हैं ये उंगलियां
उतावली हैं
जैसे सपत्नियां पति के लिए
कृष्णवर्ण हैं,
उषा की तरह
किरणों से उजली हैं, लाल हैं
. . .
होता के हाथ में जब
पानी की तरह
यमस चमक उठता है
उसे देवता नीचे झुककर देखते हैं
जैसे नीचे झुकती सूर्य की
सब ओर फैली ज्योति
. . . .
लाल भेड़िये ने मुझे पथ चलते देखा
मेरी ओर लपका
जैसे अपनी पीठ का दर्द मिटाने के लिए
बढ़ई ऊपर उठता है
. . . .
हे इन्द्र,
सब ओर से छुरियां सता रही हैं मुझे,
जैसे सपत्नी
खाधिया सता रही हैं तुम्हारे इस स्तोता को
मानो चूहा शिश्न को कुतर रहा हो…
धीरे-धीरे मंडला
मंडला में रज़ा की स्मृति को जगाने और वहां के नागरिकों की कला-चेतना को सजीव करने के अवसर और साधन जुटाने की कोशिश में लगभग आठ बरस हो गए. मंडला को इसकी ख़ास ख़बर नहीं है कि अब उसका नाम रज़ा के नाम से जुड़कर कलाजगत् में जाना जाता है. पर इस बार लगा कि स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है. वहां रज़ा की स्मृति में जो आयोजन हुए उनमें शिरकत और उपस्थिति बढ़ी.
जब हम रज़ा कला वीथिका गए तो वहां चार-पांच स्त्रियां छाते आने का इंतज़ार कर रही थीं क्योंकि छाते ख़त्म हो गए थे: बाक़ी कई छाते रंग रहे थे. इस बार नृत्य-नाट्य प्रस्तुतियां को बाक़ायदा एक सभागार के मंच पर प्रस्तुत किया जा सका और वह दूर स्थित था पर उसमें काफ़ी लोग आए. कबाड़ से मूर्ति बनाने के शिविर में बनायी गई एक पक्षी मूर्ति का एक सार्वजनिक स्थान पर स्थापित कर दिया गया. सौभाग्य से ज़िला प्रशासन ने सहयोग-समर्थन दिया-किया.
बारिश उन दिनों ख़ास नहीं हुई हालांकि शहर के अहाते में जो धान के खेत हैं वे पानी से भरे थे. नर्मदा में पानी बढ़ा हुआ था और ख़ासा मटमैला था. शहर में दुकानें बहुत बढ़ गई हैं और ख़ासी चमक-दमक वाली हैं. दुकानों के नाम अंग्रेज़ी में लिखे जाना शुरू हो गया है. नर्मदा के तट पर बने मंदिरों में ख़ासी भीड़भाड़ थी. नागपुर, ख़ैरागढ़ और अन्य कई शहरों से आए कलाकारों ने शिविरों में स्थानीय और आसपास के युवा कलाकारों के साथ भाग लिया. बाहर का कोई दबदबा नहीं है: सहज मेलजोल है.
मंडला की अपनी स्थानीय प्रतिभा, नागरिक कला ललक और संभावना आकार ले रही है. रज़ा होते तो यह सब देखकर बहुत विह्वल होते. अभी तो वे अपनी कब्र में अकेले लेटे हैं- पर बाहर उन्हीं की प्रेरणा और नाम से मंडला कलाओं में जाग रहा है, आगे बढ़ रहा है. जैसे उन्हें परोक्षतः फिर कला-संजीवनी मिल रही है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
