तमिलनाडु में दलित बस्ती को अलग करने के लिए बनाई गई 10 फुट ऊंची ‘दीवार’ ढहाई गई

तमिलनाडु के करूर के मुथुलादमपट्टी में अनुसूचित जाति- अरुंथथियार समुदाय के लोगों के प्रवेश को रोकने के लिए कथित ऊंची जाति- थोट्टिया नायकर समुदाय के लोगों ने कथित तौर पर एक दीवार खड़ी की थी जिसे ‘अस्पृश्यता की दीवार’ क़रार दिया गया था. 9 अगस्त को कड़ी सुरक्षा के बीच प्रशासन ने इसे हटाने की शुरुआत की है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

नई दिल्ली: तमिलनाडु के करूर के मुथुलादमपट्टी में अनुसूचित जाति- अरुंथथियार समुदाय के लोगों के प्रवेश को रोकने के लिए कथित ऊंची जाति, थोट्टिया नायकर समुदाय के लोगों ने कथित तौर पर ‘अस्पृश्यता की दीवार’ बनाई थी, जिसे कड़ी सुरक्षा के बीच शनिवार (9 अगस्त) को हटाना शुरू कर दिया.

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 200 फीट लंबी और 10 फीट ऊंची यह दीवार लगभग तीन हफ़्ते पहले सरकारी पोरामबोके ज़मीन के एक टुकड़े पर खड़ी की गई थी. इस पर अनुसूचित जाति समुदाय के निवासियों ने तुरंत कड़ी आपत्ति जताई थी और आरोप लगाया था कि यह ‘अस्पृश्यता की दीवार’ है.

दीवार के निर्माण के बाद से ही यह सवर्ण हिंदुओं और अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों के बीच विवाद का विषय बन गई. जहां अनुसूचित जाति के लोगों ने दावा किया कि यह दीवार उन्हें उन इलाकों तक पहुंचने से रोकने के लिए बनाई गई थी जहां सवर्ण हिंदू रहते थे, वहीं सवर्ण हिंदुओं ने इस आरोप का खंडन करते हुए दावा किया कि उन्होंने यह दीवार असामाजिक गतिविधियों को रोकने के लिए, और ऐसे लोगों को बाहर रखने के लिए, जो उनके अनुसार, इस इलाके में घूमते और शराब पीते थे, बनाई थी.

बताया गया है कि इसी सवर्ण समुदाय ने अरुंथथियारों द्वारा वार्षिक श्री मुथुमारीअम्मन मंदिर उत्सव के दौरान कार्यक्रम आयोजित करने के लिए मंच बनाने तथा पोरामबोके भूमि पर सार्वजनिक शौचालय बनाने के प्रयासों को कथित तौर पर रोक दिया था.

अखबार के अनुसार, राजस्व विभाग ने कुछ दिन पहले उक्त जाति समूह के नेता ‘कोथुकरार’ को 15 दिनों के भीतर दीवार हटाने का नोटिस दिया था, जिसमें कहा गया था कि जिस ज़मीन पर दीवार खड़ी की गई है वह सरकारी पोरामबोके भूमि है. इसके अलावा, दीवार बनाने के लिए कोई अनुमति नहीं ली गई थी.

हालांकि, समुदाय के प्रतिनिधियों का कहना था कि दीवार का उद्देश्य अनुसूचित जाति के लोगों को प्रवेश से रोकना नहीं, बल्कि ‘बाहरी लोगों’ की असामाजिक गतिविधियों को रोकना था. उन्होंने दीवार गिराने से इनकार कर दिया था.

चूंकि इस मुद्दे से क्षेत्र में जातिगत संघर्ष भड़कने की संभावना थी, इसलिए राजस्व विभाग ने शुक्रवार रात एक और नोटिस जारी कर सवर्ण हिंदुओं को शनिवार (9 अगस्त, 2025) सुबह 11 बजे तक दीवार हटाने का निर्देश दिया. इस कार्रवाई का कड़ा विरोध करते हुए बड़ी संख्या में लोगों ने शुक्रवार रात कलेक्टर कार्यालय पर धरना दिया.

राजस्व अधिकारियों द्वारा यह स्पष्ट किए जाने के बाद कि शनिवार को दीवार गिरा दी जाएगी, वे अपनी बस्ती में लौट आए.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार इसके बाद 9 अगस्त की सुबह, पुलिस अधीक्षक के. जोश थंगैया के नेतृत्व में लगभग 200 पुलिस अधिकारी दीवार के पास मोर्चा संभाले. लेकिन सवर्ण हिंदू महिलाएं दीवार के सामने एक मानव अवरोध बनकर खड़ी हो गईं.

एसपी ने तहसीलदार कार्यालय में एक शांति बैठक बुलाई और दोनों समूहों के नेताओं को साथ बुलाया. आरडीओ और तहसीलदार सहित राजस्व अधिकारी भी इसमें शामिल हुए. घंटों चली बातचीत- जिसे बाद में ‘प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष’ बताया गया- के बाद थोट्टिया नायकर के प्रतिनिधि दीवार को स्वयं गिराने पर सहमत हो गए.

नया नहीं दीवार बनाना 

तमिलनाडु में ऐसे दलितों को अलग करने वाले दीवारों को लेकर विवाद पहली नहीं है. कोयम्बटूर के नजदीक मेट्टुपलायम का नादुर गांव दिसंबर 2019 में सुर्खियों में आया था, जब एक ऊंची जाति के व्यक्ति द्वारा बनाई गई 20 फीट ऊंची दीवार भारी बारिश के कारण गिरने से 17 लोगों की मौत हो गई थी. वह दीवार दलितों के घरों के ऊपर गिरी थी. उस दीवार को शिव सुब्रमण्यम नाम के व्यक्ति ने खुद के मकान को दलितों के बस्ती से अलग करने के लिए बनाया था.

हालांकि बाद में वहां नई दीवार खड़ी कर दी गई, जिसे राजनीतिक दलों और संगठनों ने ‘अस्पृश्यता दीवार’ करार दिया था, क्योंकि उसके दूसरी तरफ दलित रह रहे थे.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, मदुरै के पास उथापुरम जाति की दीवार, जो प्रभावशाली जातियों द्वारा खड़ी की गई 12 फुट ऊंची और 600 मीटर लंबी दीवार है, का 2007 से ही कड़ा विरोध हुआ था. दलितों को प्रवेश की अनुमति देने के लिए 2008 में आंशिक रूप से दीवार को ध्वस्त कर दिया गया, हालांकि उसके बाद भी कई वर्षों तक वहां जातीय हिंसा जारी रही.

तिरुवल्लूर ज़िले के थोकम्मुर गांव में आठ महीने के अभियान के बाद 2022 में एक दीवार को ध्वस्त कर दिया गया, जिसे 2016 में प्रभावशाली रेड्डीयार जाति द्वारा आदि द्रविड़ दलितों को मंदिर की भूमि और सामुदायिक स्थान तक पहुंचने से रोकने के लिए बनाया गया था.

विरुधुनगर ज़िले में दलित श्मशान घाट को सवर्ण हिंदू संपत्तियों के पीछे छिपाने के लिए सरकारी भूमि पर बनाई गई 150 मीटर लंबी दीवार को दलित संगठनों के निरंतर विरोध के बाद 2024 में ध्वस्त कर दिया गया.

कोयंबटूर ज़िले में दलितों की मुख्य सड़क तक पहुंच को अवरुद्ध करने के लिए 1989 में बनाई गई 20 फुट लंबी दीवार को तमिलनाडु अस्पृश्यता उन्मूलन मोर्चा के समर्थन के बाद अंततः 2010 में ध्वस्त कर दिया गया था.

इसी तरह कल्लाक्कुरिची ज़िले के मथूर गांव में 20 फुट ऊंची एक दीवार, जिसने दलितों को स्कूलों और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच से रोका था, को 2023 में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों के बाद राजस्व प्रभागीय अधिकारी द्वारा हटाने का आदेश दिया गया था.