नई दिल्ली: बिहार में चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (13 अगस्त) को याचिकाकर्ताओं से पूछा कि क्या चुनाव आयोग के पास ऐसा अधिकार नहीं है कि वह मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) अपने तरीके से कर सके?
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत किए गए चूक के साक्ष्यों से विशेष रूप से प्रभावित नहीं दिखी. पीठ ने एसआईआर की प्रक्रिया को असल में मतदाता-हितैषी बताया न कि मतदाताओं को सूची से बाहर करने वाला.
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़, उसका यह रुख़ इसलिए है क्योंकि चुनाव आयोग बिहार एसआईआर में पहचान प्रमाण के तौर पर 11 दस्तावेज़ स्वीकार कर रहा है, जबकि पहले के पुनरीक्षण अभ्यास में केवल सात दस्तावेज़ ही स्वीकार किए जाते थे.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, जस्टिस बागची ने कहा, ‘वे पहचान के दस्तावेज़ों की संख्या बढ़ा रहे हैं… यह आपको ज़्यादा विकल्प देता है.’
चुनाव आयोग की इस तरह की गहन पुनरीक्षण (इंटेंसिव रिविज़न) करने की शक्ति को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं से बात करते हुए उस पीठ के दूसरे जज, जस्टिस सूर्यकांत ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (रेप्रेज़ेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट) की धारा 21(3) की ओर ध्यान दिलाया, जिसमें कहा गया है कि आयोग ‘…किसी निर्वाचन क्षेत्र या निर्वाचन क्षेत्र के किसी हिस्से की मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण, जिस तरीके से वह उचित समझे, कराने का निर्देश दे सकता है.’
जब वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि मौजूदा अभ्यास सिर्फ एक निर्वाचन क्षेत्र में नहीं बल्कि पूरे राज्य में हो रहा है, तो जस्टिस बागची ने पूछा कि क्यों इसे बिहार की प्रत्येक विधानसभा सीट पर एक साथ होने वाले विशेष पुनरीक्षण के रूप में नहीं देखा जा सकता.
शंकरनारायणन ने यह भी कहा कि वयस्क भारतीय नागरिकों को अनुच्छेद 326 के तहत मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का अधिकार है, लेकिन जस्टिस बागची ने कहा कि चुनाव आयोग बदले में यह कहेगा कि उसके पास अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव कराने और मतदाता सूची तैयार करने की शक्ति है.
उन्होंने कहा, ‘यह एक संवैधानिक अधिकार और संवैधानिक शक्ति के बीच की लड़ाई है.’
अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सवाल उठाया कि चुनाव आयोग ने अपनी वेबसाइट से ड्राफ्ट मतदाता सूची का सर्चेबल (खोज योग्य) संस्करण क्यों हटा दिया. उन्होंने कोर्ट को बताया कि आयोग ने यह कदम कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मतदाता सूची में हेरफेर का आरोप लगाए जाने के बाद उठाया.
भूषण ने मांग की कि चुनाव आयोग उन 65 लाख मतदाताओं की सूची प्रकाशित करे, जिन्हें सूची से हटाया गया है, और साथ ही हटाने के कारण भी बताए.
भूषण ने कहा, ‘वे कहते हैं कि उनके पास नाम हटाने के ठोस कारण हैं – तो वे वेबसाइट पर क्यों नहीं होने चाहिए? यह गलत नीयत दिखाता है.’
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