अनिल चमड़िया ने 30 जून को शाम चार बजे मुख्य चुनाव आयुक्त से मुलाकात की थी. चुनाव आयोग की तरफ से उन्हें इस बातचीत के लिए बुलाया गया था. लगभग चालीस मिनट तक चली इस बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त ने बिहार में एसआईआर यानी मतदाता सूची केविशेष गहन परीक्षण को उचित बताया था. प्रस्तुत है मुख्य चुनाव आयुक्त के नाम उनका एक पत्र…
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माननीय महोदय,
जब मैं आपसे मिला, मतदाता सूची के शुद्धिकरण के फैसले को लेकर आपके कुछ तकनीकी तर्क थे. मसलन 2003 की मतदाता सूची के बाद 2025 में मतदाता सूची का विशेष परीक्षण जरूरी था. आपने संवैधानिक व्यवस्थाओं व जन प्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों और उसमें किए गए संशोधनों का भी हवाला दिया. तकनीकी तौर पर यह तारीखें बिहार में मतदाता सूची के विशेष परीक्षण के फैसले को लेकर दुरूस्त लग रही थीं.
आपने यह भी बताया कि कितना बड़ा ढांचा आयोग के पास उपलब्ध है, जिससे कि चार महीने बाद होने वाले विधान सभा चुनाव के पूर्व लगभग आठ करोड़ मतदाताओं के बीच अपने लक्ष्य को पूरा कर लेंगे. आपने परीक्षण अभियान के लिए 16 करोड़ फॉर्म छपवाने और बंटवाने का भी दावा किया. आपने परीक्षण का महत्व इस रूप में भी बताया कि बिहार की नई सूची 2050 तक के लिए मतदान का शुद्धिकरण कर देगी.
लेकिन मैं आपकी बातें और आपके भाव देखकर मैं हतप्रभ था क्योंकि मुझे लगा कि आयोग की जिम्मेदारी का आप अपनी ताकत के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं.
जब आपने बताया कि आप चार वर्षों तक आयोग में बने रहेंगे, आपकी शारीरिक भाषा आपके पास कुछ अतिरिक्त असंसदीय ताकत होने का एक भय पैदा कर रही थी. आपने यह जताने की कोशिश की कि आप कैसे संवैधानिक व्यवस्थाओं के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कर रहे हैं. आप लोकतंत्र के दूसरे स्तंभों से भिन्न है और लोगों की भावनाओं व उनकी स्थितियों की परवाह करने के दबाव से मुक्त भी है.
आपने कहा कि चार वर्षों के बाद यह जवाब देना है कि लोकतंत्र में साफ सुथरा चुनाव कराने के लिए क्या किया. लेकिन जिम्मेदारी की इस भाषा में यह बात छिपी रह गई कि आपकी जवाबदेही किसके प्रति है. भारत के नागरिक और लोगों के प्रति या किसी संस्था विशेष व व्यक्ति के प्रति? संसदीय लोकतंत्र में संविधान और संसद के प्रति, भारत के लोगों व नागरिकों के प्रति ही जवाबदेही सुनिश्चित है.
संस्थाएं संविधान की न केवल तकनीकी जरूरतों के लिए खड़ी की जाती हैं, बल्कि संस्थाएं संविधान की भावनाओं, सामाजिक स्थितियों-हालातों के प्रति उसके दृष्टिकोण, समाज को बनाने के उसके उद्देश्यों के मातहत होती है. यही संवैधानिक व्यवस्था का सार है. लेकिन आपका दृष्टिकोण आयोग को चलाने के लिए संविधान को महज एक तकनीकी निर्देश पुस्तिका समझने का लगा.
समाज के प्रति दृष्टिकोण, अधिकार से वंचित करने का औजार
बिहार मतदाता सूची परीक्षण के शुद्धिकरण का आधार आपने सरकारी दफ्तरों से निकले कागज़ों को बनाया है. मैं आपको एक बिल्कुल नया अनुभव सुनाता हूं. मुस्कान 27 वर्ष की हैं. बिहार की हैं. उनके पांच बच्चे हैं.उन्हें उनके पति ने मार पीटकर उन्हें घर से बच्चों के साथ निकाल दिया. हम भारत के लोग और नागरिक की भावनाओं ने उन्हें सहारा दिया.
रश्मि सड़क के किनारे दिल्ली में इन दिनों भुट्टे बेचती हैं. रश्मि जैसे कई लोग मुस्कान के साथ खड़े हुए. लेकिन उनके सामने सरकारी दफ्तरों ने यह समस्या खड़ी कर रखी है कि उनके पास कागज़ कहां है. उनके पांच और छह साल के बच्चे का कोई जन्म प्रमाण पत्र नहीं है. वह बिहार के सोहसराय में बच्चों का जन्म प्रमाण पत्र बनवाने गई थीं. भागती रहीं, भागती रहीं. कोर्ट में जाकर 60 रूपये का फार्म खरीदा. फिर उसे भरवाने के लिए भागीं.
उन्हें बताया गया कि उस पर तीन तीन लोगों के हस्ताक्षर गवाही के लिए करवाने हैं. वह अपने कागज़ नहीं बनवा सकीं. लौट आईं. रोजाना दिनभर की हांड मांस को गलाकर मेहनत मजदूरी करने वाली और लिखने पढ़ने से मरहूम मुस्कान के पास पैसे भी नहीं हैं कि वह किसी एक ऐप का इस्तेमाल कर लें और तकनीकी जरूरतों के लिए मनचाहा पैसे खर्च कर सकें.
आपने मुझे यह अपना अनुभव सुनाया था कि कैसे आप अपने परिवार के एक बुजूर्ग की मौत के बाद दाह संस्कार के लिए एक पवित्र नदी के किनारे गए थे और वहां कैसे पंडों के खातों में आपकी पीढ़ियों के नाम पते मिल गए. एक तो, जो पवित्र नदियों के किनारे दाह संस्कार कराने जाते हैं, उन्हें समस्त भारत के धर्मों व जातियों का प्रतिनिधि उदाहरण नहीं माना जा सकता है. खास वर्ग के लोग ही इस तरह के दाह संस्कार के लिए जाते हैं.
दूसरा कि वहां पंडो के बही खाते में उनकी पीढ़ियों के नाम इसीलिए भी मिल सकते हैं क्योंकि जो हालात हैं, वे कई पीढ़ियों से जस के तस बने हुए हैं. मैंने आपके द्वारा दी जाने वाली जानकारियों के बीच यह बताने की कोशिश की कि भारतीय समाज औपचारिक समाज नहीं है. आप स्वयं बता रहे हैं कि बिहार से लोग मेहनत मजदूरी करने के लिए बड़ी तादाद में प्रदेश से बाहर जाते हैं. बीते 25 वर्षों में गए हैं. अपनी माटी को छोड़कर भिन्न संस्कृति, भाषा, परिवेश के बीच मेहनत मजदूरी करने के लिए बाध्य होने के दर्द का एहसास भी हमें शायद कभी हो पाएं.
कागज़ बनवाने की जरूरत के दबाव से मजूरी करने वालों पर क्या गुजरती है, जो घर से स्कूल और फिर डिग्री लेकर सीधे दफ्तरों के बाबू बन गए हैं, उन्हें यह एहसास नहीं हो सकता. मुस्कान की उम्र 27 वर्ष हैं, लेकिन वह वोटर आई कार्ड नहीं बनवा सकी है. संविधान की भावना और व्यवस्थाएं कहती है कि सरकार यह जिम्मेदारी को पूरा करें कि देश के एक एक लोग नागरिक के अधिकार से वंचित नहीं हो.
पलायन, बाढ़, सुखाड़ , रोजमर्रे की जिंदगी को गुजारने का जुगाड़ के हालात में हम यह बोझ भी उसी पर देना चाहते हैं कि वह अपने गले में अपने होने का प्रमाण पत्र लटका ले. देश में लोगों के हालात की बिल्कुल एक उल्टी तस्वीर आपके अनुभव संसार में बैठी हुई है, जिसे मैं तीन कमरों( घर,स्कूल और दफ्तर) के अनुभव मानता हूं. लेकिन आपको ही यह जिम्मेदारी भी मिली है कि हमारे लिए स्वतंत्र मतदान की आप व्यवस्था करें.
आयोग की जिम्मेदारी का आपकी ताकत में प्रदर्शित होना
आयोग की जिम्मेदारी स्वतंत्र और राजनीतिक पार्टियों व उम्मीदवारों के बीच निष्पक्षता से मतदान कराने की है. यह संसदीय लोकतंत्र का आधार है. लेकिन इस बातचीत में यह महसूस हुआ कि आप लोकतंत्र को महज एक तकनीकी ढांचे के रूप में तब्दील करने के लिए आयोग का इस्तेमाल कर रहे हैं. जिम्मेदारी की भाषा को अपनी ताकत बनाकर आयोग का इस्तेमाल करना चाहते हैं.
मैं यह बात क्यों कह रहा हूं ? बिहार के संबंध में फैसले के लिए जो कागज़ी़ी आधार बताया है उसके अलावा अपने अनुभवों, समाज के हालात को देखने का नज़रिया, अपने पद की ताकत, जिम्मेदारियों के प्रति व्यक्तिवादी रुझानों, नियमगत तथ्यों की व्याख्याओं का आपने जो बखान किया वह मुझ जैसों के लिए एक झटके से कम नहीं.
आयोग के समाज और भारतीय समाज में गहरी खाई दिखती है. मैं स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना वाले वातावरण में फला बढ़ा. वह इस कदर था कि मैं कक्षा पांच में था और कॉपियों की कालाबाजारी की शिकायत करने थाने पहुंच गया था. उम्र से चेतना का रिश्ता नहीं होता है. चेतना का रिश्ता माहौल से होता है. बहुतेरे लोग बचपन के मानसिक ढांचे से बाहर ही नहीं निकल पाते हैं. मेरे आसपास के कई किस्से हैं, जो ब्रिटिश गुलामी के खिलाफ आंदोलन के उत्पाद के रूप में चेतना के महत्व को स्पष्ट करते हैं. कागज़ पत्तर से आज़ादी हासिल नहीं हुई थी और ना ही ‘हम भारत के लोग’ ने नागरिकता का प्रमाण पत्र लेकर संविधान बनाया था.
कागज़ी जरूरतों का इतिहास और वंचित करने की विचारधारा का तालमेल
आपसे मिलने के बाद मैंने वोटों से संस्थागत वंचित करने के इतिहास का एक अध्ययन किया. कानूनी और संविधान सम्मत बहानों से वोट से वहीं वंचित किए गए जो सदियों से आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर वंचित किए जाते रहे हैं. इनमें महिलाएं, दलित, आदिवासी और पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के लोग सबसे ज्यादा होते हैं जबकि इन्होंने ही वोट के अधिकार के जरिए आज़ादी को पहली बार महसूस किया है.
क्या संस्थाओं व उसमें काम करने वालों के सामाजिक और मानवीय बोध सत्ता की तकनीकी जरूरतों से अलग कर दिए गए हैं? यह सवाल मेरे लिए अभी सबसे महत्वपूर्ण हो गया है.
आपसे मिलने के बाद मैं कई दिनों तक आपसे बातचीत पर आधारित कुछ नहीं लिख सका. मैंने एक-दो मित्रों को जब आपसे मिलने के बारे में बताया, उन्हें आश्चर्य हुआ. मुझसे पूछा गया कि आपने क्या कहा. मैं उन्हें कुछ नहीं बता सका, सिवाय इसके कि दुखी हुआ.
हालात लोकतंत्र के लिए चिंता में डालने वाले हैं.
लोकतंत्र को लेकर चुनौती बढ़ गई है, यह एहसास हुआ है.
आपका शुक्रिया.
अनिल चमड़िया
