हाल ही में संस्कृति और कलाओं के विख्यात आलोचक सदानंद मेनन ने नेमिचन्द्र जैन स्मृति व्याख्यान के लिए विषय चुना ‘द एनिग्मा ऑफ क्रूएलिटी एंड द प्रेडिकामैंट ऑफ द आर्ट्स’. उनके अनुसार आज आधुनिक मनुष्य जिस तरह की क्रूरताओं और हिंसा से घिरा है उनमें एक आधुनिकता स्वयं है जिसने प्रकृति के साथ भयानक और अक्षम्य क्रूरता की है; इतनी कि आधुनिकता भी क्रूरता का एक पर्याय बन गई है.
इसके अलावा हम, अपने आस-पास, नरसंहार, नस्ली भेदभाव, सामूहिक क़ब्रें, सम्मान-हत्या, लिंचिंग, जातिगत प्रतिशोध, दंगे, सांप्रदायिक हमले, बहुसंख्यकों द्वारा हमले, बुलडोज़ी ध्वंस, जेलों में अत्याचार, बंदिशें और नाकाबंदी, बाहर से आए शरणार्थियों के साथ की जा रही हिंसा और अपर्वजन, स्त्रियों और बच्चों के साथ किए जा रहे अकथनीय अतिचार और अपराध आदि लगातार देख रहे हैं.
‘प्रदर्शनकारी अमानवीयता’ कुछ और ऊंचे धरातल पर पहुंच गई है. सामूहिक और बेराहत क्रूरता इतनी व्यापक हो गई है कि हमने उसे क्रूरता कहना तक बंद कर दिया है. हमने उससे विचलित और क्षुब्ध होना तक बंद कर दिया है. अब वह तमाशा है रोज़ का, और महाकवि पहले ही कह गए हैं- ‘होता है शबो-रोज़ तमाशा मिरे आगे’.
आवारा कुत्तों के साथ हो रही क्रूरता को तो सर्वोच्च न्यायालय में पहचाना है पर उसका अभी तक उमर ख़ालिद जैसे अनेक लोगों को हिरासत की क्रूरता में सालों से बंदी रखने की क्रूरता को पहचान कर उन्हें मुक्त करना बाक़ी है- यह देर भी क्रूरता ही है. इधर करोड़ों लोगों को मताधिकार से वंचित करने के अभियान में जो लोकतंत्र के लिए ही क्रूर व्यंग छिपा है, उस अभियान को रोका जाना विलंबित है.
क्रूरता के इतने स्तर और इतनी सारी बारीकियां इस समय सक्रिय हैं कि उदार मूल्यों और दृष्टि की बात करना दयनीय और हास्यास्पद दिखता है. कुछ-कुछ ऐसे जैसे क्रूरता तो मनुष्यता का स्वभाव और आविष्कार है, उदारता नहीं.
मेनन ने उचित ही कहा कि हम एक तरह की निहिलिस्ट उपेक्षा बरतते रहे हैं. उदाहरण है ‘द इकानामिस्ट’ पत्रिका की यह रिपोर्ट जिसमें बताया गया है कि गाज़ा में इज़रायली आक्रमण से लगभग 6 करोड़ टन मलबा फैल गया है जिससे यमुना नदी के किनारे दिल्ली से आगरा तक की सड़क भरी-बनाई जा सकती है. इस भयानकता से कोई अंतर नहीं पड़ रहा है.
विकल्प कुल एक है कि या तो हम इस नरसंहार में हिस्सेदार हों या उससे दूर रहें उसका प्रतिकार और प्रतिरोध करने का हमारे पार न तो उपाय है, न ही अवसर.
हम आवाज़ तक नहीं उठाते क्योंकि इस समय करुणा-सहानुभूति, उदारता-समावेश के लिए उठाई गई आवाज़ें सुनने वाले, समझने वाले बहुत घट गए हैं वे तक नहीं सुनते या कुछ करते हैं जो इस विश्वव्यापी क्रूरता के विरुद्ध या उसके शिकार हैं. परस्परता, समझ, संवेदना, साझेपन, पीर पराई से प्रेरित व्यक्ति या समूह इस समय अकेले और निहत्थे हैं.
यह जो हालत है, जिसमें हम वैचारिक-नैतिक-सर्जनात्मक शून्य में, संवेदना और सहानुभूति, करुणा और समझ की विकराल अनुपस्थिति से घिर गए हैं, उससे निपटने के लिए पहले कई उपाय व्यर्थ पड़ गए हैं, इसका तीख़ा अहसास सदानंद मेनन को है. उन्हें गांधी याद आते हैं. उनका मत है कि कलाओं को कुछ अतिरिक्त नागरिक सक्रियता का सहारा लेना पड़ेगा. कलाओं के अपने आत्यन्तिक क्षेत्र से विरत-विपथ होकर नहीं, उसी का विस्तार करते हुए.
एक कन्नड़ रंगकर्मी का उदाहरण देते हुए वे सुझाते हैं कि ऐसी सक्रियता का एक हिस्सा शिक्षा हो सकता है. यह तो हम सभी के सामने स्पष्ट है कि दर्ज़ करना, गवाह होना काफ़ी नहीं रह गया है. हमें राहत और मुक्ति में, भाईचारे और साझेदारी में, करुणा और सहानुभूति में सक्रिय और हिस्सेदार होना होगा. इस हिस्सेदारी और सजगता के कई रूप, कई मार्ग होंगे. थोड़ी निराशा यह देखकर होती है कि वे कम दिखाई दे रहे हैं.
2047 का सपना
भारत की स्वतंत्रता का एक शताब्दी पूरी होने में दो दशकों से कुछ अधिक का समय बचा है. अमृत काल चल रहा है जिसमें बहुत सारे मूल्य, संस्थान, प्रक्रियाएं आदि मृतप्राय हैं जिन्हें अपनी स्वतंत्रता को सार्थक और टिकाऊ बनाने के लिए हमने अपने नागरिक जीवन में स्थापित किया था. ऐसे कुसमय में बोरकर स्मृति व्याख्यान के रूप में 2047 के सपने के रूप में दिया गया प्रताप भानु मेहता का व्याख्यान हमें वैचारिक नींद और ऊंघ से, बौद्धिक विजड़न से जगाने वाला था.
मेहता जी ने इतने प्रश्न उठाये, इतनी विशद व्याख्याएं कीं, इतने संशय व्यक्त किए कि उनका सार-संक्षेप करना कठिन है. उन्होंने आरंभ में ही महाभारत में एक राजा की इस आकांक्षा का ज़िक्र किया जिसमें वह कहता है कि उसे न तो राज्य चाहिए, न स्वर्ग, न पुर्नजन्म. उसकी आकांक्षा है कि सभी प्राणियों की दुखताप से मुक्ति हो. यह एक कालातीत आदर्श है और यह बहुत अचंभे की बात है कि आज के भारतीय जीवन में इसकी कोई स्मृति ही मानो नहीं बची है. बहुत सारे सपने कभी पूरे नहीं होते लेकिन वे इसलिए अप्रासंगिक या व्यर्थ नहीं हो जाते. मनुष्यता ऐसे ही सपनों की छाया में विफल होकर भी हार नहीं मानती.
संविधान की प्रस्तावना के तीन शब्दों को एक और अधूरे पर प्रासंगिक सपने के रूप में मेहता जी ने याद किया: मुक्ति, समता और बंधुता. यह भी कहा कि ये तीनों आपस में बहुत गुंथे हुए हैं और कोई भी बाक़ी दो के बिना संभव नहीं है. यह भी याद दिलाया कि स्वतंत्र होने के समय भारत का एक स्वप्न समता लाने यानी उसके सभी नागरिकों की ग़रीबी से, भौतिक अभावों से मुक्ति का, यानी समता का था.
हालांकि मेहता जी ने इसको हिसाब में नहीं लिया यह ज़ाहिर है कि आर्थिक समृद्धि के समकालीन प्रयत्न समृद्धि और दौलत बढ़ाने के तो हैं, समता बढ़ाने के नहीं.
मेहता जी की एक स्थापना यह थी कि हमारे समय में संवाद पूरी तरह से नष्ट हो चुका है. हमारे सार्वजनिक संवाद में ईमानदारी का घोर अभाव है, नेकनीयती का भी. हर समय यह संशय बना रहता है कि जो कहा जा रहा है उसका आशय कुछ और, कहीं और है. हम छोटे-छोटे आत्मसंवर्द्धक समूहों में महदूद हो गए हैं और एक तरह के आत्मवैधीकरण में लिप्त हैं. सामूहिक नागरिक जीवन ईमानदार संवाद के बिना संभव नहीं है.
हमारे आसपास से नैतिक अनुकरणीयता ग़ायब हो गई है: सच्चे ‘चरित्र’ का अभाव है जो हमें नागरिक साहस की तरफ़ ले जा सके. परस्परता के आधार पर बनी संस्थाएं, जिनमें स्वयं लोकतंत्र भी शामिल हैं, ऐसे अंतर्विरोधों में फंस गई हैं कि राजनीतिक दल-स्पर्धा के लिए, वे अन्धभक्तों की बहु-संख्यकता को पोस रही और अपनी शक्ति का आधार बना रही हैं. सामूहिक निर्णय-शीलता और सामूहिक जीवन की समस्याओं का साझा उपाय सार्वजनिक व्यवहार और चिंता से ग़ायब हैं. ऐसे में, ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘प्रगतिशील’ जैसे पद और उनमें निहित स्थापनाएं संदेह के घेरे में आ गई हैं.
मेहता जी के अनुसार इन दोनों ही स्थापनाओं के मूल में बेहतर और न्यायसम्मत समाज की आकांक्षा बहुत ठीक है. लेकिन उनमें सामाजिक आत्मज्ञान का अभाव है. भारतीय समाज को, लोकतांत्रिक समाज को स्वतंत्रचेता व्यक्तियों के निर्णय से संगठित होना चाहिए, जातियों और धर्मों के किसी गठबंधन पर आश्रित नहीं. उसकी विविधता ऐसी एकलता के समवेत से आएगी, सामुदायिक समझौते से नहीं. इसलिए, अब एक नए क़िस्म की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था की दरकार है.
स्वतंत्रता-संग्राम के दो अधूरे प्रोजेक्ट, मेहता जी के अनुसार हैं: विश्वव्यवस्था में भारत की उचित जगह और औपनिवेशिक शासन द्वारा की गयी भारत की बौद्धिक-दार्शनिक-आध्यात्मिक तबाही-बरबादी. हम इससे अब तक उबर नहीं पाए हैं.
हमारी जो क्षति सभ्यतामूलक, सौन्दर्यमूलक, बौद्धिक, दार्शनिक हुई है उसे हम अब तक दुरुस्त नहीं कर पाए हैं. हम एक तरह की आध्यात्मक आत्मरति में डूबे हुए हैं. राजनीति, ख़ासकर सत्तारूढ़ राजनीति, सब कुछ को सत्ता और शक्ति में घटा रही है. हम एक टूटी-बिखरी हुई सभ्यता हैं और ऐसे व्यवहार करते हैं मानों हमें अब भी औपनिवेशिकता के इजलास में अपनी वैधता और प्रामाणिकता को साबित करने के लिए कोई हलफ़नामा देने की अनिवार्यता है.
मेहता जी ने भारत को दक्षिण एशिया के साथ मिलकर एक नई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाने के लिए सक्रिय होने की जरूरत बतायी और इस ओर ध्यान खींचा कि चाहे अंतरराष्ट्रीय व्यापार हो या राजनय, भारत की कोई ख़ास उपस्थिति नहीं है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
