नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने 1 सितंबर को दिल्ली सरकार के डायरेक्टरेट ऑफ प्रॉसिक्यूशन द्वारा जारी भर्ती विज्ञापन पर रोक लगा है. 21 अगस्त को जारी इस विज्ञापन में कुल 196 पदों पर सेवानिवृत्त अभियोजकों को संविदा पर नियुक्त करने की बात कही गई थी. इसके तुरंत बात द वायर हिंदी ने ख़बर की थी कि वकील इस नियुक्ति का कड़ा विरोध कर रहे हैं.
जस्टिस सचिन दत्ता की पीठ ने भर्ती पर रोक लगाते हुए सभी पक्षों से जवाब मांगा है. इस निर्णय के साथ ही अदालत ने अभियोजन निदेशक से एक महत्वपूर्ण सवाल पूछा, ‘आप युवा वकीलों के साथ भेदभाव कैसे कर सकते हैं?’
यह फैसला वकील विकास वर्मा की याचिका पर आया है. वर्मा का कहना है कि यह नियुक्ति प्रक्रिया न केवल मनमानी है बल्कि यूपीएससी जैसी वैधानिक भर्ती प्रणाली को दरकिनार करती है और सेवानिवृत्त अधिकारियों के लिए ‘पिछले दरवाज़े से प्रवेश’ का रास्ता खोलती है.
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम उमा देवी, 2006 और रेनु बनाम डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज, तिस हज़ारी, 2014) का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी नौकरियों में भर्ती पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी तरीके से होनी चाहिए.
द वायर हिंदी की ख़बर
द वायर हिंदी ने इस विवादास्पद भर्ती प्रक्रिया को लेकर वकीलों के आक्रोश के बारे में लिखा था. द वायर हिंदी से बात करते हुए दिल्ली प्रॉसिक्यूटर्स वेलफेयर एसोसिएशन के सचिव और एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर जमशेद अंसारी ने विज्ञापन का कड़े शब्दों में विरोध किया था.
उन्होंने कहा था,
यह विज्ञापन गैरकानूनी, मनमाना, अधिकार से परे और असंवैधानिक है, क्योंकि यह निष्पक्ष अवसर और योग्यता-आधारित भर्ती के सिद्धांतों को कमजोर करता है. सेवानिवृत्त अभियोजकों को प्राथमिकता देकर निदेशालय न केवल योग्य युवाओं को रोजगार से वंचित कर रहा है बल्कि ख़तरनाक उदाहरण पेश कर रहा है. हम इस विज्ञापन को तत्काल वापस लेने की मांग करते हैं और अधिकारियों से आग्रह करते हैं कि वे एक पारदर्शी और योग्यता-आधारित भर्ती प्रक्रिया अपनाएं, जो युवा वकीलों को समान अवसर प्रदान करे. हमारे न्याय तंत्र का भविष्य नए कानूनी पेशेवरों को सशक्त बनाने पर निर्भर करता है, न कि सेवानिवृत्त व्यक्तियों को दोबारा नियुक्त करने पर.
एसोसिएशन के प्रवक्ता गौरव पांडे ने भी इस प्रस्ताव को मौजूदा भर्ती नियमों के खिलाफ बताते हुए कहा था,
सेवानिवृत्त अभियोजकों की भर्ती का प्रस्ताव मौजूदा भर्ती नियमों के सीधे विपरीत है… भर्ती की स्थापित प्रक्रिया को दरकिनार करके यह प्रस्ताव न केवल नियमों की अनदेखी करता है, बल्कि विभाग में पूरी निष्ठा से सेवा कर रहे अभियोजकों के करियर की प्रगति को भी खतरे में डाल देता है. ये अधिकारी अपने अनुभव और काम के आधार पर पदोन्नति की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन यह प्रस्ताव उन्हें अनुचित रूप से उन मौकों से वंचित कर देगा. इसका असर न केवल उनके मनोबल पर पड़ेगा बल्कि पूरे विभाग की कार्यक्षमता और माहौल पर भी नकारात्मक प्रभाव डालेगा.
एसोसिएशन ने इस संबंध में दिल्ली सरकार को औपचारिक पत्र लिखकर आपत्ति दर्ज कराई थी.
नियमित भर्ती को रोका गया, फिर संविदा का रास्ता खोला गया
एसोसिएशन की चिंता को बल इस तथ्य से भी मिलता है कि दिल्ली सरकार में यूपीएससी के माध्यम से 66 असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई थी. इसके लिए 12 अप्रैल, 2025 को विज्ञप्ति निकाली गई थी. लेकिन 2 मई, 2025 को यूपीएससी ने एक नोटिस जारी कर भर्ती प्रक्रिया को अगले आदेश तक रोक दिया.

इसके बाद अचानक सेवानिवृत्त अभियोजकों के लिए संविदा आधारित भर्ती निकाल दी गई, जिससे साफ़ संकेत मिलता है कि सरकार नियमित भर्ती से बचने की कोशिश कर रही है.
21 अगस्त, 2025 को जारी किए गए विज्ञापन में दिल्ली सरकार ने 196 पदों पर पब्लिक प्रॉसिक्यूटर, एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर और असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के रूप में केवल सेवानिवृत्त अधिकारियों की भर्ती करने की योजना बनाई थी. इस नियुक्ति की शर्त यह थी कि उम्मीदवारों के पास केंद्र सरकार, राज्य सरकार या सीबीआई, एनआईए जैसी सरकारी एजेंसियों के साथ काम करने का अनुभव हो.
विज्ञापन में स्पष्ट किया गया था कि यह अनुबंध शुरू में एक वर्ष की अवधि के लिए होगा, या 65 वर्ष की आयु पूरी होने तक, या फिर पद नियमित रूप से भर जाने तक – इनमें से जो भी पहले हो. संविदा पर रखे जाने वाले इन सेवानिवृत्त प्रॉसिक्यूटर्स को मेडिकल, यात्रा भत्ता या एलटीसी जैसी कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं दी जानी थी. साल भर में केवल आठ दिन की छुट्टी मिलनी थी और इन्हें अपनी निजी प्रैक्टिस भी बंद करनी होती.
कोर्ट में उठे संवैधानिक सवाल
अदालत में दायर याचिका में अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर), और अनुच्छेद 19(1)(g) (पेशा चुनने और करने की स्वतंत्रता) के उल्लंघन का मुद्दा उठाया गया है. इसके साथ ही अनुच्छेद 51A(j) का भी उल्लेख किया गया है, जो नागरिकों को उत्कृष्टता की ओर बढ़ने का दायित्व देता है.
याचिकाकर्ता का कहना है कि यह अधिसूचना न केवल एससी, एसटी और ओबीसी उम्मीदवारों को बाहर कर देती है, बल्कि ऐसे सेवानिवृत्त लोगों की भर्ती करती है, जो पहले से ही पेंशन ले रहे हैं. इससे राज्य पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ेगा और संस्थागत निरंतरता कमजोर होगी.
अब आगे क्या?
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस भर्ती पर रोक तो लगा दी है, लेकिन मामला अभी विचाराधीन है. अदालत ने सभी पक्षों से जवाब मांगा है. यह देखना अहम होगा कि दिल्ली सरकार अपने इस कदम का बचाव कैसे करती है, जबकि युवा वकीलों और अभियोजकों का एक बड़ा तबका इसे अनुचित और असंवैधानिक मान रहा है.
