नई दिल्ली: बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की घोषणा के पूरे 77 दिन बाद भारतीय निर्वाचन आयोग ने अपने कड़े प्रतिरोध के बावजूद बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को निर्देश जारी किया है कि वे संशोधित मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए पहचान के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किए जाने वाले 12वें दस्तावेज के तौर पर आधार कार्ड को स्वीकार करें.
मालूम हो कि इस बिहार में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से लगभग 65 लाख लोगों के नाम को हटाया गया है. इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई बार सुनवाई हो चुकी है, जिसमें सर्वोच्च अदालत ने अनेक बार आधार को इस प्रक्रिया में शामिल करने को लेकर सुझाव दिए हैं.
उल्लेखनीय है कि 8 सितंबर को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव द्वारा चुनावी राज्य बिहार में एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस संबंध में आदेश दिए थे.
इसके बाद निर्वाचन आयोग द्वारा बिहार के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को 9 सितंबर को आधार कार्ड को पहचान के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किए जाने वाले 12वें दस्तावेज के तौर पर शामिल करने के निर्देश जारी किए गए हैं.
हालांकि, यह पहली बार नहीं था जब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को बिहार में 94% कवरेज वाले आधार को भी प्रमाण पत्र के रूप में शामिल करने का सुझाव दिया हो. इससे पहले 10 जुलाई को मामले की सुनवाई शुरू होने के बाद से अदालत ने चुनाव आयोग से 10 जुलाई और 28 जुलाई को दो बार आधार को शामिल करने पर विचार करने को कहा था.
इस मामले पर 14 अगस्त को भी सुनवाई के दौरान अदालत ने एक बार फिर चुनाव आयोग से आधार को शामिल करने का अनुरोध किया था और उसे अपनी वेबसाइट पर मसौदा मतदाता सूची से बाहर रह गए लोगों के नाम प्रकाशित करने का निर्देश दिया था.
22 अगस्त को अदालत ने चुनाव आयोग से कहा था कि वह बाहर रह गए मतदाताओं को आधार कार्ड या 11 निर्धारित दस्तावेजों में से किसी एक के साथ अपने दावे ऑनलाइन या भौतिक रूप से प्रस्तुत करने की अनुमति दे.
चुनाव आयोग का विरोध
वहीं, दूसरी ओर 10 जुलाई से चुनाव आयोग ने अदालत में अपने हलफनामों में आधार को शामिल करने का बार-बार विरोध किया.
द वायर ने पहले बताया था कि आधार को स्वीकार करने के चुनाव आयोग के विरोध ने पहचान पत्र पर उसके भ्रम और उसके परिणामस्वरूप ढुलमुल रवैये को उजागर किया है.
आइए देखते हैं कि चुनाव आयोग ने आधार को शामिल करने का कैसे विरोध किया, जब तक कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के माध्यम से उसे इसे शामिल करने के लिए मजबूर नहीं किया गया:
10 जुलाई: सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग से दस्तावेजों की सूची में आधार को शामिल करने पर विचार करने को कहा
10 जुलाई को जब सर्वोच्च न्यायालय ने आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई के लिए पहली बार सूचीबद्ध किया, तो सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग से आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड को स्वीकार करने पर विचार करने को कहा.
जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने चुनाव आयोग का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी से आधार कार्ड को सूची से बाहर रखने के मुद्दे पर सवाल पूछे और महत्वपूर्ण बात यह कही कि चुनाव आयोग का किसी व्यक्ति की नागरिकता से कोई लेना-देना नहीं है और यह गृह मंत्रालय का अधिकार क्षेत्र है.
अदालत ने कहा कि चूंकि चुनाव आयोग ने अपने 24 जून के आदेश में जिन 11 दस्तावेजों की सूची सूचीबद्ध की थी, उन्हें संपूर्ण नहीं बताया गया था, इसलिए आधार पर विचार किया जाना चाहिए.
अदालत ने कहा था, ‘…हमारी प्रथम दृष्टया राय में चूंकि यह सूची संपूर्ण नहीं है, इसलिए यह न्याय के हित में होगा कि चुनाव आयोग आधार कार्ड, चुनाव आयोग द्वारा जारी मतदाता फोटो पहचान पत्र और राशन कार्ड पर भी विचार करे.’
21 जुलाई: चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह आधार पर विचार नहीं कर सकता
21 जुलाई को चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे में कहा कि वह आधार, मतदाता पहचान पत्र या राशन कार्ड पर विचार नहीं कर सकता – जैसा कि शीर्ष अदालत ने सुझाव दिया था.
आधार कार्ड के संदर्भ में चुनाव आयोग के हलफनामे में कहा गया कि ये कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं और इसलिए इन्हें उन 11 दस्तावेज़ों में शामिल नहीं किया जा सकता, जिन्हें तब ‘उदाहरण के लिए और संपूर्ण नहीं’ बताया गया था.
हलफनामे में कहा गया कि आधार ‘केवल व्यक्ति की पहचान का प्रमाण है.’
इसमें कहा गया, ‘दूसरे शब्दों में, कोई व्यक्ति जो किसी लाभ का दावा करना चाहता है, वह आधार कार्ड का उपयोग यह दिखाने के लिए कर सकता है कि वह वही है जो वह होने का दावा करता है.’
आयोग ने यह भी कहा कि आधार नागरिकता या निवास का प्रमाण नहीं है, लेकिन इसका इस्तेमाल अन्य दस्तावेज़ों के पूरक के रूप में किया जा सकता है.
इसमें कहा गया, ‘आधार को गणना फॉर्म में दिए गए 11 दस्तावेज़ों की सूची में शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि यह अनुच्छेद 326 के तहत पात्रता की जांच में मदद नहीं करता है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पात्रता साबित करने के लिए आधार का इस्तेमाल अन्य दस्तावेज़ों के पूरक के रूप में नहीं किया जा सकता.’
उसी सप्ताह बाद में अपने जवाबी हलफनामे में एडीआर ने कहा कि यह तथ्य कि आधार कार्ड स्थायी निवास प्रमाण पत्र, ओबीसी/एससी/एसटी प्रमाण पत्र और पासपोर्ट जारी करने के लिए स्वीकार किए जाने वाले दस्तावेज़ों में से एक है – जो चुनाव निकाय द्वारा सूचीबद्ध 11 दस्तावेज़ों में से तीन हैं. चुनाव आयोग द्वारा तत्काल एसआईआर आदेश के तहत आधार (जो सबसे व्यापक रूप से मान्य दस्तावेज़ है) को अस्वीकार करना ‘स्पष्ट रूप से बेतुका’ बनाता है.
28 जुलाई: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘सामूहिक समावेशन, न कि सामूहिक बहिष्कार’ एसआईआर का लक्ष्य होना चाहिए
28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर चुनाव आयोग से आधार और मतदाता पहचान पत्र को शामिल करने का अनुरोध किया, लेकिन इस मामले में चुनाव आयोग को अपनी मसौदा सूची प्रकाशित करने से रोकने का कोई आदेश नहीं दिया, जो उस समय 1 अगस्त को जारी होने वाली थी.
अदालत ने कहा, ‘आप इन दोनों दस्तावेज़ों को शामिल करेंगे. जहां भी आपको जालसाज़ी मिलेगी, वह मामला-दर-मामला देखा जाएगा. दुनिया का कोई भी दस्तावेज़ जाली हो सकता है.’
लाइव लॉ के अनुसार, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा सूचीबद्ध कोई भी दस्तावेज़ फर्जी हो सकता है, लेकिन यह तर्क समझ से परे है कि सिर्फ आधार कार्ड और मतदाता फोटो पहचान पत्र (EPIC) को ही स्वीकार्य दस्तावेज़ों की सूची से बाहर क्यों रखा गया है.
अदालत ने घोषणा की कि चुनावी राज्य में इस प्रक्रिया का लक्ष्य ‘सामूहिक समावेशन, न कि सामूहिक बहिष्कार’ होना चाहिए.
29 जुलाई से 14 अगस्त: बहिष्कृत नामों की सूची प्रकाशित करने का चुनाव आयोग का विरोध
सुप्रीम कोर्ट ने 29 जुलाई को अपनी मौखिक टिप्पणियों में सीधा आश्वासन दिया कि अगर एसआईआर के कारण बिहार में मतदाताओं का ‘बड़े पैमाने पर बहिष्कार’ होता है, तो वह हस्तक्षेप करेगा. यह तब हुआ जब अदालत को बताया गया कि लगभग 65 लाख मतदाता जिन्होंने गणना प्रपत्र जमा नहीं किए हैं, उन्हें सूची से हटाया जा सकता है.
1 अगस्त को मसौदा सूची प्रकाशित की गई, जिसमें 65 लाख मतदाता बाहर रह गए. इसके बाद 6 अगस्त को एडीआर ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि चुनाव आयोग मसौदा सूची से बाहर किए गए 65 लाख मतदाताओं के नाम जारी करे.
एडीआर ने कहा कि मौजूदा स्वरूप में मसौदा मतदाता सूची ‘किसी काम की नहीं’ है और ‘ऐसे नाम हटाए जाने के कारण के अभाव में जमीनी स्तर पर किसी भी विवरण की दोबारा जांच करने के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है.’
तीन दिन बाद चुनाव आयोग ने इसके जवाब में 9 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर किया, जिसमें उसने कहा कि मौजूदा नियमों के वैधानिक ढांचे के तहत मसौदा मतदाता सूची में शामिल न किए गए मतदाताओं के नाम या उनके शामिल न किए जाने के कारणों को प्रकाशित करना आवश्यक नहीं है.
14 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर चुनाव आयोग से एसआईआर के लिए स्वीकृत दस्तावेजों की सूची में आधार को शामिल करने का अनुरोध किया और चुनाव आयोग को अपनी वेबसाइट पर मसौदा मतदाता सूची से बाहर किए गए नामों की सूची, साथ ही उनके हटाए जाने के कारणों को प्रकाशित करने का निर्देश दिया.
22 अगस्त को, सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह बाहर किए गए मतदाताओं को आधार कार्ड या 11 निर्धारित दस्तावेजों में से किसी एक के साथ ऑनलाइन या भौतिक रूप से अपने दावे प्रस्तुत करने की अनुमति दे.
मनमाने और अजीबोगरीब तरीके से नाम हटाने और जानकारी छिपाने की खबरों के बीच 1 सितंबर को चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मसौदा मतदाता सूची पर दावे और आपत्तियां 1 सितंबर के बाद भी दायर की जा सकती हैं. जबकि, 24 जून के आदेश में कहा गया था कि दावे और आपत्तियां केवल 1 सितंबर तक ही दायर की जा सकती हैं.
8 सितंबर को चुनाव आयोग ने आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के सामने यह वादा किया कि पहचान स्थापित करने के लिए आधार कार्ड को ध्यान में रखा जाएगा.
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यह दस्तावेज़ नागरिकता का नहीं, बल्कि पहचान का प्रमाण है और चुनाव आयोग को आधार कार्ड स्वीकार करने के संबंध में अपने अधिकारियों को निर्देश जारी करने का आदेश दिया.
आदेश में कहा गया है, ‘इसमें कोई विवाद नहीं है कि आधार (वित्तीय और अन्य सब्सिडी, लाभ और सेवाओं का लक्षित वितरण) अधिनियम, 2016 के तहत आधार कार्ड को दी गई वैधानिक स्थिति के अनुसार यह नागरिकता का प्रमाण नहीं है और इसलिए इसे नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा.’
अदालत ने आगे कहा, ‘हालांकि, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23(4) को ध्यान में रखते हुए आधार कार्ड किसी व्यक्ति की पहचान स्थापित करने के उद्देश्य से सूचीबद्ध दस्तावेजों में से एक है. तदनुसार, हम भारत निर्वाचन आयोग और उसके प्राधिकारियों को निर्देश देते हैं कि वे बिहार राज्य की संशोधित मतदाता सूची में नाम शामिल करने या निकालने के उद्देश्य से आधार कार्ड को पहचान के प्रमाण के रूप में स्वीकार करें.’
9 सितंबर को आखिरकार भारत के चुनाव आयोग ने बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को आधार को 12वें दस्तावेज़ के रूप में शामिल करने के निर्देश जारी किए. ये एसआईआर की घोषणा के कुल 77 दिनों के बाद हुआ.
चुनाव आयोग ने बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को जारी निर्देश में कहा कि आधार को उसके 24 जून के आदेश में पहले सूचीबद्ध 11 दस्तावेज़ों के साथ 12वें दस्तावेज़ के रूप में शामिल किया जाए.
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए आयोग ने आगे कहा कि ‘आधार कार्ड को पहचान के प्रमाण के रूप में स्वीकार और उपयोग किया जाना चाहिए, न कि नागरिकता के प्रमाण के रूप में.’
निर्देशों में कहा गया है, ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23(4) के तहत आधार कार्ड पहले से ही किसी व्यक्ति की पहचान स्थापित करने के उद्देश्य से सूचीबद्ध दस्तावेजों में से एक है.’
इसमें यह भी कहा गया है कि ‘इस निर्देश के अनुसार आधार का पालन न करने या उसे स्वीकार करने से इनकार करने के किसी भी मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया जाएगा.’
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