‘आईटी मंत्रालय का डीपीडीपी एक्ट से आरटीआई क़ानून के कमज़ोर न होने का दावा भ्रामक है’

अटॉर्नी जनरल ने आईटी मंत्रालय की इस व्याख्या का समर्थन किया कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट आरटीआई कानून को कमजोर नहीं करता. पत्रकार संगठनों और विपक्ष ने संशोधन पर आपत्ति जताई है, जबकि कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह बदलाव भ्रष्टाचार और जनहित मामलों से जुड़ी महत्वपूर्ण सूचनाओं तक पहुंच को सीमित करेगा.

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(इलस्ट्रेशन: द वायर)

नई दिल्ली: अटॉर्नी जनरल ने आईटी मंत्रालय की इस व्याख्या का समर्थन किया है कि भारत का डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (डीपीडीपी एक्ट) सूचना का अधिकार कानून को कमजोर नहीं करता.

लेकिन आरटीआई कार्यकर्ता और नेशनल कैंपेन फॉर पीपल्स राइट टू इन्फॉर्मेशन की सह-संयोजक अंजलि भारद्वाज ने अटॉर्नी जनरल के इस समर्थन को चिंताजनक बताया है. साथ ही उन्होंने आईटी मंत्रालय के दावे को ‘स्पष्ट रूप से भ्रामक’ बताया है.

आईटी मंत्रालय को अटॉर्नी जनरल का यह समर्थन ऐसे समय में आया है जब सरकार की इस बात के लिए आलोचना हो रही है कि नया निजता कानून पारदर्शिता संबंधी नियमों को कमजोर करता है. आईटी मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, पत्रकार संगठनों और विपक्षी नेताओं की आलोचना के बाद अटॉर्नी जनरल की राय मांगी गई थी.

यह समर्थन डीपीडीपी एक्ट की धारा 44(3) से जुड़ा है, जिसे 11 अगस्त, 2023 को अधिसूचित किया गया था. इसने आरटीआई कानून की धारा 8(1)(j) में मौजूद उस प्रावधान को हटा दिया था, जिसमें यह कहा गया था कि जनहित में होने पर सूचना अधिकारी व्यक्तिगत जानकारी भी साझा कर सकते हैं.

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक़, आईटी मंत्रालय ने तर्क दिया कि यह प्रावधान अनावश्यक था, क्योंकि आरटीआई एक्ट की धारा 8(2) पहले से ही अधिकारियों को यह शक्ति देती है कि वे किसी भी सूचना, यहां तक कि अपवाद वाली जानकारी, भी साझा कर सकते हैं, अगर जनहित उससे होने वाले नुकसान से अधिक हो.

मंत्रालय ने इस विवादित बिंदु पर अटॉर्नी जनरल की राय मांगी थी, और उनका समर्थन मंत्रालय की व्याख्या की पुष्टि करता है.

अटॉर्नी जनरल के समर्थन से मंत्रालय को उम्मीद है कि डीपीडीपी एक्ट में अब और कोई संशोधन नहीं होगा. आईटी सचिव एस. कृष्णन ने पिछले महीने हिंदुस्तान टाइम्स से कहा था, ‘इससे आरटीआई एक्ट कमजोर नहीं हुआ है, बल्कि एक तरह से उसमें मज़बूती आई है.’

पत्रकार संगठनों और विपक्ष का विरोध

जुलाई में कई पत्रकार संगठनों ने इस व्याख्या से असहमति जताई थी और सरकार से मांग की थी कि आरटीआई की मूल धारा को बहाल किया जाए. उनका कहना था कि यह बदलाव पत्रकारों के लिए एक अहम साधन छीन लेता है, जिससे वे जनहित से जुड़े मामलों, जैसे- भ्रष्टाचार, घोटाले और नागरिकों के जीवन से जुड़े मुद्दे उजागर करते हैं.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी चिंता जताते हुए आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव को लिखा कि यह संशोधन आरटीआई एक्ट पर ‘बहुत बुरा असर’ डालेगा. उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि इस बदलाव को ‘रोकें, समीक्षा करें और वापस लें.’

ट्रांसपेरेंसी एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज का स्पष्ट रूप से मानना है कि डीपीडीपी एक्ट के माध्यम से आरटीआई कानून में संशोधन से महत्वपूर्ण सूचनाओं तक पहुंच बाधित होगी और जवाबदेही की लड़ाई और मुश्किल हो जाएगी. आईटी मंत्रालय के दावे पर वह कहती हैं, ‘आईटी मंत्रालय का दावा कि डीडीपी एक्ट लोगों के सूचना पाने के अधिकार को कमजोर नहीं करता, झूठा और भ्रामक है. डीपीडीपी एक्ट की धारा 44(3) ने साफ़ तौर पर आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(j) में संशोधन किया है और सभी व्यक्तिगत सूचनाओं के खुलासे से छूट दे दी है. यह सूचना तक पहुंच की व्यवस्था पर बड़ा प्रहार है. इस संशोधन से लोग अब शायद लोन डिफॉल्टर्स के नाम, भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों में शामिल ठेकेदारों और अधिकारियों के नाम, और सामाजिक योजनाओं के लाभार्थियों का विवरण हासिल नहीं कर पाएंगे. ये सारी जानकारियां भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघनों को उजागर करने और रोकने के लिए ज़रूरी हैं.’

एक अन्य आरटीआई कार्यकर्ता, अमृता जोहरी ने कहा है, ‘यह वास्तव में चौंकाने वाला है. अगर मंत्रालय और अटॉर्नी जनरल की राय में आरटीआई एक्ट के तहत सूचना पाने का अधिकार बदला नहीं है, तो फिर आरटीआई एक्ट में संशोधन किया ही क्यों गया? आरटीआई एक्ट पर कई बार फैसले हुए हैं, जिनमें संविधान पीठ के फैसले भी शामिल हैं, जिन्होंने धारा 8(1)(j) की व्याख्या की है. इनमें से किसी भी फैसले में यह नहीं कहा गया था कि आरटीआई एक्ट को संशोधित करने की ज़रूरत है. आरटीआई एक्ट भ्रष्टाचार को उजागर करने में व्यापक रूप से इस्तेमाल हुआ है और यह तभी संभव होता है जब आप उन ठेकेदारों और अधिकारियों के नाम पा सकें जिन्होंने नियमों को तोड़ा या फर्जी बिलों के आधार पर भुगतान पास किया. यह संशोधन भ्रष्ट लोगों को निजता की आड़ में छिपने की ढाल देगा.’

सरकार की दलील और आगे की तैयारी

लोकसभा के मानसून सत्र में मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस संशोधन का बचाव करते हुए कहा था कि यह निजता के अधिकार और सूचना के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करता है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में निजता को मौलिक अधिकार बताया था. उन्होंने कहा कि यह बदलाव दोनों कानूनों के बीच टकराव को रोकता है. यह न्यायिक सोच के अनुरूप है.

पिछले महीने मीडिया संगठनों के साथ हुई बैठक में आईटी मंत्रालय ने कहा था कि वह डीपीडीपी एक्ट से जुड़ी चिंताओं जिनमें आरटीआई एक्ट में संशोधन भी शामिल है पर ‘अक्सर पूछे जाने वाले सवालों’ (एफएक्यू- फ्रीक्वेंटली आस्क्ड क्वेश्चन्स) प्रकाशित करेगा. मीडिया संगठनों ने मंत्रालय को 35 प्रश्न सौंपे, जिनमें से एक था, ‘अगर मंत्रालय को लगता है कि आरटीआई की पहुंच डीपीडीपी एक्ट में बदलाव के बावजूद बनी हुई है क्योंकि धारा 8(2) मौजूद है, तो फिर आरटीआई एक्ट में संशोधन क्यों किया गया?’

डीपीडीपी एक्ट संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुका है और राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिली चुकी है. सरकार अब इसकी अंतिम नियमावली अधिसूचित करने की तैयारी कर रही है. ये नियम कानून को लागू करने और प्रवर्तन में लाने के लिए ज़रूरी हैं, लेकिन अब तक जारी नहीं किए गए हैं.