नई दिल्ली: एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के सह-संस्थापक और देश में चुनावी सुधारों एवं लोकतांत्रिक पारदर्शिता के प्रखर पैरोकार प्रोफेसर जगदीप एस. छोकर का शुक्रवार (12 सितंबर) को 81 वर्ष की आयु में निधन हो गया.
एडीआर ने एक बयान में कहा, ‘प्रोफेसर जगदीप छोकर के दृष्टिकोण ने भारत में चुनाव और जवाबदेही को लेकर सोच बदल दी. उनका जाना एक गहरी कमी छोड़ गया है, लेकिन उनका उदाहरण उन सभी को प्रेरित करता रहेगा जो मजबूत और जीवंत लोकतंत्र की राह पर काम कर रहे हैं.’
उल्लेखनीय है कि साल 1999 में छोकर और उनके आईआईएम के सहयोगी त्रिलोचन शास्त्री ने मिलकर एडीआर की स्थापना की थी. दोनों ने चुनाव में उम्मीदवारों की जानकारी को पारदर्शी बनाने की मांग करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी. इसमें कहा गया था कि संसद और विधानसभा चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करते समय अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी देना अनिवार्य होना चाहिए.
साल 2000 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस पर फैसला देते हुए सांसदों और विधायकों को अपने आपराधिक मामलों का खुलासा करने का आदेश दिया, जिसे 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा. हालांकि, केंद्र सरकार ने इस फैसले को टालने के लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में संशोधन किया और उम्मीदवारों को आपराधिक पृष्ठभूमि बताने से छूट देने की कोशिश की.
लेकिन 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने इस संशोधन को भी खारिज कर दिया.
अप्रैल 2024 में मिड-डे से बातचीत में छोकर ने कहा था कि सरकार द्वारा इस सुधार को रोकने की कोशिश ने उन्हें ‘कट्टर कार्यकर्ता’ बना दिया.
तब से एडीआर ने कई मामलों के जरिये सुप्रीम कोर्ट में चुनावी सुधार और पारदर्शिता की लड़ाई लड़ी. इनमें सबसे अहम था 2024 लोकसभा चुनावों से ठीक पहले आया सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला, जिसमें चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार दिया गया था. अदालत ने कहा था कि गुप्त चुनावी बॉन्ड अनुच्छेद 19 (1)(a) और नागरिकों के सूचना के अधिकार का उल्लंघन है. एडीआर इस मामले में मुख्य याचिकाकर्ताओं में शामिल था.
फिलहाल, बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में भी एडीआर मुख्य याचिकाकर्ता है. छोकर उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने सबसे पहले एसआईआर के परिणाम स्वरूप बड़े पैमाने पर मताधिकार छिन जाने, और चुनाव आयोग को एनआरसी लागू करने के औजार की तरह इस्तेमाल किए जाने पर गंभीर सवाल उठाए थे.
एडीआर के सह-संस्थापक त्रिलोचन शास्त्री ने द वायर से कहा, ‘वह चुनावी सुधारों एवं लोकतांत्रिक पारदर्शिता को लेकर बेहद जुनूनी थे. हम जो भी याचिका दायर करते थे, वह उसे बारीकी से पढ़ते थे. एक वकील होने के नाते फैसलों को भी गहराई से समझते थे. वह विद्वान और बेहद शानदार इंसान थे. दायर की जाने वाली याचिकाओं और संविधान से जुड़े बिंदुओं जिन्हें हम सुनवाई के दौरान उठाने वाले होते थे उस पर हम लंबे समय तक चर्चा करते थे.’
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने छोकर को श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें स्वच्छ चुनाव और चुनावी सुधारों का योद्धा बताया. वहीं, पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने कहा, ‘छोकर ने एडीआर के जरिये चुनावी लोकतंत्र को ऊंचे मानकों पर बनाए रखने में अभूतपूर्व योगदान दिया.’
राजद सांसद मनोज कुमार झा ने कहा, ‘छोकर का जाना उस अंतरात्मा का मौन हो जाना है, जो भारत के लोकतंत्र की पवित्रता के लिए लगातार बोलती रही. उनका जाना एक अधूरी विरासत छोड़ गया है, जिसे अब हम सबको आगे बढ़ाना होगा.’
सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने उन्हें लोकतंत्र और जनहित के सच्चे, निःस्वार्थ योद्धा करार दिया. उन्होंने कहा, ‘वह बेहद विनम्र और आडंबरहीन थे. बीते दो दशकों में उम्मीदवारों की संपत्ति और आपराधिक पृष्ठभूमि के खुलासे सहित कई बड़े चुनावी सुधारों के पीछे छोकर और एडीआर की ही भूमिका रही है.’
बता दें कि छोकर 1985 से 2006 तक भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद (आईआईएम-ए) में संगठनात्मक व्यवहार विभाग में प्रोफेसर (अध्यापक, शोधकर्ता और सलाहकार) रहे. उन्होंने संस्थान में डीन (2001-02) और कार्यकारी निदेशक (2002) का पद भी संभाला.
आईआईएम से जुड़ने से पहले छोकर भारतीय रेलवे में कार्यरत रहे थे और ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जापान और अमेरिका समेत कई देशों में अध्यापन भी किया था. निधन के बाद छोकर का शरीर चिकित्सा अनुसंधान के लिए नई दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज को दान कर दिया गया है.
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