नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (16 सितंबर) को एल्गार परिषद मामले के आरोपी महेश राउत को चिकित्सा आधार पर छह हफ़्ते की अंतरिम ज़मानत दे दी.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ कार्यकर्ता की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा सितंबर 2023 में नियमित ज़मानत दिए जाने के बावजूद उन्हें क़ैद में रखे जाने को चुनौती दी गई थी. जब राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने अपील के लिए समय मांगा तो इस आदेश पर पहले एक सप्ताह के लिए रोक लगा दी गई थी और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस रोक को बढ़ा दिया था.
राउत की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सीयू सिंह ने दलील दी थी कि रुमेटॉइड आर्थराइटिस से पीड़ित कार्यकर्ता को विशेष चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता है जो जेल या मुंबई के जेजे अस्पताल में उपलब्ध नहीं है. उन्होंने कहा, ‘हाईकोर्ट द्वारा ज़मानत दिए हुए दो साल हो गए हैं.’
हालांकि, एनआईए के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि आरोप गंभीर हैं क्योंकि राउत पर माओवादियों को फंड ट्रांसफर करने का आरोप है.
अंतरिम राहत देते हुए पीठ ने कहा, ‘आवेदक चिकित्सा आधार पर ज़मानत मांग रहा है, साथ ही यह तथ्य भी है कि उसे वास्तव में ज़मानत दी गई थी. हम छह हफ़्ते की अवधि के लिए चिकित्सा ज़मानत देने के पक्ष में हैं.’
बता दें कि महेश राउत को पुणे पुलिस ने जून 2018 में भीमा-कोरेगांव में 1 जनवरी, 2018 को हुई हिंसा के सिलसिले में गिरफ्तार किया था, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी. तब से वह गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों में महाराष्ट्र की तलोजा जेल में न्यायिक हिरासत में हैं.
मालूम हो कि एल्गार परिषद मामला पुणे में 31 दिसंबर 2017 को आयोजित गोष्ठी में कथित भड़काऊ भाषण से जुड़ा है. पुलिस का दावा है कि इस भाषण की वजह से अगले दिन शहर के बाहरी इलाके में स्थित भीमा-कोरेगांव युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई और इस संगोष्ठी का आयोजन करने वालों का संबंध कथित माओवादियों से था.
एनआईए ने 16 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है, जिनमें मानवाधिकार कार्यकर्ता, वकील और शिक्षाविद शामिल हैं. इन सभी पर प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) संगठन का हिस्सा होने का आरोप है. पुणे पुलिस ने यह भी दावा किया था कि आरोपियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘राजीव गांधी की तरह हत्या’ करने की योजना बनाई थी.
ज्योति जगताप की ज़मानत याचिका पर अक्टूबर में सुनवाई होगी
इसी मामले में एक अन्य आरोपी, कार्यकर्ता ज्योति जगताप ने भी ज़मानत के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है.
वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट ने पीठ के समक्ष उनकी याचिका का उल्लेख करते हुए बताया कि जगताप सितंबर 2020 से बिना किसी मुकदमे के हिरासत में हैं. उन्हें एल्गार परिषद के कार्यक्रम में कबीर कला मंच के अन्य सदस्यों के साथ भड़काऊ नारे लगाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. एनआईए का दावा था कि कबीर कला मंच भाकपा (माओवादी) का एक फ्रंटल संगठन है.
पीठ ने संकेत दिया कि वह अक्टूबर में उनकी याचिका को सूचीबद्ध करने पर विचार करेगी.
बॉम्बे हाईकोर्ट ने इससे पहले जगताप की ज़मानत याचिका खारिज कर दी थी और फैसला सुनाया था कि उनके खिलाफ एनआईए का मामला ‘प्रथमदृष्टया सत्य’ है और वह प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) संगठन द्वारा कथित तौर पर रची गई ‘बड़ी आपराधिक साजिश’ का हिस्सा थीं.
अदालत ने कहा था, ‘हमारा मानना है कि अपीलकर्ता के खिलाफ एनआईए के उन आरोपों या अभियोगों को प्रथमदृष्टया सत्य मानने के उचित आधार हैं, जिनमें उन्होंने आतंकवादी कृत्य की साजिश रची, प्रयास किया, उसकी वकालत की और उसे बढ़ावा दिया.’
