वाजपेयी पर मोदी की छाया मंडराती रही, भाजपा की राजनीति हिंदुत्व का रुख करती गई

पुस्तक समीक्षा: अभिषेक चौधरी की 'बिलीवर्स डिलेमा: वाजपेयी एंड द हिंदू राइट्स पाथ टू पावर' बताती है कि अटल बिहारी वाजपेयी उदार राजनीति व लोकतांत्रिक आदर्शों में अडिग दिखना चाहते थे, पर उनकी पार्टी और उत्तराधिकारियों ने उन्हें बार-बार उस जगह धकेला जहां उनके शब्द खोखले पड़ते गए. इस द्वंद्व ने न केवल भाजपा की दिशा बदली बल्कि भारतीय राजनीति को भी हिंदुत्व की ओर झुका दिया.

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(साभार: Pan Macmillan Publishing)

मैं अखिल विश्व का गुरु महान,
मेरा भी एक अपना स्थान.
मैं भी मानव का ही अंश हूं
क्यों न करू कुछ विशेष काम.

अटल बिहारी वाजपेयी की इन पंक्तियों में वही द्वंद्व झलकता है जो उनकी राजनीतिक यात्रा में बार बार दिखाई देता है. एक ओर कवि का आदर्शवाद, दूसरी ओर सत्ता और संगठन की कठोर राजनीति. अभिषेक चौधरी की हालिया किताब बिलीवर्स डिलेमा: वाजपेयी एंड द हिंदू राइट्स पाथ टू पावर 1977-2018 वाजपेयी के इसी जटिल व्यक्तित्व को उजागर करती है. यह उनके द्वारा लिखी वाजपेयी की जीवनी का दूसरा और अंतिम भाग है.

जहां वे कभी लोकतांत्रिक उदारता के प्रतीक दिखते हैं, तो कभी हिंदुत्व के राजनीतिक दबाव में समझौते करते नज़र आते है. जिसके ऐतिहासिक और राजनीतिक विश्लेषण के लिए चौधरी ने इसे ‘आस्थावान की दुविधा’ क़रार दिया है. वाजपेयी को केंद्र में रखकर यह किताब केवल एक नेता की जीवनी नहीं है बल्कि स्वतंत्रता के बाद भारतीय लोकतंत्र की बदलती राजनीति, हिंदुत्व की विचारधारा की जटिलता, भाजपा और जनसंघ के उताव चढ़ाव भरी यात्रा का जीवंत इतिहास भी है.

इस किताब की शुरुआत वाजपेयी के उन दिनों से होती है जब वह जनसंघ से अपनी राजनीतिक दीक्षा प्राप्त कर रहे थे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अनुशासनिक शाखा से निकले वाजपेयी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी वाणी, अपनी कविता, और सहजता के माध्यम से एक अलग पहचान रखते थे. लेकिन वह इस द्वंद्व से जूझते रहे कि कैसे संघ परिवार की कठोर वैचारिक सीमाओं के भीतर रहकर राष्ट्रीय राजनीति के बड़े मंच पर स्वीकार्य बनें.

पुस्तक बताती है वाजपेयी अपनी इस स्थिति को मॉडरेशन  की रणनीति से साधते थे. लेकिन इस सवाल पर किताब लगभग ख़ामोश है कि क्या यह मॉडरेशन सिद्धांतनिष्ठ था या एक व्यवहारिक राजनीतिक चाल? वाजपेयी की कवित्वपूर्ण वाणी और सहज व्यक्तित्व ने निःसंदेह उन्हें अलग पहचान दी लेकिन क्या उनकी यह पहचान संघ के विचारों से असहमति का परिणाम थी या संघ के विस्तार का एक परिष्कृत रूप ?

जनता पार्टी के प्रसंग को लेखक ने विस्तार से उठाया है, लेकिन विश्लेष्णात्मक दृष्टि से देखे तो वाजपेयी की भूमिका को अत्यधिक उदारवादी और समावेशी क़रार देना अतिश्योक्ति है.

1977 के बाद सत्ता की साझेदारी में जो अस्थिरता पैदा हुई उसमें वाजपेयी ज़रूर मेलजोल के पक्षधर दिखे. मगर वह कभी भी उस बुनियादी सवाल को चुनौती नहीं दे पाए कि क्या संघ की वैचारिक उपस्थिति लोकतांत्रिक साझेदारी के लिए बाधक है?

मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह के टकराव में उनकी मध्यस्थता का प्रयास सराहनीय था. लेकिन इसी समय उत्तर प्रदेश में एक राजनीतिक नाटक खेला गया, पहली बार भारत के राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी सार्वजनिक मंच पर आरएसएस प्रमुख बाबासाहेब देवरस के साथ बैठे. अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वागत भाषण दिया. इस पूरे सभा की अध्यक्षता जय प्रकाश नारायण कर रहे थे.

हालांकि संघ परिवार जेपी की इस मांग से बचता रहा कि वह स्वयं में मूलभूत सुधार करे, जनसंघ और जनता पार्टी के बीच संबंधों का यह प्रसंग केवल तात्कालिक राजनीतिक अस्थिरता का वर्णन नहीं है, बल्कि उस गहरे अंतर्विरोध का उद्घाटन करता है जो भारतीय राजनीति में संघ परिवार की भूमिका के साथ जुड़ा रहा है. सतही स्तर पर जनता पार्टी के सम्मेलनों में राष्ट्रपति और संघ प्रमुख की साझा उपस्थिति, या वाजपेयी का निष्पक्ष निर्णायक बनना लोकतांत्रिक विविधता का संकेतक लग सकता है. लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य से देखें, तो यह भारतीय राजनीति में आरएसएस की वैधता को स्थापित करने की सुनियोजित रणनीति थी.

बैंकों, योजनाओं और सरकारी संसाधनों को स्वयंसेवकों के नियंत्रण में लाकर संघ जनता पार्टी की सरकार को अपने विस्तार का माध्यम बना रही थी. यह लोकतंत्र में भागीदारी नहीं, बल्कि संस्थाओं के अधिग्रहण की वह फ़सल थी  जिसे 2014 के बाद भाजपा और आरएसएस ने मिलकर काटा है.

दल बदलने की दहलीज़ 

एक वाक़या अक्तूबर 1987 का है जब वाजपेयी के राजनीतिक और वैचारिक द्वंद्व दो परतों के रूप में सामने आए. पहला, व्यक्तिगत नैतिकता और मानवीय संवेदनशीलता, और दूसरा, राजनीतिक व्यावहारिकता. जनवरी 1988 की शुरुआत में जब भाजपा की बैठक कोचीन में हुई, तो पार्टी दो हिस्सों में बंटी हुई थी. एक ओर वे लोग थे जो शिवसेना के साथ हाथ मिलाना चाहते थे, और दूसरी ओर जो वी. पी. सिंह के साथ जाना चाहते थे. प्रमोद महाजन, जो उस समय पार्टी के सबसे लोकप्रिय युवा नेता के रूप में उभर चुके थे, ने ज़ोर देकर कहा कि बाल ठाकरे के साथ गठबंधन होना चाहिए. इसे लेकर राष्ट्रीय कार्यकारिणी में तीखी बहस हुई और अंततः अधिकांश वरिष्ठ नेताओं ने मान लिया कि भाजपा -शिवसेना गठबंधन हिंदू वोटों को एकजुट कर सकता है और दोनों दलों को लाभ पहुँचा सकता है।
लेकिन अटल बिहारी इस समय महाराष्ट्र में दलितों के ऊपर हो रहे अन्याय के प्रति बेहद दुखी थे. जब उनसे समापन भाषण देने को कहा गया, तो उन्होंने मना कर दिया. लेकिन प्रमोद महाजन के आग्रह पर उन्होंने माइक थामा, वे फफक पड़े, “मुझे अब अकेला ही छोड़ दीजिए. मैं अब आपके साथ और नहीं चल पाऊँगा.”

फिर उन्होंने व्यथित स्वर में कहा, ‘शिवसेना की दलितों के प्रति नफ़रत इतनी गहरी है कि वे महाराष्ट्र में किसी दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने नहीं देते. उन्हें चारपाई पर बराबर बैठने तक की इजाज़त नहीं देते. मैंने राजनीति में प्रवेश इसलिए किया था कि अपना जनेऊ तोड़कर धर्म और जाति की भावनाओं से ऊपर उठ सकूं.’

उन्होंने उस घटना का संदर्भ दिया जब बरसों पहले उन्होंने जनेऊ तोड़ा था, और इस तरह संकेत दिया कि यह मात्र एक प्रतीकात्मक कृत्य नहीं था, बल्कि उस सामाजिक विद्रोह का उद्घोष था जिसने उन्हें ‘सहिष्णु राष्ट्रवाद’ का चेहरा बनाया. लेकिन इसके बावजूद वे अपने आख़िरी दौर तक आरएसएस और भाजपा का हिस्सा बने रहे, जिसने जाति और धर्म कि राजनीति को अपना आधार स्तंभ बनाए रखा था. यह वाजपेयी के जीवन का एक बड़ा विरोधाभास था.

**FILE** New Delhi: In this May 11, 1998, file photo former prime minister Atal Bihari Vajpayee announces India's nuclear test, in New Delhi. Vajpayee, 93, passed away on Thursday, Aug 16, 2018, at the All India Institute of Medical Sciences, New Delhi after a prolonged illness. (PTI Photo) (PTI8_16_2018_000178B)
(फाइल फोटो: पीटीआई)

ऐसे समय जब उनके भीतर दल बदलने का विचार आया, वह संकेत देता है कि वे परिस्थितियों से बेहद व्यथित थे. वीपी सिंह के साथ नई पार्टी बनाने का विचार केवल सत्ता समीकरण तक सीमित नहीं था, बल्कि वाजपेयी के भीतर चल रही वैचारिक बेचैनी और असहमतियों का परिणाम भी था. हालांकि उन्होंने  दल बदलने का कदम नहीं उठाया, लेकिन यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि वे भाजपा की कट्टर राजनीति से खुद को दूर रखना चाहते थे. वे अंततः भाजपा में बने रहे, लेकिन उनकी राजनीति का स्वर हमेशा थोड़ा अलग, थोड़ा मानवीय और थोड़ा उदार बना रहा जो उन्हें अपने समय के अन्य नेताओं से अलग करता है. लेकिन उन्होंने वही किया जो उनकी पूरी राजनीति का आधार रहा-समझौता. वे क्षणिक रूप से विद्रोही दिखाई देते हैं, लेकिन लंबे समय तक संगठन की मुख्यधारा में बने रहते हैं.

मोदीत्व का प्रभुत्व 

इसके बाद भारतीय राजनीति में वह दौर आ धमका जिसकी ताप आज भी वर्तमान राजनीति में मौजूद है. यह दौर अटल के जीवन में सबसे कठिन पलों में से एक था. जहां उनकी लोकप्रियता भी अपनी अंतिम सांस ले रही थी. इसकी शुरुआत 19 जुलाई 2002 को समय से पहले ही गुजरात विधानसभा भंग होने से शुरू हुई. मोदी इस उम्मीद में थे कि चुनाव सितंबर तक कराए जा सकें. लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह ने गुजरात का दौरा किया और यह घोषित किया कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति अब भी सामान्य नहीं हुई है. चुनाव आयुक्त लिंगदोह का यह बयान मोदी कि राजनीतिक आकांक्षाओं  को परवान चढ़ने से रोक रहा था. जिसके परिणामस्वरूप मोदी ने अपने चुनावी प्रचार सभाओं में आयुक्त का नाम व्यंगात्मक रूप से लेते हुए आक्रामकता का रुख़ अख्तियार किया.

(साभार: इसी किताब से)

यह सब देखते हुए वाजपेयी ने औपचारिक बयान जारी कर मुख्यमंत्री को फटकार लगाई और उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि किसी को भी अपनी बात व्यक्त करते समय अनुचित भाषा या अशोभनीय संकेतों का प्रयोग नहीं करना चाहिए. लेकिन शायद वाजपेयी के सबसे करीब कहे जाने वाले आडवाणी भी उनके इस रवैये और आदर्शवाद से ख़ुश नहीं थे.

इस संदर्भ में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में वाजपेयी अपने आप को अकेला महसूस करने लगे. और यहीं से मोदी को प्रोत्साहन मिलता गया. उन्होंने ‘गौरव यात्रा’ शुरू की और खुद को एक मोहक वक्ता साबित किया. जिसका परिणाम यह हुआ कि मोदी वाजपेयी से भी ज़्यादा लोकप्रिय होते गए.

24 सितंबर 2002 को गांधीनगर के अक्षरधाम मंदिर पर हुए आतंकी हमले ने गुजरात और मोदी की राजनीति को परवान चढ़ने का मौका दे दिया. लेखक का यह मानना है कि इस घटना ने आतंकियों को उतना फायदा नहीं पहुंचाया जितना नरेंद्र मोदी को, क्योंकि इसने गुजरात में उनके उस वादे को और अधिक समर्थन दिलाया कि वे आतंकवाद पर कड़ा अंकुश लगाएंगे.

देखते ही देखते भविष्य के उत्तराधिकार की राजनीति में भी अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका बेहद प्रतीकात्मक होती गई. इसके दो कारण थे.  एक तरफ वाजपेयी की लोकप्रियता खोती जा रही थी और दूसरी तरफ उनका स्वास्थ ख़राब होता जा रहा था. राजनीतिक मंचों पर उनकी उपस्थिति धीरे-धीरे कम होती गई.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के अस्थि कलशों को नमन करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह. (फाइल फोटो साभार: ट्विटर/@BJP4India)

इस किताब का केंद्रीय बिंदु है कि वाजपेयी अपने जीवन में निजी विश्वास, उदार राजनीति और लोकतांत्रिक आदर्शों में अडिग दिखना चाहते थे, पर उनकी पार्टी और उत्तराधिकारियों ने उन्हें बार-बार उस स्थान पर धकेला जहां उनके शब्द खोखले पड़ते गए. इस द्वंद्व ने न केवल भाजपा की दिशा बदली बल्कि भारतीय राजनीति को भी हिंदुत्व की ओर झुका दिया.

(डॉ. प्रांजल सिंह, दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.)