नई दिल्ली: पत्रकार संगठन एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नॉर्वे और नीदरलैंड्स यात्रा के दौरान भारतीय अधिकारियों और पत्रकारों के बीच देखी गई तनातनी पर चिंता व्यक्त की है.
द टेलीग्राफ की खबर के मुताबिक, संगठन ने इसे मीडिया के सवालों के प्रति सरकार की बढ़ती असहिष्णुता बताया है.
इस संबंध में रविवार (24 मई) को जारी एक बयान में एडिटर्स गिल्ड ने कहा कि यूरोपीय पत्रकारों के साथ हुआ यह विवाद ‘शर्मनाक’ था और इस घटना ने भारत में प्रेस की आज़ादी और जवाबदेही को लेकर चिंताएं खड़ी कर दी हैं.
उल्लेखनीय है कि इस विवाद की शुरुआत नॉर्वेजियन पत्रकार हेले ल्यूंग द्वारा सोशल मीडिया मंच एक्स पर की गई उन टिप्पणियों के बाद हुई, जिनमें उन्होंने प्रधानमंत्री के नॉर्वे दौरे के दौरान मीडिया के सवालों का जवाब न देने का ज़िक्र किया था.
गिल्ड के अनुसार, यह टकराव तब शुरू हुआ जब एक प्रेस ब्रीफिंग के बाद पीएम मोदी ने स्थानीय पत्रकारों के सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया.
एडिटर्स गिल्ड ने बताया कि वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे और नीदरलैंड्स क्रमशः पहले और दूसरे स्थान पर हैं, जबकि भारत 180 देशों में से 157वें स्थान पर है.
इस बयान में विदेश मंत्रालय के एक सचिव की टिप्पणियों का ज़िक्र किया गया, जिन्होंने एक नॉर्वेजियन पत्रकार के सवाल का जवाब देते हुए पश्चिमी दुनिया के साथ ‘स्पष्ट सांस्कृतिक मतभेदों’ की ओर इशारा किया था.
गिल्ड ने कहा, ‘यह संभव है कि पश्चिमी पत्रकारों को भारत के अतीत के बारे में पूरी जानकारी न हो. या फिर उन्हें उस अहम भूमिका के बारे में भी पता न हो, जो भारतीय मीडिया ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के मूल में रहे मूल्यों के प्रति जागरूकता फैलाने में निभाई थी. लेकिन, लोकतंत्र में पत्रकारों के लिए सवाल पूछना ज़रूरी है—इस बात को लेकर वे सही थे.’
गिल्ड ने इसे ‘अफसोसनाक’ भी बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक दशक से ज़्यादा के कार्यकाल में अब तक एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित नहीं किया है.’
बयान में यह भी कहा गया है, ‘सवाल पूछे जाने के प्रति यही असहिष्णुता अब सरकार के सभी स्तरों पर—चाहे वह केंद्र स्तर हो या राज्य स्तर—बढ़ती हुए दिखाई दे रही है.’
संगठन के अनुसार, ‘मीडिया पर लगाई गई पाबंदियां हमारी अर्थव्यवस्था और हमारे समाज को नुकसान पहुंचाती हैं.’
यह मानते हुए कि अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग में इस्तेमाल की गई कार्यप्रणाली या उसमें संभावित पक्षपात को लेकर राय अलग-अलग हो सकती है, गिल्ड ने कहा कि ऐसे सूचकांकों में भारत की ‘बेहद खराब स्थिति’ ‘गंभीर चिंता का विषय’ है.
गिल्ड ने आगे कहा कि ये रैंकिंग दिखाती हैं कि मीडिया के लिए अपनी लोकतांत्रिक भूमिका को प्रभावी ढंग से निभाने का दायरा ‘लगातार सिकुड़ता जा रहा है.’
एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष संजय कपूर, महासचिव राघवन श्रीनिवासन और कोषाध्यक्ष टेरेसा रहमान द्वारा हस्ताक्षरित इस बयान में सरकार से यह भी अपील की गई है कि वह मीडिया को सत्ता में बैठे लोगों को जवाबदेह ठहराने की अपनी ज़िम्मेदारी निभाने के लिए एक विरोधी के तौर पर न देखे.
गौरतलब है कि बीते महीने 30 अप्रैल को रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) द्वारा जारी 2026 के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स) में भारत को 180 देशों में 157वें स्थान पर जगह मिली. इससे पहले 2025 में भारत 151वें स्थान पर था, यानी इस बार रैंकिंग में छह स्थान की गिरावट आई है.
भारत के लगभग सभी पड़ोसी देश इस इंडेक्स में भारत से ऊपर हैं – पाकिस्तान 153वें स्थान पर, भूटान 150वें पर, नेपाल 87वें पर, श्रीलंका 134वें पर और बांग्लादेश 152वें स्थान पर है. हालांकि, चीन 178वें स्थान पर है.
आरएसएफ ने भारत में प्रेस की आज़ादी के संकट के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी की भूमिका का ज़िक्र करते हुए कहा है:
पत्रकारों के खिलाफ बढ़ती हिंसा, मीडिया स्वामित्व का अत्यधिक केंद्रीकरण और मीडिया संस्थानों का तेज़ी से किसी ख़ास राजनीतिक विचारधारा की ओर झुकाव – इन सबके कारण ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र’ में प्रेस स्वतंत्रता संकट में है. इस देश पर 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार है, जो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता हैं और हिंदू राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी विचारधारा के प्रतीक हैं.
यह सूचकांक राजनीतिक, आर्थिक, कानूनी, सामाजिक और सुरक्षा जैसे कई मानकों पर आधारित है, और भारत के इन सभी क्षेत्रों में अलग-अलग स्कोर दिए गए हैं.
देश की फ़ैक्ट-फ़ाइल में कहा गया है कि भारत में मीडिया परिदृश्य व्यापक तो है, लेकिन ‘2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने और उनकी पार्टी तथा बड़े मीडिया घरानों के बीच निकटता बढ़ने के बाद मीडिया एक ‘अनौपचारिक आपातकाल’ जैसी स्थिति में आ गया है.’
