भगत सिंह: ‘मत समझो पूजे जाओगे क्योंकि लड़े थे दुश्मन से!’

जयंती विशेष: 28 सितंबर हो या शहादत दिवस (23 मार्च), इन चर्चाओं में इस बात पर हैरत व अफ़सोस जताने से परहेज़ संभव नहीं हो पाता कि देश का सत्तातंत्र भगत सिंह की शहादत का सिला उनके अरमानों से मुंह मोड़कर और उनके परिजनों से कृतघ्नता बरत कर देता आ रहा है.

(फोटो साभार: BHAGAT SINGH YOUTH ASSOCIATION )

वाकया तो खैर 1948 का है यानी 77 साल पुराना, लेकिन इस लिहाज से उल्लेखनीय है कि हमारे आज के सत्ताधीश, जो अब शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की याद और समाजवादी समाज व्यवस्था की स्थापना के अरमान से इस वाकये में वर्णित सलूक से भी बुरा बरत रहे हैं, तब न सिर्फ उस सलूक के मुखर आलोचक थे, बल्कि भगत सिंह को ‘अपने रंग में रंगकर’ अपनाने की अनेक सच्ची झूठी कवायदें भी किया करते थे. बहरहाल, पहले वाकया जान लेते हैं.

अखिल भारतीय किसान सभा के संस्थापक और देश में किसान आंदोलनों के जनक स्वामी सहजानंद सरस्वती उन दिनों के लोकप्रिय गीतकार शैलेंद्र के साथ शहीद-ए-आज़म के शहादत दिवस पर पंजाब के जालंधर में आयोजित एक सभा में भाग लेने जा रहे थे, तो पुलिस ने उन्हें रेलवे स्टेशन पर ही रोक लिया और कहा कि चूंकि शहर में निषेधाज्ञा लगा दी गई है, इसलिए उन्हें सभास्थल नहीं जाने दिया जा सकता.

इस पर सहजानंद सरस्वती ने शैलेंद्र की ओर देखकर कहा, ‘देखो तो सही, सत्ता में आते ही मदांध हो गए काले अंग्रेज जन-दमन में गोरों को भी मात कर देना चाहते हैं.’ फिर उन्होंने पुलिस के सिपाहियों से कहा कि या तो वे उन्हें सभास्थल तक जाने दें या निषेधाज्ञा तोड़ने के आरोप में गिरफ्तार कर लें.

अंततः पुलिस ने इस मामले में भी वही किया, जो वह ऐसे दूसरे मामलों में करती आई है. फिर तो आहत शैलेंद्र ने वहीं उस रेलवे स्टेशन पर ही एक कविता रची, जो बहुत लोकप्रिय हुई :

भगत सिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फांसी की!
यदि जनता की बात करोगे तुम गद्दार कहाओगे,
बम्ब-सम्ब को छोड़ो भाषण दिया तो पकड़े जाओगे.

निकला है कानून नया चुटकी बजते बंध जाओगे
न्याय अदालत की मत पूछो सीधे मुक्ति पाओगे
कांग्रेस का हुक्म, जरूरत क्या वारंट तलाशी की!
देशभक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फांसी की!

यह लंबी कविता नवंबर, 1948 में नरोत्तम नागर के संपादन में निकलने वाले ‘हंस’ में छपी तो पंजाब तो पंजाब, उत्तर प्रदेश की गोविंद वल्लभ पंत सरकार को भी हजम नहीं हो पाई. उसने मई, 1949 में इस पर प्रतिबंध लगाकर ही चैन पाया. प्रतिबंध के आदेश में लिखा गया-‘यह कविता निर्वाचित सरकार के प्रति आम लोगों में घृणा जगाती है.’

विडंबना यह कि अपने प्रति घृणा को लेकर कुछ ज्यादा ही सचेत चुनी हुई सरकारों के उस दौर से लेकर आज, खुद आपादमस्तक घृणा के कारोबार में डूबी सरकारों के दौर तक शहीद-ए-आज़म को लेकर होने वाली चर्चाएं जैसे एक ही बिंदु पर ठहरी रहने को अभिशप्त हो गई हैं.

इसलिए उनकी जयंती (28 सितंबर) हो या शहादत दिवस (23 मार्च), इन चर्चाओं में इस बात पर हैरत व अफसोस जताने से परहेज़ संभव नहीं हो पाता कि देश का सत्तातंत्र उनकी शहादत का सिला उनके अरमानों से मुंह मोड़कर और उनके परिजनों से कृतघ्नता बरतकर देता आ रहा है.

दूसरी ओर उनके अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने का नारा लगाने वालों ने भी अपनी सुविधा के अनुसार उनके ऐसे-ऐसे ‘वायवीय’ रूप गढ़ लिए हैं कि उनकी भरमार के बीच वह भगत सिंह कहीं गुम से होकर रह गए हैं, जिन्होंने बहुचर्चित असेंबली बम कांड के मुकदमे के सिलसिले में जनवरी, 1930 में अपनी अपील में यह ऐतिहासिक बयान दिया था कि ‘पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है.’ उनका कहना था कि यही वह चीज थी, जिसे वे और उनके साथी प्रकट करना चाहते थे.’

प्रसंगवश, 2017 में इतिहासकार विपिन चंद्रा द्वारा लिखी और मानव संसाधन मंत्रालय के सहयोग से दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित ‘भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’ शीर्षक पुस्तक में शहीद-ए-आज़म को ‘क्रांतिकारी आतंकवादी’ बताए जाने को लेकर विवाद हुआ तो भी देश ने इस बात को गहरी निराशा के साथ देखा था कि जब हमारा सत्ता तंत्र गृह मंत्रालय की अंग्रेजों के वक्त से चली आ रही आतंकवादियों की काली सूची से भगत सिंह का नाम हटाने को लेकर भी जिम्मेदारी की भावना प्रदर्शित नहीं कर पाया तो उससे यह अपेक्षा व्यर्थ ही है कि वह उनकी शहादत को उपयुक्त सम्मान देगा.

बम की पूजा बनाम बम का दर्शन

यों, शहीद-ए-आज़म और उनके साथी स्वतंत्रता-युद्ध में जूझ रहे थे, तब भी उनकी क्रांतिकारिता को लेकर सर्वानुमति नहीं थी. एक ओर उनके द्वारा ऐलान किया जा रहा था कि उन्हें इस युद्ध के लिए ऐसे नौजवान चाहिए जो आशा की अनुपस्थिति में भी भय व झिझक के बिना युद्ध जारी रख सकें और आदर-सम्मान की आशा रखे बिना ऐसी मुत्यु का वरण करने को तैयार हों, जिसके लिए न कोई आंसू बहे और न स्मारक बने, तो दूसरी ओर उन्हें महात्मा गांधी और उनके ‘अहिंसक’ समर्थकों के साथ ‘बम की पूजा’ और ‘बम के दर्शन’ के विवाद में उलझना पड़ रहा था.

इन क्रांतिकारियों ने 23 दिसंबर, 1929 को दिल्ली आगरा रेल लाइन पर वायसराय लार्ड इरविन की स्पेशल ट्रेन को बम से उड़ाने वाली कार्रवाई की, तो महात्मा गांधी ने वायसराय की रक्षा के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हुए ‘यंग इंडिया’ में ‘बम की पूजा’ शीर्षक लेख लिखकर क्रांतिकारियों की तीखी आलोचना की थी. तब क्रांतिकारियों के सिद्धांतकार भगवतीचरण वोहरा ने भगत सिंह से सलाह मशवरा करके ‘बम का दर्शन’ लिखा और उन्हें जवाब दिया था.

ये क्रांतिकारी कभी इस बात को छिपाते नहीं थे कि वे ब्रिटिश साम्राज्यवाद से इसलिए युद्धरत हैं कि समाजवादी समाज व्यवस्था की स्थापना करना चाहते हैं. इसीलिए वे चाहते थे कि गिरफ्तारी के बाद उनसे युद्धबंदियों जैसा बरताव किया जाए. उनका ऐलान था: ‘दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उलफत’ और उनकी ‘मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी’.

इसके साथ ही उन्हें उम्मीद थी कि ‘हवाओं में रहेगी मेरे खयालों की बिजली, ये मुश्तेखाक है फानी, रहे रहे न रहे.’

भगत सिंह प्रायः कहा करते थे कि गोरे अंग्रेजों की जगह काले या भूरे साहबों के आ जाने भर से देश और देशवासियों की नियति नहीं बदलने वाली.

दुर्भाग्य से आज़ादी के बाद जहां सत्तातंत्र द्वारा देश और देशवासियों की इस नियति को बदलने के प्रयत्न जरूरी नहीं समझे गए, वहीं खुद को भगत सिंह के अधूरे अरमानों को लेकर चिंतित बताने वालों ने भी खुद को उनकी मान रक्षा के बेहिस प्रतीकात्मक प्रयत्नों में मुब्तिला कर लेना ही ठीक समझा.

वे इतनी-सी बात को लेकर खुश होने को तैयार हो गए कि पंजाब में हुसैनीवाला बार्डर के उस पवित्र स्थान पर, जहां गोरे हुक्मरानों ने 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु के पार्थिव शरीरों को बेहद अपमानपूर्वक जलाने की कोशिश की थी, राजधानी दिल्ली के इंडिया गेट पर लगातार प्रज्ज्वलित ‘अमर जवान ज्योति’ की तर्ज पर ‘अमर ज्योति’ प्रज्ज्वलित होती रहे.

हम जानते हैं कि जनाक्रोश भड़कने के डर से लाहौर सेन्ट्रल जेल में इन तीनों को फांसी की निश्चित तारीख 24 मार्च से एक दिन पहले ही सारे नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए शहीद कर दिया गया था.

कोई तो सूद चुकाए..!

लेकिन ऐसी किसी ज्योति से उनकी शहादतों के सम्मान की प्रतीकात्मक रक्षा ही सम्भव है और सच्ची श्रद्धांजलि उनको अभीष्ट इंकलाब का रास्ता हमवार करके ही दी जा सकती है, जो अभी भी उधार है और जिसका जिम्मा लेने या सूद चुकाने को कोई तैयार नहीं दिखायी देता.

कई हलकों को तो यह समझने में भी हिचक है कि भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु तीनों ही 13 अप्रैल, 1919 को जलियांवाला बाग में मदांध गोरी सत्ता द्वारा किए गए नरसंहार से विचलित और प्रतिरोध के अहिंसक या गांधीवादी तरीकों से निराश होकर क्रांतिकारी बने थे.

30 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन में पंजाबकेसरी लाला लाजपतराय गोरी पुलिस की लाठियों से घायल हुए और मर्मान्तक तकलीफें झेलकर 17 नवंबर, 1928 को उन्होंने अंतिम सांस ली, तो उन्होंने ठीक एक महीने बाद 17 दिसंबर को एक क्रांतिकारी एक्शन में उक्त लाठीचार्ज के जिम्मेदार अंग्रेज अधिकारी जाॅन पी. सांडर्स को योजनाबद्ध ढंग से गोलियों से भून डाला था.

ऐसा करके उन्होंने जताया था कि काकोरी ट्रेन एक्शन के नायकों की शहादतों के बावजूद देश के नौजवानों का खून ठंडा नहीं पड़ा है.

बाद में आठ अप्रैल, 1929 को भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ दिल्ली में केंद्रीय असेंबली में बम और पर्चे फेंके तो उनका उद्देश्य था- दो अत्यधिक दमनकारी कानूनों के विरोध की देश की आवाज को बहरी सरकार के कानों तक पहुंचाना. इस उद्देश्य की पूर्ति के बाद वे भागे नहीं, वहीं खुद को गिरफ्तार करा लिया और अपने खिलाफ चली समूची अदालती कार्रवाई को अपनी अनूठी क्रांतिकारी चेतना और विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए इस्तेमाल किया.

भाग्यशाली बनाम अनीश्वरवादी

थोड़ा-पीछे मुड़कर देखें तो 28 सितंबर, 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के एक गांव में भगत सिंह का जन्म हुआ तो उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह व स्वर्ण सिंह क्रांतिकारी गतिविधियों के सिलसिले में जेलों में थे. तीनों को उसी दिन रिहाई मिली तो माना गया कि नवजात शिशु अच्छा भाग्य लेकर आया है. उसका नाम भगत रखा गया, पंजाबी में जिसका अर्थ भी है- भाग्यशाली.

माता विद्यावती उसको प्यार से भगता बुलाती थीं- भगता यानी भागों वाला. लेकिन बाद में अनीश्वरवादी भगत सिंह को न भाग्य में, न ही भगवान में भरोसा रह गया.

1925-26 में उन्होंने बलवंत सिंह नाम से अपने क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत की और जल्दी ही उसके कई आयाम विकसित कर लिए. क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाने के प्रयत्नों के क्रम में लखनऊ के पास काकोरी में ट्रेन पर ले जाए जा रहे सरकारी खजाने की लूट के ऐतिहासिक कांड में मृत्युदंड प्राप्त रामप्रसाद बिस्मिल को छुड़ाने की जद्दोजहद में असफलता हाथ आने के बावजूद वे निराश नहीं हुए और हिंदु्स्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (जो बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन में बदल गया) के ‘पीले पर्चे’ यानी संविधान में एक ऐसे समाज के निर्माण का संकल्प दोहराया, जिसमें एक मनुष्य द्वारा दूसरे का शोषण संभव न हो.

अपने दो साल के जेल जीवन का तो उन्होंने पढ़ने और लिखने में ऐसा सदुपयोग किया कि कई लोग उन्हें भारत का लेनिन कहने लगे. कहते हैं कि शहादत के लिए ले जाए जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे. कम ही लोग जानते हैं कि उन्हें दिल्ली से मियांवाली सेंट्रल जेल स्थानांतरित किया गया तो उन्होंने वहां कैदियों से भेदभाव के खात्मे और उनके अधिकार उन्हें दिलाने के लिए लंबी भूख हड़ताल भी की थी.

उनकी शहादत के बाद उनकी माता विद्यावती को ‘पंजाब माता’ की उपाधि दी गई तो पंजाबी के लोकप्रिय कवि संतराम ‘उदासी’ ने अपनी एक कविता में सवाल उठाया था कि क्या भगत सिंह ने सिर्फ पंजाब के लिए जान दी थी? देश के लिए दी थी तो उनकी माता को ‘देशमाता’ का खिताब क्यों नहीं? लेकिन किसी ने भी उनकी बात नहीं सुनी.

मत समझो पूजे जाओगे!

सवाल है कि हमारी इस कृतघ्नता के रहते उन्हें अभीष्ट इंकलाब की राह कैसे हमवार होगी? खासकर, जब उसके लिहाज से ‘चुनी हुई’ सरकारें अपने रंग-ढंग से सांपनाथ के बाद नागनाथ की कहावत को चरितार्थ करने में लगी हैं और शैलेंद्र की शुरू में उल्लिखित कविता को कतई अप्रासंगिक नहीं होने देना चाहतीं.

पढ़िए उस कविता का यह बाकी हिस्सा:

मत समझो, पूजे जाओगे क्योंकि लड़े थे दुश्मन से,
रुत ऐसी है आंख लड़ी है अब दिल्ली की लंदन से,
कामनवैल्थ कुटुंब देश को खींच रहा है मंतर से–
प्रेम विभोर हुए नेतागण, नीरा बरसी अंबर से,
भोगी हुए वियोगी, दुनिया बदल गई बनवासी की !

गढ़वाली जिसने अंग्रेज़ी शासन से विद्रोह किया,
महाक्रान्ति के दूत जिन्होंने नहीं जान का मोह किया,
अब भी जेलों में सड़ते हैं, न्यू-माडल आज़ादी है,
बैठ गए हैं काले, पर गोरे ज़ुल्मों की गादी है,
वही रीति है, वही नीति है, गोरे सत्यानाशी की !

सत्य अहिंसा का शासन है, राम-राज्य फिर आया है,
भेड़-भेड़िए एक घाट हैं, सब ईश्वर की माया है !
दुश्मन ही जब अपना, टीपू जैसों का क्या करना है ?
शांति सुरक्षा की ख़ातिर हर हिम्मतवर से डरना है !
पहनेगी हथकड़ी भवानी रानी लक्ष्मी झांसी की.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)