अन्याय का प्रतिरोध सिर्फ़ साहस नहीं, रुचि का भी सूचक है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: साहित्य में न कहने की कई विधियां संभव हैं और कौशल और कल्पना ऐसी नई विधियां भी खोज सकते हैं, जो न कह जाएं लेकिन आपत्तिजनक न लगें या दिखाई दें. क्या हमारे समय में चतुराई और हिकमत से ऐसा न कहा जा रहा है? या कि अधिकांशतः न कहने से बचा जा रहा है?

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

पोलिश कवि ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त का एक इंटरव्यू पढ़ रहा था. उसमें पहला ही प्रश्न कवि से पूछा गया कि उनकी कविता प्रायः नकार का स्वर धारण करती है. न कहना आसान नहीं है क्योंकि आप अगर अक्सर न कहते हैं तो आपको नकारवादी क़रार दिया जा सकता है. हेर्बेर्त के यहां कुछ भी परिभाषित करना हो, कोई अवधारणा, कोई वस्तु, कोई व्यक्ति तो वे नकार का सहारा लेते हैं.

उनके समूचे काव्य-व्यवहार से स्पष्ट है, और जिसने उन्हें अपने समय में पोलैंड का कलात्मक अंतःकरण बनाया, कि यह नकार उनके गहरे प्रतिरोध से निकला था- उन्हें अपना समय, उसकी बंदिशें और जकड़बंदियां, उसके अन्याय और अत्याचार स्वीकार नहीं थे और उनके यहां यह नकार, यह अस्वीकार उनकी कविता को ऐसी नैतिक आभा और आशय देता था जो उनके कई समकालीनों के यहां, उनकी प्रतिभा और कौशल के बावजूद, नहीं थे. अपने समय के विद्रूपों में इन समकालीनों की लिप्ति या हिस्सेदारी न भी हो, उनमें न कहने का, स्पष्ट और बेबाक, साहस नहीं था.

नात्सी तानाशाही के बाद सोवियत तानाशाही का शिकार हुए उनके देश में लेखकों द्वारा जीवनयापन और अपने साहित्य को बचाने के लिए समझौते करना, चुप रहना, न कहने की हिम्मत न जुटा पाना, कायरों की जमात में शामिल होने से इनकार न कर पाना व्यावहारिक विकल्प था. जिजीविषा यानी जीने की इच्छा उसका मानवीय औचित्य भी थी. जिजीविषा ही हमें अक्सर कायर और कभी-कभार साहसी बनाती है.

हेर्बेर्त ने यह भी कहा कि दुर्भाग्य से हम इस विश्वास से परिचालित रहे कि सुंदरता हमें बचा नहीं सकती; कि जो अच्छा है वह अक्सर सुंदर नहीं है, न हो सकता है. इसने सुंदरता को निरा कलावादी व्यवहार बना दिया और साधारण की अपार सुंदरता से हमें विरत कर दिया.

इस समय जिस वातावरण में हम हैं, उसमें जो झगड़े-झांसे हैं, झूठ और घृणा की व्याप्ति है, भव्यता क्रूरता और हिंसा को ढांपने का आवरण है, उसमें जो लोभ और तनाव हैं, जो निष्करुण गतिविधियां हैं, भाषा का दैनिक अवमूल्यन है उसमें न, न कह पाना, प्रतिरोध करने से बचना सिर्फ़ साहस का वक़्ती तौर पर अभाव, या हमारी सुरक्षाकामिता की अभिव्यक्ति भर है या कि उसमें हमारे सर्जनात्मक-नैतिक चित्त के लगभग जैविक रूप से बदल जाने के गंभीर रोग का लक्षण है?

आज साहित्य में जो चुप्पियां हैं और जो मुखरताएं हैं उनका नैतिक आधार और औचित्य क्या है? साहित्यिक नैतिकता और मानवीय व्यवहार के वे कौन से तकाजे हैं जो यह संभव कर रहे हैं?

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पोलैंड में जो कवि ऐतिहासिक, सबसे लोकप्रिय और वरेण्य कवि साबित हुए, वे थे, जिन्होंने न कहा था. सही है कि न कहने के कई ढंग होंगे. साहित्य में न कहने की कई विधियां संभव हैं और कौशल और कल्पना ऐसी नई विधियां भी खोज सकते हैं जो न कह जाएं, लेकिन आपत्तिजनक न लगें या दिखाई दें.

क्या हमारे समय में चतुराई और हिकमत से ऐसा न कहा जा रहा है? या कि अधिकांशतः न कहने से बचा जा रहा है? हमारी चुप्पी, जो कुछ अनपेक्षित और अवांछनीय हमारे इर्द-गिर्द घट रहा है, उसका स्वीकार न मान ली जाए, इसका कितना जतन हम कर रहे हैं, यह सवाल तो उठता ही है. ‘ऐसा तो कमोबेश हमेशा या पहले भी होता आया है’ या कि ‘यह समय भी बीत जाएगा’ जैसे बचाव पोच, अनैतिक और बौद्धिक-सर्जनात्मक रूप से दयनीय हैं.

सब कुछ अभिधा में न हो सकता है, न ही होना वांछनीय है.

हेर्बेर्त ने ही कहा था कि ‘यह साहस का मामला नहीं रुचि का मामला था’. क्या अत्याचार-अनाचार-हिंसा-घृणा का विरोध करने में हमारी रुचि है? क्या वह हमारे स्वभाव का हिस्सा है? क्या हम साहित्य को साहस और अंतःकरण की नैतिक विधा मानते हैं? क्या हम कविता में लोकतांत्रिक, स्वतंत्रता-समता-बंधुता के पालक और रक्षक हैं? क्या कविता आज समाज को प्रखर और तेजस्वी अंतःकरण होने से विरत हो सकती है? अगर नहीं, तो उसका प्रतिरोध दिखाई-सुनायी क्यों नहीं देता?

महादेवी ने अपनी एक प्रसिद्ध कविता में चिंगारियों का एक ‘मेला’ की बात की है. आज यहां-वहां और जब-तब चिंगारियों ज़रूर नज़र आती हैं पर उनका ‘मेला’ क्यों नहीं है?

दीवाली आ रही है. दिल्ली की दुकानों में उस समय दिए जाने वाले मिठाई आदि के उपहारों के सजीले पैकेट बनना शुरू हो गए हैं. ग़ालिब का मिसरा है: ‘ज्यों चिराग़ानेदिवाली सफ़ ब सफ़ जलता हूं मैं’.

एक बूढ़ा कवि यह दिवास्वप्न देख रहा है कि इस बार दीवाली के आसपास जो भी साहित्यिक आयोजन हों, सब ‘ चिंगारियों के मेले’ के संस्करण हों! यह मुमकिन नहीं लगता पर सपना देखने से कवि को कौन रोक सकता है?

‘सेकेंड हैंड यूरोप’

कुछ दशक पहले रूसी और पूर्वी यूरोपीय साहित्य में हम काफ़ी दिलचस्पी लेते थे. सोवियत साहित्य और सामाजिक यथार्थवादी साहित्य में और उसके हश्र में हमारी दिलचस्पी थी. हमें उन कवियों आदि की खोज रहती थी जो आधिकारिक सोवियत दायरे से अलग और असहमत थे. हम पूर्वी यूरोप में, पोलैंड-हंगारी-चेकोस्लोवाकिया, रूमानिया-बलगारिया आदि देशों में उस कविता को पाकर उद्वेलित होते थे जो सारी जकड़बंदियों के बावजूद मनुष्य बने रहने और सचाई को कह सकने का साहस और नवाचार चरितार्थ करती थी.

धीरे-धीरे, शायद समूचे भारत में, पर कम से कम हिंदी में यह जिज्ञासा घटती गई है कि संसार की कविता में क्या हो रहा है. बहुत से लेखक, जिनमें युवाओं का प्रतिशत अधिक है, अब इस मुग़ालते में हैं कि हम राष्ट्रीय और इसलिए अपने आप अंतरराष्ट्रीय हो रहे हैं और हमें अन्य क्या हो रहा है इसे जानने की अब दरकार नहीं, बिना जाने-समझे ही सारी वसुधा हमारा कुटुंब है. विश्वगुरु होने की दयनीय मनोग्रंथि का यह एक संस्करण है.

ऐसे लोग कम नहीं हैं जो अभी कल तक राजनीति और साहित्य में अनिवार्य संबंध देखते-खोजते थे. यह थोड़े अचरज की बात है कि यूरोप के इस हिस्से में राजनीति लोकतंत्रात्मक हुई, उसमें खुले बाज़ार की आर्थिकी विकसित हुई, उसने खुद को अधिक वास्तविक यूरोप होने का दावा करना भी शुरू किया, लेकिन उस हिस्से में किस तरह का साहित्य लिखा जा रहा है, यह हमारे ध्यान और जिज्ञासा के भूगोल से लगभग ग़ायब हो गया.

बदली राजनीति और अर्थव्यवस्था ने किस तरह के साहित्य को जन्म दिया और पाला-पोसा है इसकी कोई ख़बर अब हम नहीं लेते. इसकी भी कि इन देशों के उत्तर-सोवियत और उत्तर-समाजवादी यथार्थवाद के समय में कितनी बहुलता है, अपनी नियति और स्थिति को लेकर कैसी और कितनी विडंबनाओं का तीख़ा-सक्रिय बोध है.

सही है कि संसार उसका भूगोल भर नहीं होता. पर संसार, बिना भूगोल को जाने-पहचाने, हम साहित्य में स्वायत्त भी नहीं कर सकते.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)