जब बापू ने अंग्रेज़ों को लिखा था खुला ख़त…

गांधी जयंती विशेष: महात्मा गांधी ने आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेज़ों से शत्रुता नहीं, बल्कि न्याय और सम्मान पर आधारित मित्रता की अपील की थी. जलियांवाला बाग़ जैसे नरसंहार और दमन के बीच भी उन्होंने उन्हें खुला ख़त लिखकर उनसे आत्ममंथन और बदलाव का आह्वान किया था. हालांकि यह कारगर नहीं हुआ.

इतने खराब बर्ताव के बावजूद महात्मा ने अंग्रेजों की सदाशयता में विश्वास नहीं खोया और उनको खुला खत लिखकर इच्छा जताई कि भारत में रहने वाला प्रत्येक अंग्रेज उसे पढ़कर उस पर विचार करे.(फोटो: pixabay)

अयोध्या: महात्मा गांधी को यों ही महात्मा नहीं कहा जाता. वे, और तो और, उस अंग्रेज कौम से भी शत्रुता के बजाय मित्रता ही चाहते थे, जिसके वर्चस्व वाले ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विकट संघर्ष में मुब्तिला थे. अलबत्ता, वे चाहते थे कि यह मित्रता न्याय और सम्मान पर आधारित हो.

आज की तारीख में कम ही लोग जानते होंगे कि उन्होंने भारत में रहने वाले अंग्रेजों को मित्रता की अपनी यह इच्छा बताने और उनकी सोई भलमनसाहत को जगाने के लिए उनके नाम एक लंबा खुला खत लिखा था.

इसके बावजूद कि चंद दिनों ब्रिटेन में सत्तारूढ़ लिबरल पार्टी और उसके प्रधानमंत्री लॉयड जार्ज वचनभंग पर उतरकर भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का निर्मम दमन तो कर ही रहे थे, महात्मा से व्यक्तिगत शत्रुता बढ़ाने में भी कुछ उठा नही रख रहे थे.

नृशंसता के बावजूद

ज्ञातव्य है कि लॉयड जॉर्ज (जो 6 दिसंबर, 1916 से 19 अक्टूबर, 1922 तक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे) और उनकी पार्टी ब्रिटिश साम्राज्य की तथाकथित महानता से इतने अभिभूत थे कि प्रायः उसके गुन गाते रहते थे. उनकी निगाह में इस साम्राज्य की ‘महानता’ के आगे लोकतंत्र के गुणों व मूल्यों का कोई मोल नहीं था.

इस साम्राज्य द्वारा भारत पर किए गए कब्जे को वे इस सीमा तक वैध करार देते थे कि उसके स्वतंत्रता संघर्ष को विफल करने के लिए उन्हें साधारण उत्पीड़न व दमन कौन कहे, नरसंहार जैसी नृशंस कार्रवाइयों से भी परहेज नहीं था.

उनकी सरकार 13 अप्रैल,1919 को पंजाब में अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर के आदेश पर किए गए भीषण नरसंहार का पक्ष लेते भी नहीं शरमाती थी. चौतरफा जगहंसाई और भारी दबाव के बीच उसकी जांच के लिए उसने लॉर्ड विलियम हंटर की अध्यक्षता में आयोग भी बनाया, तो उसे लीपापोती से आगे बढ़ने देने की जरूरत नहीं समझी थी. इसलिए डायर के विरुद्ध इस्तीफे के अलावा कोई और सख्त कार्रवाई संभव नहीं हो पाई थी.

होती भी कैसे, लॉयड जार्ज भारत जैसे उपनिवेशों को ब्रिटिश साम्राज्य की ‘महान उपलब्धि’ मानते थे और उनको किसी भी कीमत पर जस का तस बनाए रखना चाहते थे.1930 के दशक में, इंडिया डिफेंस लीग के सदस्य के रूप में भी उन्होंने ब्रिटिश सरकार से भारत को स्वशासन न देने की ही पैरवी की थी.

ऐसे में स्वाभाविक ही था कि महात्मा गांधी उन्हें फूटी आंखों भी नहीं सुहाते. इसलिए वे उन्हें जेलों में सड़ाकर बेदम कर देने का मंसूबा रखते थे और उसे छिपाते भी नहीं थे.

उनके इस मंसूबे के बीच 10 मार्च, 1922 को बम्बई (अब मुम्बई) में ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा महात्मा को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें छह साल की जेल की सजा सुना दी गई थी. इस सजा का आधार ‘यंग इंडिया’ में उनके द्वारा लिखे गए तीन लेखों को बनाया गया था. वह तो जेल में दो साल बीतते-बीतते उनका स्वास्थ्य इतना खराब हो गया कि विवश होकर उन्हें रिहा कर देना पड़ा.

सदाशयता में विश्वास

इतने खराब बर्ताव के बावजूद महात्मा ने अंग्रेजों की सदाशयता में विश्वास नहीं खोया और उनको खुला खत लिखकर इच्छा जताई कि भारत में रहने वाला प्रत्येक अंग्रेज उसे पढ़कर उस पर विचार करे.

उस काल के प्रतिष्ठित स्वतंत्रता सेनानी और साहित्यसेवी हरिभाऊ उपाध्याय ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘बापू कथा (उत्तरार्द्ध)’ में इस पत्र का विस्तार से जिक्र किया है. इस पुस्तक में उन्होंने बापू के ही शब्दों और कर्मों के सहारे उनके जीवन के उत्तरार्ध की वह कथा कही है, जो वे अपनी आत्मकथा में इसलिए नहीं कह पाए थे कि उसमें अपने जन्म से लेकर 1920 तक की ही घटनाएं लिखी थीं.

आज की तारीख में कुछ जानकार उसे 1920 से आगे न बढ़ाने को उसे लेकर महात्मा की अनिच्छा के रूप में देखते हैं और कुछ इस रूप में कि आगे विषम उलझावों के कारण वे इस काम के लिए समय ही नहीं निकाल पाए.

बहरहाल, अंग्रेजों को उक्त खुले खत में उन्होंने लिखा था,

‘मेरी नाकिस राय के अनुसार ब्रिटिश सरकार के साथ अब तक जितना सहयोग मैंने किया है, उतना किसी और हिंदुस्तानी ने नहीं किया होगा. विद्रोह या बगावत की प्रेरणा देने वाली कठिन परिस्थितियों में रहकर भी लगातार उन्तीस साल तक मैंने आपके साम्राज्य की सेवा की है. विश्वास रखिए कि यह सेवा मैंने कानूनों द्वारा नियोजित सजाओं के डर से या और किसी भी स्वार्थ के हेतु से नहीं की है. यह सहयोग स्वतंत्र और अपनी मर्जी से था और इस विश्वास से प्रेरित होकर किया गया था कि ब्रिटिश सरकार जो कुछ कर रही है, वह कुल मिलाकर भारत के हित में ही है.

इसी विश्वास के कारण मैंने साम्राज्य की खातिर अपने को चार बार जोखिम में डाला….ये सारी सेवाएं मैंने इस विश्वास के बल पर की थीं कि मेरी इन सेवाओं से साम्राज्य में मेरे देश को सम्मान का पद मिलेगा. परंतु श्री लॉयड जार्ज द्वारा किए गए विश्वासघात और आपने जिस ढंग से उनके व्यवहार की सराहना की तथा पंजाब में किए गए अत्याचारों पर परदा डालने की कोशिश की, उसके कारण सरकार और उस राष्ट्र की नेकनीयती पर से, जो ऐसी सरकार का समर्थन करता है, मेरा सारा एतबार उठ गया है.’

जब एतबार उठ गया

इस खत में आगे उन्होंने यह भी बताया था कि एतबार उठ जाने के बाद ब्रिटिश साम्राज्य का भारत के और उनके लिए क्या अर्थ हो गया है. उन्हीं के शब्दों में ये अर्थ इस प्रकार हैं:

1. ब्रिटेन के लाभ के लिए भारत की संपत्ति का शोषण, रोज-रोज बढ़ता हुआ सैनिक खर्च और संसार के किसी भी देश की अपेक्षा महंगे प्रशासनिक अधिकारी.
2. भारत की दरिद्रता का रत्ती भर भी खयाल न रख कर अनाप-शनाप खर्च से संचालित सारे सरकारी विभाग.
3. हम लोगों (यानी भारतीयों) के बीच रहने वाले मुट्ठी भर अंग्रेजों की जान कहीं जोखिम में न पड़ जाये, इस डर से सभी लोगों के हथियार छीन लेना और उसके परिणामस्वरूप लोगों में उत्पन्न कायरता.
4. ऐसी अत्यंत खराब सरकार को चलाने के लिए शराब व अफीम आदि मादक पदार्थों का व्यापार.
5. जनता के उद्वेग को प्रकट करने के लिए रोज-ब-रोज बढ़ते हुए आंदोलन को दबा देने की खातिर आये दिन दमन और सख्त कानून.
6. आपके (यानी ब्रिटिश) उपनिवेशों में रहने वाले भारतीयों के प्रति किया जाने वाला शर्मनाक बर्ताव और
7. हमारी (यानी भारतवासियों की) भावनाओं की उपेक्षा करके पंजाब के शासन को दिया गया प्रशंसा का प्रमाण पत्र और मुसलमानों की भावनाओं का तिरस्कार.

आगे उन्होंने लिखा था, ‘आज लोग बड़ी संख्या में हमें सुनने को इसलिए चले आते हैं कि हम आपके जुल्म से कराहते हुए लोगों की आंतरिक भावनाओं को वाणी देते हैं…. मेरा धर्म आपके प्रति मेरे अंतर में किसी भी प्रकार की कटुता रखने की मनाही करता है. मेरी कलाई में जोर हो, तो भी मैं अपना हाथ आपके खिलाफ नहीं उठाऊंगा. मैं अपने कष्ट सहन से ही आपको जीतने की आशा रखता हूं. आप लोकभावना के इस चढ़ते हुए ज्वार को दबा देने के उपाय की तलाश में हैं. मैं आपको बता दूं कि इसका एक ही उपाय है, और वह यह कि रोग के कारणों को ही ढूंढ कर दूर कर दिया जाए.’

उन्होंने भारतवासी अंग्रेजों से यह अपेक्षा भी की थी कि वे लॉयड जार्ज को अपने देश के पहले के वचन का पालन करने और वायसराय को अपने पद से हट जाने को मजबूर करने के लिए दबाव डालें. साथ ही माइकेल ओ डायर और जनरल डायर के बारे में अपने विचार बदल लें और सरकार को लोगों के माने व चुने हुए सब मत के नेताओं की परिषद बुलवाकर भारतवासियों की इच्छा के अनुसार स्वराज्य प्रदान करने का रास्ता निकालने के लिए विवश करें.

यह तब था, जब महात्मा के दिल व दिमाग में इस बाबत कोई संदेह नहीं था कि जब तक ये अंग्रेज यह नहीं समझ लेंगे कि प्रत्येक भारतीय सचमुच उनकी बराबरी का और भाई है, तब तक उनसे यह सब नहीं होगा.

इसलिए उन्होंने खत में यह भी लिखा था, ‘मैं आपसे मेहरबानी की याचना नहीं करता, मैं तो केवल मित्र के नाते आपको एक कठिन प्रश्न का सम्मानपूर्ण हल सुझा रहा हूं. दमन और कठोरता का दूसरा रास्ता तो आपके लिए खुला ही है. पर मैं आपको चेतावनी देता हूं कि यह उपाय बेकार साबित होगा.

अंत में उन्होंने उनको साफ-साफ बता दिया था कि हमारा आंदोलन तो दमन और सख्ती को अवश्यंभावी मानकर ही शुरू हुआ है. आपसे मेरा अनुरोध है कि आप भारत का नमक खा रहे हैं, अतः उसी का पक्ष लें. दमन का सहारा लेकर इस देश के साथ बेवफा न हों.’

साम्राज्य के खात्मे का प्रण

प्रसंगवश, बाद में महात्मा इस निष्कर्ष पर पहुंच गए थे कि अंग्रेजी राज्य ने भारत का नैतिक, भौतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सभी तरह का नाश कर दिया है. तब उन्होंने कहा था कि मैं इस राज्य को अभिशाप मानता हूं और उसे नष्ट करने का प्रण कर चुका हूं.

उनके शब्द थे, ‘मैंने खुद ‘गॉड सेव द किंग’ के गीत गाए हैं, दूसरों से भी गंवाये हैं. मुझे ‘भिक्षां देहि’ की राजनीति में विश्वास था. पर वह व्यर्थ हुआ. मैं जान गया कि इस सरकार को सीधी करने का यह उपाय नहीं है. अब तो राजद्रोह ही मेरा धर्म हो गया है. पर हमारी लड़ाई अहिंसा की लड़ाई है. हम किसी को मारना नहीं चाहते, किंतु इस सत्यानाशी शासन को खत्म कर देना हमारा परम कर्तव्य है.’

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)