कर्नाटक हाईकोर्ट के सरकारी ‘सहयोग’ पोर्टल संबंधी आदेश को चुनौती देगा एक्स

एक्स ने कहा कि वह कर्नाटक हाईकोर्ट के हालिया आदेश से बेहद चिंतित है, जो लाखों पुलिस अधिकारियों को 'सहयोग' नामक एक गुप्त ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से मनमाने ढंग से सामग्री हटाने के आदेश जारी करने की अनुमति देता है. एक्स के अनुसार, यह भारतीय नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों का हनन है.

'एक्स' का लोगो और पृष्ठभूमि में कर्नाटक हाईकोर्ट.

नई दिल्ली: सोशल मीडिया दिग्गज एक्स के ग्लोबल गवर्नमेंट अफेयर्स हैंडल ने पोस्ट किया है कि वह कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश के विरुद्ध अपील करेगा, जिसमें केंद्र सरकार के विवादास्पद ‘सहयोग’ पोर्टल संबंधी आदेशों को बरकरार रखा गया है. एक्स ने इस वेबसाइट को ‘गुप्त ऑनलाइन पोर्टल’ बताया है.

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘सहयोग’ संबंधी खुलासा दिल्ली हाईकोर्ट में शबाना बनाम दिल्ली सरकार एवं अन्य मामले की सुनवाई के दौरान किया था, जब अदालत ने कहा कि तत्काल मामलों के समाधान के लिए इंटरनेट मध्यस्थों और कानून प्रवर्तन अधिकारियों के बीच रियल टाइम में बातचीत आवश्यक है.

द हिंदू के एक संपादकीय में इसे ‘बैक डोर सेंसर’ बताया गया था.

ग्लोबल गवर्नमेंट अफेयर्स हैंडल ने एक पोस्ट में कहा, ‘एक्स भारत के कर्नाटक की एक अदालत के हालिया आदेश से बेहद चिंतित है, जो लाखों पुलिस अधिकारियों को सहयोग नामक एक गुप्त ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से मनमाने ढंग से सामग्री हटाने के आदेश जारी करने की अनुमति देता है. इस नई व्यवस्था का कानून में कोई आधार नहीं है, यह आईटी अधिनियम की धारा 69ए का उल्लंघन है, सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का उल्लंघन करती है और भारतीय नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों का हनन करती है.’

इससे पहले 24 सितंबर को कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक्स की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें सरकार द्वारा सामग्री हटाने के आदेशों को सुगम बनाने के लिए सहयोग पोर्टल के इस्तेमाल को चुनौती दी गई थी. अदालत ने इसे ‘जनहित का एक साधन’ बताया था और कहा था कि यह नागरिकों और सोशल मीडिया मध्यस्थों के बीच ‘सहयोग का जरिया’ है.

हालांकि एक्स के ग्लोबल गवर्नमेंट अफेयर्स का कहना है, ‘सहयोग पोर्टल अधिकारियों को केवल ‘अवैधता’ के आरोपों के आधार पर न्यायिक समीक्षा या वक्ताओं के लिए उचित प्रक्रिया के बिना, सामग्री हटाने का आदेश देने में सक्षम बनाता है, और अनुपालन न करने पर प्लेटफॉर्म पर आपराधिक जवाबदेही की धमकी देता है.’

हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने 24 सितंबर के आदेश के एक हिस्से में कहा था कि एक विदेशी संस्था होने के नाते एक्स अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए, भारत के संवैधानिक संरक्षण का आह्वान नहीं कर सकता.

ग्लोबल गवर्नमेंट अफेयर्स के पोस्ट में कहा गया है कि वह अदालत के विचार से असहमत है, और यह मानता है कि भारत में सार्वजनिक चर्चा उसके मंच पर होने के कारण उसे ये चिंताएं उठाने का अधिकार है.

एक्स का कहना है, ‘एक्स भारतीय कानून का सम्मान करता है और उसका पालन करता है, लेकिन यह आदेश हमारी चुनौती में मुख्य संवैधानिक मुद्दों को संबोधित करने में विफल रहता है और बॉम्बे हाईकोर्ट के हालिया फैसले के साथ असंगत है कि इसी के समान एक व्यवस्था असंवैधानिक थी. हम इस विचार से सम्मानपूर्वक असहमत हैं कि हमारी कॉरपोरेशन विदेश में स्थित होने के कारण हमें ये चिंताएं उठाने का कोई अधिकार नहीं है- एक्स भारत में सार्वजनिक चर्चा में महत्वपूर्ण योगदान देता है और हमारे यूजर्स की आवाज़ हमारे मंच के केंद्र में है. हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए इस आदेश के खिलाफ अपील करेंगे.’

ज्ञात हो कि एक्स एकमात्र प्रमुख टेक कंपनी है जो सहयोग पोर्टल के साथ एकीकृत (इंटीग्रेटेड) नहीं है. माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, मेटा और लिंक्डइन पहले से ही इसमें मौजूद हैं. मार्च में इसने दिल्ली हाईकोर्ट को बताया था कि यह पोर्टल पर नहीं रहेगा.