गीतगोविन्द: जिसके मूल में वर्चस्व नहीं, समकक्षता है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: गीतगोविन्द याद दिलाता है कि भारत की कला-कल्पना, उसका अध्यात्मिक चिंतन, उसका भाषा-सौंदर्य कैसी समावेशी नैतिकता में मूलबद्ध था और उससे महान काव्य और कला संभव हुई.

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गीत गोविन्द पर आधारित कांगड़ा पेंटिंग, Circa 1825. (साभार: Wikimedia/LACMA, Los Angeles)

हमारा सामान्य ज्ञान हमें यह तो बताता रहा है कि संस्कृत में ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के रूप में दो महाकाव्य-क्षण हुए हैं. पर प्रायः हम यह याद नहीं करते कि ‘भगवद्गीता’ और ‘गीतगोविन्द’ के रूप में दो महान् गीति-क्षण भी हुए हैं. गीता आध्यात्मिक और उपदेशपरक है जबकि गीतगोविन्द ऐन्द्रिय और रतिधर्मी.

गीता में मानवीय आचरण, अस्तित्व का अर्थ, परम सत्य आदि का अन्वेषण है; गीतगोविन्द प्रेम और रति, साहचर्य की ऐन्द्रिकता और जटिलता के बारे में है.

अठारह दिनों का युद्ध शुरू होने को है और दोनों ओर की सेनाएं लड़ने को उद्यत हैं. तभी अर्जुन संशयग्रस्त होते हैं और उनके संशय का समाधान कृष्ण गीता के रूप में करते हैं. गीतगोविन्द तब रचा जाता है जब, एक तरह से, युद्ध, अपने सारे विनाश के साथ, समाप्त हो चुका है, शांति स्थापित हो चुकी है और सामान्य जीवन अपनी तात्कालिकता, लयात्मकता और गरिमा के साथ फिर काबिज है.

वह उस समय लिखा जाता है जब दसवीं शताब्दी के आसपास खजुराहो और कोणार्क आदि महान् मंदिरों की दीवारों पर रतिमग्न मिथुन, प्रतीक्षारत नायिकाएं, आत्ममुग्ध अप्सराएं और मनुष्यों की अपने संगतकार पशुओं के साथ जीवनयात्रा उत्कीर्ण हो चुकी थी. मंदिर विकसित हो रहे थे- न सिर्फ़ आध्यात्मिक केंद्रों बल्कि सामुदायिक संस्कृति के शरण्यों के रूप में.

उनमें प्राकृतिक और मानवीय कामनाओं और संग-साथ को जगह दी गई थी. जीवन वहां अपनी जटिलताओं के साथ कलात्मक और भावात्मक परिपक्वता के साथ प्रगट था.

भारतीय संस्कृति की एक बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने अपने महाकाव्यों और गीतिग्रंथों को सिर्फ़ साहित्य तक महदूद नहीं रहने दिया. वे ललित कलाओं, प्रदर्शनकारी कलाओं जैसे संगीत, नृत्य, रंगमंच आदि का उपजीव्य भी बनते रहे. तब से लेकर आज तक, वे जितना साहित्य में पढ़े-समझे-सराहे जाते हैं उतना ही कलाओं में चित्रित-शिल्पित, गाये-नाचे-अभिनीत किए जाते हैं. वे सिर्फ़ स्मृति का हिस्सा नहीं हैं: वे संस्कृति का वर्तमान भी हैं.

गीत गोविन्द की पांडुलिपि का एक पृष्ठ. (साभार: Wikimedia)

आज भी हर दिन केरल के गुरवायूर मंदिर में, गीतगोविन्द की अष्ठपदियां दैनिक अनुष्ठान के रूप में गायी जाती हैं. तमिलनाडु के शास्त्रीय नृत्य भरतनाट्यम में, केरल के मोहिनीअट्टम में अष्टपदियों पर अभिनय होता है: उड़ीसा के शास्त्रीय नृत्य ओड़िसी का तो गीतगोविन्द मुख्य उपजीव्य है.

उधर सुदूर मणिपुर में, इम्फाल के गोविन्द मंदिर में अष्टपदियों पर आधारित मणिपुरी नृत्य रोज़ होता है. राजस्थान, पहाड़ी और मुग़लकालीन मिनिएचर कला में विशद रूप से गीतगोविन्द का चित्रांकन और अलंकरण हुआ है.

गीतगोविन्द संभवतः ऐसा काव्य भी है जहां संस्कृत अपने लालित्य-माधुर्य-ऐन्द्रिकता-संगीत के शिखर पर पहुंचती है. जीवन की लय, निस्संकोच, प्रेम और केलि की लय और कविता की लय इस गीतिकाव्य में इस क़दर तदात्म हो और घुल-मिल जाती हैं कि लगता है कि शब्द-बिंब-रतिस्मृति-संगीत सभी, कविता की उच्छल काया में, एक-दूसरे से केलि कर रहे हों.

उसे निरे प्रेम-भक्ति काव्य के रूप में ही नहीं, जीवन और जिजीविषा की अदम्यता के काव्य के रूप में भी पढ़ा जाना चाहिए.

हमारा समय कई अर्थों में विचित्र है: उसमें न गीत बचा है, न गोविन्द! हम बुरी तरह से सत्ता, धन-दौलत, सतही धार्मिकता, बढ़ती सांप्रदायिकता, विकराल होती घृणा से घिरे हैं. उसमें नैतिकता पौरुष की दबंगई का संस्करण भर रह गई है. ऐसे में, गीतगोविन्द, ऐसा लालित्य और ऐसी ऐन्द्रिकता प्रस्तावित करता है जिसमें वर्चस्व नहीं समकक्षता मूल में है.

वह याद दिलाता है कि भारत की कला-कल्पना, उसका अध्यात्मिक चिंतन, उसका भाषा-सौंदर्य कैसी समावेशी नैतिकता में मूलबद्ध था और उससे महान काव्य और कला संभव हुई. उनकी निर्भीकता असाधारण रही है- आज के भदेसपन, अश्लीलता, दिखाऊपन आदि का यह लालित्य स्थायी प्रतिलोम है.

भक्ति अगाध अनंत

भारतीय काव्य परंपरा में भक्ति काव्य को, प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में, स्वर्ण युग कहा जाता है. इससे पहले कविता इतनी लोकप्रिय, साधारण जन में व्याप्त, उनके जीवन में लगातार उपस्थित और स्पन्दित, उनके सामान्य जीवन की इतनी विविध छबियों-बिंबों-मुहावरों-रूपकों से रसी-बसी नहीं हुई थी.

महत्वपूर्ण यह है कि भक्ति काव्य ने एक ऐसा विशद-विपुल-बहुल काव्यशास्त्र रचा कि सौंदर्य और संघर्ष, समर्पण और प्रश्नवाचकता, आस्था और संदेह के बीच जो पारंपरिक दूरी और द्वैत थे, वे ध्वस्त हो गए. सामाजिक आचार, जातिगत भेदभाव, धार्मिक अनुष्ठानपरकता, आध्यात्मिक वर्जनाएं आदिका भक्ति काव्य ने अतिक्रमण किया. उसने, भारतीय इतिहास और परंपरा में पहली बार धार्मिक सत्ता, राजनीतिक सत्ता, संपत्ति सत्ता के बरक़्स कविता की स्वतंत्र सत्ता स्थापित की.

यह कविता-सत्ता अपने सत्व में, प्रभाव में और व्याप्ति में जनतांत्रिक थी: उसने धर्म, अध्यात्म, सामाजिक आचार-विचार, व्यवस्था आदि का जनतांत्रिकीकरण किया. वह एक साथ सौंदर्य, संघर्ष, आस्‍था, अध्यात्म, प्रश्नवाचकता की विधा बनी. यह अपने आप में किसी क्रांति से कम नहीं है.

इस नई जनतांत्रिकता में व्यक्ति की इयत्ता और गरिमा का सहज स्वीकार भी था: प्रायः सभी भक्त कवि अपनी रचनाओं में निस्संकोच अपने नाम का उल्लेख करते हैं. यह भी क्रांतिकारी था कि भक्तिकाव्‍य में अनेक तथाकथित निचली जातियों को कविता में अपने को निस्संकोच व्यक्त करने का, एक तरह से, पहली बार साहित्यिक अधिकार और अवसर मिला.

यह निरा संयोग नहीं है, न ही आकस्मिक कि बाद की शताब्दियों में जब भी समता, न्याय, स्वतंत्रता, रूढ़ियों ने विरुद्ध, सामान्य भारतीय जीवन और व्यवस्था में, वृत्तियां सक्रिय हुईं तो उन्होंने, निरपवाद रूप से, भक्तिकाव्य का सहारा, अपने संदेश और अर्थशीलता को पहुंचाने के लिए, लिया है. हमारे स्वतंत्रता-संग्राम में महात्मा गांधी से लेकर बाद के दलित आन्दोलनों में, भक्त-कवियों को व्यापक रूप से उद्बुद्ध किया गया है.

इस सबके बावजूद, हिंदी में समग्र भारतीय भक्तिकाव्य का कोई संचयन नहीं है.

भक्तिकाव्य के विशेषज्ञ डॉ. माधव हाड़ा ने मनोयोग और उत्साह से बहुत कम समय में, ऐसा संचयन तैयार कर दिया है. यह सुसंपादित संचयन, ‘भक्ति अगाध अनन्त’, रज़ा पुस्तकमाला के तहत राजपाल एंड संस द्वारा प्रकाशित हुआ है.

चित्रकार सैयद हैदर रज़ा भक्तिकाव्‍य के बहुत प्रेमी थे. उन्होंने कबीर, तुलसीदास, सूरदास, मीराँ, रहीम की पंक्तियों का अपने चित्रों में देवनागरी में अंकन किया है. वे होते तो इस संचयन को देखकर ज़रूर आह्लादित होते.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)