सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सज़ा की समयसीमा तय करने की केंद्र सरकार की याचिका ख़ारिज की

केंद्र सरकार ने एक याचिका में मौत की सज़ा पाए दोषियों के लिए क़ानूनी उपायों का लाभ उठाने हेतु सख्त समयसीमा और दया याचिका ख़ारिज होने के सात दिनों के भीतर फांसी देने की मांग की गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका ख़ारिज करते हुए कहा कि इसमें कोई दम नहीं है.

(फोटो साभार: https://www.project39a.com)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (8 अक्टूबर) को केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें मौत की सज़ा पाए दोषियों के लिए कानूनी उपायों का लाभ उठाने हेतु सख्त समयसीमा और दया याचिका खारिज होने के सात दिनों के भीतर फांसी देने की मांग की गई थी.

केंद्र सरकार का पक्ष सुनने के बाद जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि इस याचिका में कोई दम नहीं है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने फैसला सुनाया कि 2014 का शत्रुघ्न चौहान फैसला, जिसमें केंद्र सरकार संशोधन चाहती है, सभी पहलुओं से पूर्ण है.

याचिका में 2014 के फैसले में कुछ संशोधनों की मांग की गई थी. इसके पीछे तर्क यह दिया गया था कि यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है कि मृत्युदंड के मामलों की रूपरेखा में पीड़ितों के अधिकारों और पीड़ा को ध्यान में रखा जाए और दोषियों के सामने लंबे समय से चली आ रही अनिश्चितता का भी समाधान किया जाए.

2014 के फैसले में संशोधन करने से इनकार करते हुए अदालत ने केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) केएम नटराज से कहा कि वह उचित कार्यवाही में अपने आवेदन में जिन उपायों पर जोर दे रही है, उनमें से कुछ को लागू करने के लिए स्वतंत्र है.

एएसजी नटराज ने 24 सितंबर को अदालत को बताया था, ‘सरकार पहले के फैसले में संशोधन की मांग कर रही है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि दया याचिकाओं, समीक्षा और उपचारात्मक याचिकाओं के साथ यह प्रक्रिया अंतहीन रूप से जारी न रहे. जब फांसी में देरी होती है तो पीड़ितों को भी नुकसान होता है.’

शीर्ष अदालत ने शत्रुघ्न चौहान मामले से संबंधित अपने 2014 के फैसले में कहा था कि दोषियों के नियंत्रण से परे देरी मृत्युदंड को कम करने का आधार बनती है. इसने यह भी माना था कि देरी के कारण होने वाली पीड़ा और कष्ट, सजा को आजीवन कारावास में बदलने का आधार बनते हैं.’

2012 के दिल्ली सामूहिक बलात्कार और हत्या मामले में चार दोषियों द्वारा दायर कई कानूनी उपायों के कारण उनकी फांसी में देरी होने के बाद गृह मंत्रालय (एमएचए) ने 2020 में संशोधन के लिए आवेदन दायर किया था.

इसके बाद मार्च 2020 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा आधी रात को उनकी अंतिम याचिका खारिज करने के बाद उन्हें फांसी दे दी गई.

अख़बार के अनुसार, केंद्र सरकार ने अपने आवेदन में कहा कि शत्रुघ्न चौहान मामले में फैसला, दोषियों को अत्यधिक देरी से बचाते हुए, ‘पीड़ितों और उनके परिवार के सदस्यों के अपूरणीय मानसिक आघात, पीड़ा, उथल-पुथल और विक्षिप्तता को ध्यान में नहीं रखता है.’

आवेदन में कहा गया है कि आतंकवाद, बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराधों के दोषी अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) की आड़ में ‘न्यायिक प्रक्रिया को धोखा देते हैं.’

अपने आवेदन में केंद्र ने अदालत से यह घोषित करने का आग्रह किया कि समीक्षा याचिका खारिज होने के बाद उपचारात्मक याचिकाएं केवल एक निर्धारित समय के भीतर ही दायर की जानी चाहिए. इसके अलावा इसमें यह स्पष्टीकरण भी मांगा गया कि मृत्यु वारंट जारी होने के सात दिनों के भीतर दया याचिका दायर की जानी चाहिए. अंत में आवेदन में यह निर्देश देने की मांग की गई कि दया याचिका खारिज होने के सात दिनों के भीतर फांसी दे दी जाए, चाहे सह-दोषियों की कार्यवाही लंबित हो या नहीं.