सरकार भले ही इनकार करती रहे. लेकिन दो तथ्य निर्विवाद हैं.
पहला, कोविड महामारी के दैरान दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में भारत में ज़्यादा मौतें हुईं. और दूसरा – और भी दुखद और दोषपूर्ण – कि अगर भारत ने सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की एक मज़बूत व्यवस्था स्थापित की होती, तो इनमें से बहुत से लोगों की जान बचाई जा सकती थी.
ऐसी लाखों ज़िंदगियां जो बचाई जा सकती थीं, मगर कोविड से होने वाली मौतों की इस महात्रासदी के साये में, मैं इस बारे में बहुत सोचता हूं कि दुनिया भर की सरकारों ने क्या किया, क्या नहीं किया, और क्या करना चाहिए था, ताकि स्वास्थ्य सेवा उन लोगों तक गरिमा के साथ पहुंचे जिन्हें देखभाल की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है.
मेरी यह सोच कुछ हद तक मेरे जीवन की यात्रा में सार्वजनिक स्वास्थ्य के बारे में मेरे अपने अनुभवों से प्रेरित है, जिनमें से कुछ मैं यहां साझा कर रहा हूं. मैं विनम्रतापूर्वक ऐसा करता हूं, इसलिए नहीं कि मेरी अंतर्दृष्टि उल्लेखनीय है, बल्कि इसलिए कि मैंने भारत की असमानताओं के लिए ज़िम्मेदार सार्वजनिक व्यवस्था से काफ़ी कुछ सीखा है.
मैंने मानवीय पीड़ा के रूप में इसकी भारी क़ीमत अदा होते हुए देखा है. मैं इसलिए भी लिखता हूं क्योंकि मुझे बार-बार यह अहसास होता है कि न्याय और दयालुता एक-दूसरे से कितनी गहराई से जुड़े हुए हैं.
कुष्ठ रोगी का जीवन, वंचित जीवन
इस बात को तीन दशक हो गए हैं जब मैं मध्य भारत के छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश राज्यों के ज़्यादातर ग्रामीण तथा आदिवासी बहुल इलाक़ों वाले छह ज़िलों में ज़िलाधिकारी को रूप में लगातार तैनात रहा.
मेरे सार्वजनिक जीवन की शुरुआत से ही एक बात जिसने मेरे जीवन और विश्वदृष्टि को गहराई से प्रभावित किया, वह थी कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों का क्रूर और व्यापक सामाजिक निष्कासन. 1980 के दशक में, दुनिया भर में कुष्ठ रोगियों की संख्या पांच मिलियन से ज़्यादा थी. इनमें से लगभग आधे भारत में थे, जिनमें से कई मध्य भारत के उन निर्धन सघन वन क्षेत्रों के मूल निवासी थे जहां मैं तैनात था.
स्थानीय सरकार तक अपनी मांग पहुंचाने के लिए आम जन का जुसूल के रूप में जोशीले नारे लगात हुए वरिष्ठ अधिकारियों के कार्यालयों तक आना आम बात है. अपनी पहली पोस्टिंग से पहले ही मैंने यह संकल्प ले लिया था कि ऐसे किसी भी सार्वजनिक प्रदर्शन और आंदोलन की स्थिति में मैं उन्हें अपने कार्यालय में आमंत्रित करूंगा और उनकी बात को ध्यान से तथा सम्मान के साथ सुनूंगा. यह बताने के लिए मैं ऐसा करूंगा कि हम विरोधी नहीं हैं और मैं उनका स्वामी नहीं, बल्कि उनका जनसेवक हूं.
मेरी पहली पोस्टिंग बड़वानी नामक सबडिवीज़न में हुई थी. मैं 27 साल का था. एक सुबह मेरे कार्यालय के बाहर जो जुलूस आकर रुका, वह मेरे शुरुआती महीनों में अब तक देखे गए किसी भी जुलूस से बिल्कुल अलग था. यह एक कम्युनिस्ट स्कूल शिक्षक के नेतृत्व में ‘बर्न आउट’ कुष्ठ रोगियों का एक विविध जमावड़ा था.
मैं ‘बर्न आउट’ शब्द का इस्तेमाल ग्राहम ग्रीन के क्लासिक उपन्यास के शीर्षक की याद दिलाने के लिए कर रहा हूं, जिसका शीर्षक है-‘ए बर्न्ट-आउट केस’, जो कांगो नदी के ऊपरी इलाक़े में स्थित एक कुष्ठ कॉलोनी के बारे में है. ये वे लोग हैं जो कुष्ठ रोग से संक्रमित थे, जिन लोगों में इस संक्रमण के भयानक परिणाम साफ़ दिखाई देते हैं जैसे कि त्वचा का रंग उड़ना, आंखें क्षतिग्रस्त होना, नाक टूटना और हाथ-पैरों की उंगलियों का गलकर ठूंठ हो जाना.
जब मैं उनके साथ अपने कार्यालय में बैठा, तो मैंने पाया कि उनकी मांगें बेहद मामूली थीं. वे शहर की सीमा से बाहर एक गंदे ज़मीन के टुकड़े पर निर्वासित कर दिए गए थे, जहां कोई भी सार्वजनिक सेवा उपलब्ध नहीं थी. उन्हें अपने जर्जर मोहल्ले के लिए बस पीने के पानी की सुविधा चाहिए थी, निचले दलदली इलाक़े में जहां वे रहते थे वहां से जल निकासी की व्यवस्था और शायद कुछ स्ट्रीट लाइटें चाहिए थीं. मैंने वादा किया कि मैं ये सब सुनिश्चित करूंगा. लेकिन मैंने यह भी कहा कि मुझे उनके घरों में जाकर उनसे मिलना अच्छा लगेगा.
मैं उनकी बस्ती में गया. जहां मैं बार-बार जाता रहा. वहां मुझे ऐसे लोगों से रूबरू कराया गया जो पहले या बाद में मिले किसी भी व्यक्ति से कहीं ज़्यादा क्रूरता से बहिष्कृत थे. उनकी सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि हालांकि उनका संक्रमण पूरी तरह से ठीक हो सकता था, फिर भी उनके ऊपर सहस्राब्दियों के क्रूर कलंक और पूर्वाग्रहों का असहनीय बोझ था. इसका नतीजा यह हुआ कि जैसे ही उनके संक्रमण की जांच होती और उन्हें पता चलता, उन्हें वे लोग भी त्याग देते जिन्हें वे सबसे ज़्यादा प्यार करते थे – उनके माता-पिता, उनके जीवनसाथी, उनके बच्चे. उन्हें उनके घरों और उनके गांवों से निकाल दिया जाता.
वे कूड़े के ढेरों में खाना ढूंढते और अंततः वे उन महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के एक ऐसे ‘घेटो’ (Ghetto) में पहुंच जाते जिन्हें कुष्ठ रोग के संक्रमण के कारण घर और परिवार से निकाल दिया गया था. वहां वे निर्वासितों के एक नए समुदाय में शामिल हो जाते, अक्सर एक नया साथी ढूंढ लेते और बहिष्कृत लोग आपस में मिलकर एक नया परिवार बना लेते.
लेकिन शहर के निवासी उनसे बेरहमी से पेश आते और हिंसक तरीक़े से तिरस्कृत करते. उनके बच्चों के साथ भी ऐसा ही होता. कोई उन्हें काम नहीं देता. कोई भी उनके बच्चों को स्कूलों में दाख़िला नहीं देता. ज़िंदा रहने के लिए, वे दिन भर सड़कों पर क़तार में खड़े रहते थे और अपने विकृत अंगों और घावों को घृणा भरी नज़रों से दिखाते हुए भीख मांगते थे. कुछ सिक्के दूर से उन तक फेंक दिए जाते थे.
मुझे वरिष्ठ समाजसेवी बाबा आमटे का एक नारा याद आया – जो मेरे लिए आजीवन प्रेरणास्रोत रहे – उन्होंने कुष्ठ रोगियों के साथ अपने ऐतिहासिक कार्य के दौरान यह नारा बुलंद किया था: मुझे तुम्हारा दान नहीं चाहिए. मुझे तो बस एक मौक़ा चाहिए.
मैंने एक शाम कुष्ठ रोग बस्ती के निवासियों से पूछा कि उनमें से कौन भीख मांगना छोड़कर सम्मानजनक काम ढूंढना चाहता है. सभी ने तुरंत अपने क्षतिग्रस्त हाथ ऊपर उठा दिए और मेरे लिए तो मानो जैसे चारों तरफ़ रौशनी-सी फैल गई. मैंने बड़वानी के कुछ दयालु निवासियों को अपने साथ लेकर उनके लिए वह ‘अवसर’ जुटाने में मदद की जिसकी बात बाबा आमटे ने बड़े ही उत्साह से की थी.
हमने उनके लिए बहुत ही साधारण लेकिन साफ़-सुथरे आवास, बुनाई और ईंट बनाने का काम, एक शिशु देखभाल केंद्र, स्कूलों में दाख़िला और एक स्थानीय क्लिनिक का प्रबंध किया. हमने उनकी नई बस्ती को ‘आशा ग्राम’ नाम दिया. बड़वानी से ट्रांसफ़र के बाद दशकों तक मैं अपने परिवार के साथ दीपावली या नया साल के अवसर पर उनके साथ दोस्ती का जश्न मनाने और आश्चर्य तथा प्रशंसा के साथ यह देखने के लिए आशा ग्राम आता था कि वे अपने पिछले जीवन के कष्टों और तबाही से निकलकर कैसे गरिमा के साथ और आशा भरी ज़िंदगी जी रहे हैं.

इसके बाद, जिन भी ज़िलों में मैंने काम किया, मैंने कुष्ठ रोगियों की अपरिहार्य बस्तियों की तलाश की और उन्हें उस घोर निराशा तथा अपमान से बाहर निकालने में मदद करने की कोशिश की, जिसमें वे अपनी बीमारी के कलंक से घिरे हुए थे. कई रविवार की सुबह, अपनी बेटी को गोद में लेकर कुष्ठ रोगियों की बस्ती में जाना और वहां के निवासियों के साथ भोजन करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा होता. उस दौरान मेरी बेटी उनके बच्चों के साथ खेलती थी. कुछ लोगों से ऐसा मित्रता हुई जो आजीवन चलती रही.
मैंने कुष्ठ रोग की प्राचीन भयावह बीमारी के बारे में भी ख़ुद को और शिक्षित किया, और क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज वेल्लोर, जिसने कुष्ठ रोग के क्षेत्र में अग्रणी कार्य किया था, मेरे लिए तीर्थस्थल बन गया. मैंने उनसे सीखा कि कुष्ठ रोग के जीवाणु उन विकृतियों का कारण नहीं थे जिनसे दुनिया घृणा करती थी. ये विकृतियां तो केवल जीवाणुओं द्वारा उन तंत्रिकाओं पर आक्रमण का परिणाम थीं, जिनसे उनके अंग सुन्न हो गए थे.
चूंकि उन्हें कोई दर्द महसूस नहीं होता था, इसलिए वे अपने अंगों को तब तक सड़ने देते थे जब तक कि उनकी हाथ उंगलियां या पैर की उंगलियां टूट या गिर न जाएं. मैंने उनसे सीखा कि शायद प्रकृति का मनुष्यों को सबसे बड़ा उपहार दर्द है. क्योंकि हम दर्द का अनुभव करते हैं केवल इसलिए हम अपनी रक्षा के लिए क़दम उठाते हैं और ठीक होने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं.
मैंने उन सभी लोगों के जीवन की उस महान और पूरी तरह से टाली जा सकने वाली त्रासदी से सीखा कि कलंक कितना ख़तरनाक होता है. यदि जल्दी निदान हो जाए, तो संक्रमण को पूरी तरह से ठीक करने के लिए केवल एक वर्ष का उपचार पर्याप्त होता है, और यदि समय पर पता चल जाए, तो उनके अंग सुन्न नहीं होंगे, इसलिए कोई विकृति नहीं होगी. और अगर पूरी तरह से इलाज हो जाए और कोई विकृति न हो, तो उन्हें अपने परिवारों, समुदायों, स्कूलों और काम से निकाला नहीं जाएगा. किसी बाहरी व्यक्ति को पता भी नहीं चलेगा कि उन्हें कुष्ठ रोग है.
लेकिन वे इन परिणामों से इतना डरते हैं कि वे अपने लक्षणों को छिपाते हैं और इलाज करवाने से बचते हैं, जब तक कि विकृतियां वास्तव में विकसित नहीं हो जातीं. और फिर जिस त्याग, उपहास, तिरस्कार से वे डरते थे, वही उनकी नियति बन जाती है.
मैंने जो मुख्य सबक़ सीखा, वह यह था कि उनकी बीमारी बैक्टीरिया नहीं थी; बल्कि अज्ञानतापूर्ण सामाजिक पूर्वाग्रह और नफ़रत थी. एक बार इन पर क़ाबू पा लेने के बाद, मानव जाति सदियों से चली आ रही इन भयावह त्रासदियों को आख़िरकार पीछे छोड़ पाएगी. ऐसा होने लगा है. कुष्ठ रोग के संक्रमणों की संख्या घटकर 2,00,000 रह गई है, हालांकि भारत में अभी भी 60% मामले दर्ज किए जाते हैं.
और यह सिर्फ़ कुष्ठ रोग के मामले की सच्चाई ही नहीं है.
टीबी से होने वाली मौतें जो नहीं होनी चाहिए थीं
पिछले कुछ वर्षों में दो अन्य बीमारियां मुझे परेशान कर रही थीं. ये दोनों, कुष्ठ रोग की तरह ही, कलंक और घोर दरिद्रता का परिणाम हैं. इनमें से एक है तपेदिक, जिसे आम बोलचाल में टीबी कहा जाता है.
सिविल सेवा में अपने कर्तव्यों के तहत मुझे वरिष्ठ सिविल सेवा, राजनयिक और पुलिस सेवा में नए भर्ती होने वाले प्रशिक्षुओं की ट्रेनिंग के लिए मसूरी स्थित प्रशिक्षण अकादमी में तीन साल के लिए संकाय के रूप में नियुक्त किया गया था. उस समय, मसूरी (कोलकाता के अलावा) भारत का आख़िरी शहर था जहां अभी भी दौड़ते हुए इंसानों द्वारा खींचे जाने वाला रिक्शा चलता था.
मैं मानव दासता के इस प्रतीक का अंत सुनिश्चित करने के लिए दृढ़ संकल्पित था, चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े.
मैंने उच्च सार्वजनिक पदों पर कार्यरत प्रशिक्षुओं के इन तीन बैचों (1993 से 1996 तक) की सहायता ली. इन प्रशिक्षुओं में से कई प्रतिष्ठित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में प्रशिक्षित इंजीनियर थे. उन्होंने साइकिल रिक्शा का एक ऐसा संस्करण विकसित करने में मदद की जो पहाड़ी सड़कों पर चलाने के लिए सुरक्षित था. कुछ लोगों ने स्वेच्छा से पहाड़ों के उन सुदूर गांवों में जाकर, जहां से वे पलायन करके आए थे, उस ग़रीबी को गहराई से समझने की कोशिश की जिससे वे उबरे थे. कुछ लोगों ने स्वेच्छा से अपने आश्रय स्थलों को रंगने और उनका नवीनीकरण करने की पेशकश की, जहां वे सोते थे.
प्रशिक्षु सिविल सेवकों, राजनयिकों और पुलिसकर्मियों में प्रशिक्षित डॉक्टर भी थे. उनकी मदद से हमने रिक्शा चालकों और सिर पर बोझा ढोने वालों के स्वास्थ्य की जांच शुरू की. हमने पाया कि उनमें टीबी संक्रमण के मामले चिंताजनक रूप से बढ़ रहे हैं. मैंने अकादमी के निदेशक, आदरणीय डॉ. एनसी सक्सेना से अनुरोध किया कि वे अकादमी में अधिकारी प्रशिक्षुओं के लिए बने स्वास्थ्य केंद्र को रिक्शा चालकों और सिर पर बोझा ढोने वालों के लिए भी खोल दें. उन्होंने तुरंत सहमति दे दी.
यह एक गर्व का क्षण था, जब उन वर्षों में देश के प्रमुख लोक सेवक बनने के लिए प्रशिक्षण ले रहे लोग अपने स्वास्थ्य केंद्र को उस शहर के सबसे ग़रीब श्रमिकों के साथ साझा करते थे.
उपचार के अक्सर नाटकीय परिणाम होते थे. स्वास्थ्य केंद्र में प्रवेश करने से पहले कई लोगों के शरीर लगभग कंकाल में सिमट गए होते थे. कुछ तो मौत से बस कुछ ही क़दम दूर दिखाई देते थे. बावजूद इसके, हमने उन्हें ठीक होते, उनके शरीर फिर से भरते और शारीरिक रूप से थका देने वाले अपने व्यवसायों में लौटते देखा.
यह मेरे लिए डेढ़ दशक बाद दिल्ली की सड़कों पर बेघर लोगों के बीच टीबी के साथ और भी गहन जुड़ाव की तैयारी का आधार बन गया.

2002 में गुजरात में बड़े पैमाने पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर की गई धार्मिक हिंसा के उन्माद के बाद मैंने विरोधस्वरूप यह मानते हुए सिविल सेवा से त्यागपत्र दे दिया कि यह एक राज्य प्रायोजित नरसंहार था. सरकार से अलग होने के बाद मैंने अपना काफ़ी समय गुजरात तथा देश के अन्य हिस्सों में नफ़रत भरी हिंसा के पीड़ितों के साथ काम करने में लगाया.
मैंने दिल्ली और अन्य शहरों में बेघर लोगों के साथ, और भूख तथा भुखमरी के सवालों पर भी काम करना शुरू किया. इस काम के दौरान हमें पता चला कि छत के नीचे सोने वालों की तुलना में बेघर लोगों को पांच से दस गुना अधिक मौत का ख़तरा होता है. हमने यह भी पाया कि बेघर लोगों में अकाल मृत्यु का सबसे बड़ा कारण शायद टीबी था.
यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के मित्रों ने दिल्ली में यमुना नदी के किनारे रहने वाले बेघर पुरुषों की सक्रिय रूप से जांच की और पाया कि वहां टीबी के मामले विश्व में कहीं भी सामने आए मामलों की तुलना में अधिक हैं. दिल्ली के बेघर पुरुषों में दुनिया के ज़्यादातर लोगों की तुलना में टीबी का स्तर ज़्यादा क्यों है, यह हम पूरी तरह से नहीं समझ पाए, सिवाय इसके कि टीबी पारंपरिक रूप से भीषण ग़रीबी से उपजी एक बीमारी है.
लेकिन हम उस बेघर व्यक्ति के दुखद कहानी को बेहतर समझते हैं जो टीबी के जीवाणुओं से ग्रस्त हो जाता है. इस बीमारी से ग्रस्त होने के बाद वे तब तक काम करते रहते हैं जब तक कि वे शारीरिक श्रम करने में पूरी तरह अक्षम नहीं हो जाते, यानी वे ज़िंदा रहने के लिए खाना ख़रीदने लायक़ न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं कमा पाते. अगर किसी तरह उन्हें भीड़-भाड़ वाले टीबी अस्पताल में बिस्तर मिल भी जाता है, तो कुछ दिनों बाद डॉक्टर उन्हें छुट्टी दे देंगे. आख़िरकार, अस्पताल को इंतज़ार कर रहे मरीज़ों की लंबी क़तार में लगे अगले मरीज़ के लिए बिस्तर ख़ाली करना ही होता है.
शायद डॉक्टर उन्हें संक्षिप्त लेकिन नेकनीयती वाली सलाह देकर छोड़ दें – ‘घर जाओ, आराम करो, अपनी दवा नियमित रूप से लो, अपने परिवार की देख रेख में रहो, और पौष्टिक खाना खाओ.’
लेकिन क्या डॉक्टर को समझ नहीं आता? मेरा कोई परिवार नहीं है, मेरा कोई घर नहीं है, तो मैं क्या करूं? मेरे पास सड़कों पर लौटकर मरने के अलावा कोई विकल्प नहीं है!
इस सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार न होते हुए, हमने टीबी से संक्रमित बेघर लोगों की जान बचाने के लिए बेताब होकर समाधान खोजे. और जैसा कि ज़्यादातर अच्छे विचारों के साथ होता है, अंततः समाधान सरल निकला. किसी बेघर व्यक्ति को टीबी का पता चलने के कम-से-कम एक साल बाद तक, हम आराम, इलाज, उपचार और देखभाल का एक ऐसा स्थान तैयार करते थे जो उसके अनुपस्थित परिवार की जगह ले सके.
हमने इसे रिकवरी शेल्टर नाम दिया और दिल्ली, जयपुर, हैदराबाद तथा पटना में ये शेल्टर खोले. इन प्रयासों में कई चुनौतियां थीं, लेकिन परिणाम बेहद उत्साहजनक थे. कई बेघर लोग जो मौत के क़रीब पहुंचकर हमारे पास आए थे, एक साल बाद ठीक हो गए और इतने सक्षम हो गए कि अपनी दुनिया में वापस लौट गए.
दयालुता की उपचारात्मक शक्ति
अपने काम के दौरान मुझे जिस दूसरी बीमारी से जूझना पड़ा, वह है मानसिक बीमारी. इस बीमारी में भी कलंक के कारण पीड़ा कई गुना बढ़ जाती है.
इंदौर में सिविल सेवा में अपनी नियुक्ति के दौरान मैं वहां स्थित मानसिक अस्पताल देखने गया. मैंने जो देखा उस पर मुझे विश्वास नहीं हुआ. यह 1980 का दशक था. लेकिन इस चहल-पहल वाले औद्योगिक शहर में यह अभी भी मौजूद था, औपनिवेशिक काल का एक विशिष्ट ‘मेंटल असाइलम’, जो सौभाग्य से आज इतिहास का हिस्सा बन गया है.
वहां मरीज़ों को अपमानजनक और भयावह परिस्थितियों में बंद कर दिया जाता था. अक्सर उन्हें नंगा, ज़ंजीरों और बेड़ियों में जकड़कर रखा जाता, वे मल-मूत्र में लोटते रहते, उन्हें बिजली के झटके दिए जाते थे और उनके परिवार उन्हें लंबे समय तक छोड़ देते थे. उनकी तस्वीरों और उनके रोने से आहत होकर, मैं इन मानसिक अस्पतालों के सुधार के लिए की जाने वाली एक जनहित याचिका का हिस्सा बना. अदालतों और सत्ता के गलियारों में यह सफ़र लंबा था, लेकिन धीरे-धीरे मेरे देश में जेल जैसी संस्थाओं में लंबे समय तक हिरासत में रहने का चलन ख़त्म हो गया है.
जैसे-जैसे ‘असाइलम’ इतिहास की बात बनते जा रहे हैं, वैसे-वैसे उन लोगों की समस्या अभी भी बनी हुई है जिन्हें दशकों पहले उनके परिवारों ने इन दीर्घकालिक, कभी-कभी आजीवन हिरासत में छोड़ दिया था. हिरासत चाहे कितनी भी क्रूर क्यों न रही हो, ये मानसिक रूप से बीमार लोगों के लिए किसी-न-किसी रूप में बुनियादी सुरक्षा तथा देखभाल के केंद्र थे, जिनकी देखभाल करने वाला दुनिया में कोई नहीं था.
मुझे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मानसिक अस्पतालों में दशकों से छोड़े गए इन लोगों से संबंधित एक योजना बनाने के लिए आमंत्रित किया था. मैंने उनसे ‘संरक्षित समुदाय’ बनाने के बारे में बात की, ऐसे घर जो एक दीर्घकालिक आश्रय गृह की सुरक्षा के साथ एक खुले समुदाय को स्वतंत्रता और सम्मान दे सके.

चेन्नई में मानसिक रूप से बीमार बेघर लोगों के साथ काम करने वाला एक शानदार संगठन, बनयन, जिसका नेतृत्व उत्साही और करिश्माई वंदना गोपीकुमार कर रही थीं, ने आख़िरकार एक संरक्षित समुदाय के इस मॉडल को लागू किया. बनयन चेन्नई की सड़कों से बेघर और मानसिक रूप से बीमार महिलाओं को उठाकर लाता है. एक बार बनयन में आने के बाद, कई लोग सड़कों पर वर्षों बिताने के बाद भी याद करते हैं कि वे कौन हैं और उनके परिवार भी उनका स्वागत करते हैं. लेकिन कई अन्य लोग परित्यक्त ही रहते हैं.
लंबे समय तक संस्थानों में सीमित रखकर बनयन ने उन्हें चेन्नई शहर के बाहरी इलाक़ों में ‘संरक्षित समुदायों’ में बसाया. महिलाओं ने देखभाल करने के लिए आपस में परिवार बनाए और अपनी दुनिया में, बाज़ारों में और कभी-कभी अपने काम में वापस लौट गईं. इस प्रयोग की उल्लेखनीय सफलता ने बनयन को अगला साहसिक क़दम उठाने के लिए प्रेरित किया, जहां पूर्व में बेघर मानसिक रूप से बीमार लोगों के समूहों को खुले समुदाय के भीतर अपार्टमेंट में प्रशिक्षित देखभालकर्ताओं के साथ रहने की अनुमति दी गई.
बड़वानी के आशा ग्राम में मैंने एक मनोचिकित्सक, डॉ. सुदीप्तो चटर्जी को ग्रामीण इलाक़ों में मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों से जूझ रहे लोगों के लिए एक समुदाय-आधारित हस्तक्षेप पर काम करने के लिए आमंत्रित किया. वे आशा ग्राम में आ गए और आसपास के गांवों के युवाओं को मानसिक बीमारी से जूझ रहे रोगियों और परिवारों की पहचान करने तथा उनकी सहायता करने के लिए प्रशिक्षित करने का एक बेहद उत्साहजनक कार्यक्रम विकसित किया. संगत नामक एक उत्कृष्ट संस्था द्वारा इस दिशा में और भी बड़े पैमाने पर काम किया जा रहा है.
मैंने ईश्वरी संकल्प नामक एक अन्य संस्था के काम से भी बहुत कुछ सीखा. कोलकाता महानगर की धूल भरी, भीड़-भाड़ वाली गलियों में, ईश्वरी संकल्प ने बेघर, परित्यक्त, मानसिक रूप से बीमार ऐसे लोगों के साथ काम करने का एक अनूठा तरीक़ा ईजाद किया है जिनका कोई परिवार नहीं है. आम लोगों की दयालुता के माध्यम से उपचार और न्याय की इसकी कहानी मेरे दिल के बहुत क़रीब है.
कूड़े के ढेर पर बैठे पुरुष या महिलाएं. मैल से सने हुए. उलझे हुए, बिखरे बाल. लगभग नग्न. नाम याद नहीं. परिवार का कुछ पता नहीं. अस्पष्ट शब्दों का उच्चारण करते हुए. लक्ष्यहीन भटकते हुए. एकाकी. दुनिया से पूरी तरह से अनभिज्ञ. हम अपने शहरों में ऐसे कई लोगों को देखते हैं, लेकिन मुंह मोड़ लेते हैं. ईश्वरी संकल्प ने ऐसा न करने का फ़ैसला किया.

आज भी चिकित्सा विज्ञान गंभीर मनोविकारों का इलाज नहीं खोज पाया है, लेकिन कुछ ही हफ़्तों में दवाइयां लगभग सभी दुर्बल करने वाले लक्षणों को नियंत्रित कर सकती हैं, भ्रम और आत्म-क्षति की संभावनाओं को सीमित कर सकती हैं. लेकिन बेघर मानसिक रूप से बीमार मरीज़ों को, जिनका दुनिया में कोई नहीं है, रोज़ाना ये दवाइयां कौन देगा?
ईश्वरी संकल्प ने जो साहसिक उत्तर खोजा, वह यह था कि निश्चित रूप से हर समुदाय में दयालु लोग होते हैं, जिन्हें अगर पहचाना और शिक्षित किया जाए, तो वे इन खोई और भूली हुई आत्माओं के प्रतिनिधि परिवार बन सकते हैं. उनके कार्यकर्ताओं ने पहले शहर का सर्वेक्षण किया और ऐसे 466 बेघर मनोविकारग्रस्त मरीज़ों को खोजा. उन्होंने यह भी पाया कि मानसिक रूप से बीमार बेघर लोगों में अक्सर अपनेपन का एहसास होता है, जैसे कि वे फुटपाथ के किसी खास हिस्से को अपना मानते हैं.
फिर आठ भले युवक-युवतियां उन इलाक़ों में दयालु लोगों की एक अनोखी खोज पर निकल पड़े जहां ये मरीज़ अक्सर आते-जाते थे. उन्होंने जल्द ही इस बात की पुष्टि कर दी कि वास्तव में दयालु लोगों की कोई कमी नहीं है. उन्हें ज़्यादातर ऐसे लोग मज़दूर वर्ग के रेहड़ी-पटरी वालों के बीच मिले, लेकिन कुछ मध्यम वर्ग के लोगों में भी मिले.
एक बेघर, भयंकर दिखने वाला व्यक्ति जिसकी उम्र तीस साल रही होगी, फटे कपड़ों में, लंबे उलझे बाल और दाढ़ी के साथ, बेचैनी में बालीगंज रेलवे स्टेशन के पास बिजोन सेतु फ्लाईओवर पर घूम रहा था. उसका शरीर मैला और कुपोषित था. जब फ़ील्ड वर्कर स्वपन ने शुरुआत में उससे संपर्क किया, तो उसने उससे बात करने या उसके हाथों से भोजन या पानी लेने से भी इनकार कर दिया. उसका विश्वास जीतने के लिए स्वपन को कई हफ़्तों तक लगातार और सौम्य तरीक़े से मगर दृढ़ता से प्रयास करना पड़ा. आख़िरकार, वह तैयार हो गया कि स्वपन उसे मनोचिकित्सक के पास ले जाए, जिन्होंने उसे सिज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित बताया.
स्वपन ने फिर ऐसे व्यक्ति की तलाश की जो उसकी देखभाल करने को तैयार हो. उन्हें सुनील मिला, जो एक शीतल पेय वेंडिंग स्टॉल चलाता है, और कानन मोंडल नाम की एक बुज़ुर्ग विधवा मिली, जो फ्लाईओवर के नीचे चाय बेचती है. दोनों उस आदमी की मदद करने के लिए सहमत हो गए.
नाम के अभाव में फ्लाईओवर के नाम पर उसे बिजोन कहा जाने लगा, जहां वो घूमता था. उसने धीरे-धीरे दवाइयां, स्वच्छता देखभाल, भोजन और परामर्श चिकित्सा लेनी शुरू की और धीरे-धीरे अपने स्वयंसेवी देखभालकर्ताओं स्वपन, सुनील बाबू और कनक माशी से अपनी याददाश्त वापस पाने लगा, जो सड़क पर सामान बेचते थे. उसे अपना असली नाम मोहम्मद आसिफ इक़बाल याद था और वह राजा बाज़ार में अपने मामा के घर में रहता था.
अपने घर जाने के क्रम में बिजोन ने अपने उदास अतीत के बारे में बताया. उसने कम उम्र में अपनी मां को खो दिया और उसके पिता ने उसे अपने मामा के घर में छोड़ दिया. उपेक्षित होने के कारण, उसने स्थानीय लड़कों से दोस्ती की, जिन्होंने उसे कठोर नशीले पदार्थों की लत लगा दी. इससे उसका मानसिक स्वास्थ्य संकट और बढ़ गया. पड़ोसियों तथा परिवार के सदस्यों ने उसे पीटा और डांटा और एक बार पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर लिया.
वह अपने नए दोस्तों स्वपन, सुनील बाबू और कनक माशी को पसंद करने लगा था और उन पर भरोसा करने लगा था. जिस दोपहर मैं उससे मिला, मैंने उसे उनके साथ उनके स्टॉल के बीच बैठा पाया. उसने मुझे बताया कि उसे एक और दोस्त से मिलना है. पता चला कि पास की एक आईटी कंपनी में काम करने वाले एक स्वयंसेवक, अनिर्बान ने, हर दिन लंच ब्रेक में उससे मिलने का प्रस्ताव रखा था. अनिर्बान कुछ ही देर बाद आ गया. उसके हाथ में बिरयानी का एक डिब्बा था, जिसे वह बिजोन के साथ बांटकर खाने के लिए लाया था.
मैं एक और देखभाल करने वाले से मिला, 18 वर्षीय संजय, जो ढाकुरिया के व्यस्त व्यावसायिक इलाक़े में फुटपाथ पर चाय बेचता है. एक अधेड़ उम्र का मानसिक रूप से बीमार आदमी उसके फुटपाथ पर घूमता था, और संजय उसे दिन में दो बार चाय के साथ दवाइयां देने को तैयार हो गया. जब वह ठीक हुआ, तो उसने फिर से अपने घर लौटने से इनकार कर दिया. संजय ने अपने एक परिचित से बात की, जो साइकिल रिक्शा किराए पर देता है, ताकि वह बापीदा, वह इसी नाम से अपने नए दोस्त को बुलाता था, को रिक्शा किराए पर दे सके.
रिक्शा मालिक को शक था. अगर उसने रिक्शा को नुक़सान पहुंचाया तो क्या होगा? हालांकि, संजय उसकी गारंटी लेने के लिए तैयार था और उसे रिक्शा को हुए शुरुआती नुक़सान के लिए मालिक को मनाना पड़ा. लेकिन समय के साथ बापीदा अपनी दुनिया में मगन हो गया. वह संजय के साथ चाय पीता है और रात में फुटपाथ पर उसके ठेले के पास सोता है. मैंने संजय से उस वक़्त बात की जब वह अपने कई ग्राहकों के लिए कुशलता से भाप से भरी चाय उबाल रहा था और परोस रहा था.
मैंने उससे पूछा कि वह ऐसा क्यों करता है. वह थोड़ा मुस्कुराया, फिर बस इतना कहा, ‘भालोलागे.’ मुझे बस यही करना पसंद है.
मुझे मदर टेरेसा के ये शब्द याद आते हैं: ‘हम सभी महान कार्य नहीं कर सकते. लेकिन हम सभी छोटे-छोटे कार्य बड़े प्रेम से कर सकते हैं.’
सुदूर वन क्षेत्रों में अज्ञात मौतें
1980 के दशक में मध्य भारत के घने जंगलों वाले ज़िलों में, जहां बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय रहते थे, प्रशासन के मुखिया के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, मुझे अक्सर एक बेहद परेशान करने वाली जन स्वास्थ्य चुनौती का सामना करना पड़ता था जिसके सामने हम ख़ुद को असहाय पाते थे.
चुनौती यह थी कि समय-समय पर हमें ख़बर मिलती थी कि किसी सुदूर गांव में दसियों, कभी-कभी तो उससे भी ज़्यादा, लोगों की मौत हो गई है. आमतौर पर, यह ख़बर हमें कई दिनों बाद मिलती थी. विशाल उत्तर, पूर्व और मध्य भारत के ग्रामीण इलाक़ों में, ख़ासकर सघन वन वाले आदिवासी इलाक़ों में, संचार व्यवस्था अभी भी ख़राब थी. हम अपना सारा काम छोड़कर गांव की ओर दौड़ पड़ते थे. हम पाते थे कि लोग गंदा पानी पीने, सड़ा हुआ मांस खाने या मलेरिया से मर रहे हैं.
हर बार ऐसा होने पर मुझे भारी निराशा और लाचारी का अनुभव होता था, ऐसा इसलिए होता था क्योंकि इनमें से हर मौत को इतनी आसानी से रोका जा सकता था, फिर भी हम उन्हें रोकने में इतना असहाय महसूस करते थे. इन बीमारियों के लिए बस कुछ ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्ट (ओआरएस), मलेरिया की जांच, पेचिश या मलेरिया की गोलियां खानी होती थीं और गंदा पानी पीने से बचने के लिए कुछ सावधानियां बरतनी पड़ती थीं.
अगर कोई जानवर मर गया हो और उसकी लाश उसी तालाब में सड़ने के लिए छोड़ दी गई हो जहां से समुदाय पीने के लिए पानी भरता है तो इससे बचना होता था. असुरक्षित प्रसव या मां और बच्चे दोनों का टीकाकरण न होने के कारण भी कुछ मौतें हुईं. सिविल सेवा छोड़ने के बाद के वर्षों में मुझे एक असाधारण महत्वाकांक्षी लेकिन अंततः काफ़ी हद तक सफल अभियान में भाग लेने का अवसर मिला, जिसका उद्देश्य ऐसी रोकी जा सकने वाली दुखद मौतों की संख्या को काफ़ी कम करना था.
हमारा दृष्टिकोण रंजीकांत तथा माबेले अरोले, और अभय तथा रानी बंग जैसे सामुदायिक चिकित्सा के अग्रदूतों के प्रयोगों से प्रेरित था. उनका काम लोगों के स्वास्थ्य को लोगों के हाथों में रखने के सिद्धांत को क्रियान्वित करने पर आधारित था. उन्होंने माना कि कम-से-कम 90% लोगों के स्वास्थ्य विकारों के लिए डॉक्टरों के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होती है. इसके लिए, उन्होंने सामुदायिक स्वास्थ्य शिक्षा का सहारा लिया और स्वास्थ्य चुनौतियों को रोकने तथा उनका इलाज करने के लिए लोगों की अपनी क्षमता को विकसित किया.
वे सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, जिनमें ज्यादातर महिलाएं थीं, के माध्यम से काम करते थे, जो कई तरह की सार्वजनिक स्वास्थ्य भूमिकाएं निभाती थीं. उन्होंने समुदाय को स्वच्छ पानी और स्वच्छता की अनिवार्यता जैसे विषयों पर सलाह दी. उन्होंने सुरक्षित प्रसव, प्रसव पूर्व और प्रसवोत्तर जांच सुनिश्चित करने की दिशा में काम किया और बच्चे तथा मां के लिए स्तनपान और स्वस्थ पोषण की सलाह दी.

स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को घर पर नवजात शिशु की देखभाल, मातृ स्वास्थ्य के अलावा महिलाओं के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने और कीटनाशक-लेपित मच्छरदानी जैसे सरल उपकरणों के साथ महामारी की रोकथाम करने के लिए भी प्रशिक्षित किया गया.
यह वैश्विक स्तर पर प्रशंसित कार्य मुख्यतः छोटे-छोटे गांवों पर केंद्रित था. उस समय छत्तीसगढ़ राज्य के लिए हमारी महत्वाकांक्षा बहुत बड़ी थी. क्या हम लोगों के स्वास्थ्य को लोगों के हाथों में सौंपने वाले इस मॉडल, जिसका परीक्षण गांवों के छोटे-छोटे समूहों पर हुआ था, को पूरे छत्तीसगढ़ राज्य में लागू कर सकते थे?
इसके लिए राज्य की अनुमानित 70,000 बस्तियों में से प्रत्येक में महिला सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भर्ती और प्रशिक्षण की आवश्यकता होगी. सौभाग्य से, मुख्यमंत्री ने इस योजना को स्वीकार कर लिया. उन्होंने मुझे इस प्रयास की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया, जो मैंने दस वर्षों तक किया, सरकार बदलने के बाद भी. प्रमुख जन स्वास्थ्य व्यवसायी टी. सुदरारमन इस प्रयास के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनने के लिए पांडिचेरी स्थित अपने घर से छत्तीसगढ़ स्थानांतरित होने के लिए सहमत हुए.
हमने इस कार्यक्रम को मितानिन नाम दिया, जिसका छत्तीसगढ़ी भाषा में अर्थ मित्र होता है. इसमें कई चुनौतियां थीं, बड़े पैमाने की, जैसे कि सड़कों से दूर समूहों में आबादी का फैलाव, और यह भी कि कई महिला सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता अशिक्षित थीं. फिर भी कार्यक्रम पूरी तरह से धरातल पर उतर गया. परिणाम हमारी अपेक्षाओं से कहीं बढ़कर थे. जन स्वास्थ्य के प्रमुख संकेतकों, जैसे शिशु और मातृ मृत्यु दर, में हमारी अपेक्षा से बहुत कम समय में उल्लेखनीय सुधार हुआ. इसने आशा नामक महिला सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम के लिए एक प्रकार के पायलट प्रोजेक्ट का काम किया.
शहरी ग़रीबों तक स्वास्थ्य सेवा की पहुंच
मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार से पहले, भारत की पिछली संघीय सरकार में स्वास्थ्य सचिव रहे केशव देसीराजू ने मुझे शहरी ग़रीबों तक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करने के तरीक़ों पर सरकार को सलाह देने वाली एक समिति का नेतृत्व करने के लिए आमंत्रित किया था.
मैंने देश के कई प्रमुख प्रगतिशील जन स्वास्थ्य पेशेवरों को इस प्रयास में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया, और उनमें से अधिकांश ने उदारतापूर्वक सहमति व्यक्त की. हमने कड़ी मेहनत की, कष्ट सहे, तर्क-वितर्क किए और व्यापक यात्राएं कीं ताकि कुछ ही महीनों में अपनी रिपोर्ट तैयार कर सकें. हालांकि, हमारे निष्कर्षों और सिफ़ारिशों पर विचार करने का मौक़ा मिलने से पहले ही सरकार गिर गई.
इस अभ्यास से शायद सबसे अप्रत्याशित अनुभव यह हुआ कि शहरी कामकाजी और बेसहारा ग़रीब, ग्रामीण ग़रीबों की तुलना में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं से और भी ज़्यादा वंचित हैं. भारत के ग्रामीण इलाक़ों में, कम-से-कम सैद्धांतिक रूप से, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों द्वारा सेवाएं प्रदान की जाती हैं. यह अलग बात है कि इनका बजट बहुत कम होता है और अक्सर इनमें कर्मचारियों, उपकरणों और दवाओं की भारी कमी होती है. लेकिन अधिकांश शहरी भारत में किसी भी प्रकार के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं हैं.

तृतीयक और उच्च-तृतीयक सार्वजनिक अस्पतालों में क्षमता से कहीं अधिक भीड़भाड़ है, और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में इस अमानवीय कमी के कारण कई कामकाजी ग़रीब शहरी निवासी अप्रशिक्षित निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं पर भारी रक़म ख़र्च करते हैं.
इससे एक और महत्वपूर्ण सीख मिली वह थी शहरी ग़रीब आबादी की आश्चर्यजनक विविधता, जिसके स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अलग-अलग प्रभाव पड़ते हैं. पहली बात तो यह है कि आवासीय विविधताएं बहुत ज़्यादा हैं. कुछ लोग जिनके पास बिल्कुल भी घर नहीं है, वे शहर के फुटपाथों, पार्कों, पार्किंग केंद्रों, ह्यूम पाइपों या सीवेज से भरी खुली नालियों के किनारे सोते हैं. कुछ बेघर आश्रयों में रहते हैं. कुछ के घर फुटपाथों पर हैं. कुछ लोग झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं, जिनके घर प्लास्टिक और कचरे से बने हैं और जहां कोई सार्वजनिक सेवाएं नहीं हैं.
कुछ लोग सरकार द्वारा नियमित की गई झुग्गियों में रहते हैं, इसलिए वहां सार्वजनिक नल जैसी कुछ बुनियादी सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध हैं. कुछ लोग भीड़-भाड़ वाले, हवा रहित पुराने शहर के भीतरी इलाक़ों में रहते हैं.
शहरी ग़रीब पुरुषों और महिलाओं की आजीविका में भी भारी विविधता है. कामकाजी लोगों के विशाल समूह को जो चीज़ एक-दूसरे से जोड़ती है, वह यह है कि उनका काम अनियमित, अनिश्चित, अस्वस्थ, अनौपचारिक, असुरक्षित है, जिसमें कोई सामाजिक और स्वास्थ्य सुरक्षा नहीं है. इसके अलावा, विभिन्न व्यवसायों में स्वास्थ्य संबंधी विविध ख़तरे भी होते हैं. उदाहरण के लिए, कई महिलाएं अपनी भीड़-भाड़ वाली झुग्गी-झोपड़ियों के घरों के कुछ वर्ग मीटर के दायरे में काम करती हैं, और अपने बच्चों तथा बूढ़े माता-पिता से भी काम करवाती हैं ताकि उन्हें वैधानिक न्यूनतम मज़दूरी का एक छोटा-सा अंश ही मिल सके.
वंचित जातियों के पुरुष सीवर साफ़ करने के लिए उसमें उतरते हैं और कभी-कभी सीवेज से निकलने वाली गैसों से मानव मल में डूबकर मर जाते हैं. सिर पर बोझा ढोने वाले कामगारों को गर्दन और रीढ़ की हड्डी में भयानक तनाव का सामना करना पड़ता है. चक्कर आने वाली ऊंची इमारतों पर निर्माण मज़दूर ज़मीन से सैकड़ों मीटर ऊपर बिना किसी सुरक्षा के काम करते हैं. यौन कार्य पूरी तरह से असुरक्षित है. कचरा बीनने वाले कचरे के ढेरों में काम करते हैं, और अनगिनत घातक संक्रमणों के संपर्क में आते हैं. मैं और भी बहुत कुछ कह सकता हूं.
भुखमरी को समझना
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के विशेष आयुक्त के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, मैंने भूख और भुखमरी के कारण होने वाले गंभीर परिणामों के बारे में बहुत कुछ सीखा. एक प्रमुख मानवाधिकार समूह, पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज़ ने भोजन और पोषण के मौलिक अधिकार की मांग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में एक ऐतिहासिक जनहित याचिका दायर की, जिसमें उस स्थिति की ओर इशारा किया गया जिसमें देश का हर दूसरा बच्चा कुपोषित है तथा सरकारी गोदामों में 6 करोड़ टन से ज़्यादा खाद्यान्न जमा है, जिसमें से ज़्यादातर पड़ा-पड़ा सड़ रहा है.
सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी. जब तक संसद भोजन के वैधानिक अधिकार को क़ानून नहीं बना देती, तब तक सर्वोच्च न्यायालय देश की सर्वोच्च अदालत के दो आयुक्तों के माध्यम से इस अधिकार के प्रवर्तन की निगरानी करेगा. मैं इन दो आयुक्तों में से एक था.
बारह साल तक मैंने भुखमरी के दावों की जांच-पड़ताल के लिए देश के दूर-दराज़ इलाक़ें की यात्रा की. हर यात्रा कष्टदायक थी. जंगलों के अंदरूनी इलाक़ों में बसे गांवों में मैं इतने कम वज़न की महिलाओं और बच्चों को देखता था कि यह अचरज की बात लगती थी कि वे ज़िंदा कैसे हैं. महिलाएं पीड़ा बयां करती थीं कि अपने बच्चों को यह बताती हैं कि उनकी लाख कोशिशों के बावजूद हर महीने कुछ रातें ऐसी होंगी जब वह उनकी थाली में खाना नहीं रख पाएंगी. मैंने अनगिनत बार ऐसा देखा है कि साधारण बुख़ार और दस्त के कारण उनके बच्चे की मौत हो जाती थी क्योंकि उनके शरीर में लड़ने की ताक़त नहीं थी.

मैंने सीखा कि जो लोग नियमित रूप से भूख से जूझते हैं, वे कैसे इससे निपटते हैं. सबसे पहले, वे दृढ़ता और मज़बूती से अपने शरीर को भोजन की कम-से-कम लालसा करना सिखाते हैं. वे जबरन अपने शरीर को तीन भोजन से दो, फिर दो भोजन से एक भोजन तक ले आते हैं. दूसरे, इनमें से प्रत्येक समुदाय कंद, घास या आम की गुठली जैसे कचरे की पहचान करता है जो मुफ़्त में मिलते हैं और उनके पेट भरने तथा उनकी भूख मिटाने के काम आते हैं.
मैं उन्हें छद्म भोजन कहता हूं. वे जो खाते हैं उसका कोई खाद्य मूल्य नहीं होता और अक्सर शरीर के लिए हानिकारक, यहां तक कि ज़हरीला भी होता है. वे इन्हें उबालकर ज़हर निकालने की कोशिश करते हैं, और फिर जो बचता है उसे खा लेते हैं. ये छद्म खाद्य पदार्थ शरीर को कोई पोषण नहीं देते. बल्कि, ये शरीर में हानिकारक विषाक्त पदार्थों को जमा कर देते हैं.
नियमित भुखमरी से निपटने का तीसरा तरीक़ा, जिसका मुझे हर जगह सामना करना पड़ा, उसे मैं केवल हताशा भरे विकल्प ही कह सकता हूं. यह तब होता है जब कोई व्यक्ति ख़ुद को, या यहां तक कि अपने बच्चे को भी बंधक बना देता है. वे अपने बच्चे को स्कूल से निकालकर काम पर लगा देते हैं. यहां तक कि कभी-कभी तो वे बच्चे को बेच भी देते हैं.
एक महिला जिसने अपने बच्चे को बेचा था, जब मैं उससे उसके घर पर मिला तो वह फूट-फूटकर रो पड़ी. ‘मैं अपने बच्चे से बहुत प्यार करती थी, इसलिए मैंने उसे बेच दिया. क्या आप नहीं समझते? मैंने अपने बच्चे को इसलिए बेचा क्योंकि मैं उससे प्यार करती थी और चाहती थी कि वह ज़िंदा रहे.’
भारत का खाद्य अधिकार क़ानून तैयार करना
पिछली भारत सरकार ने मुझे ग़रीबी तथा सामाजिक रूप से वंचित लोगों के लिए क़ानून और नीतियां बनाने के संबंध में प्रधानमंत्री को सलाह देने के लिए गठित एक परिषद में भी आमंत्रित किया था.
मुझे जिन क़ानूनों को तैयार करने में मदद करने के लिए बुलाया गया था, उनमें से एक खाद्य अधिकार क़ानून था. इस क़ानून में क्या शामिल होना चाहिए, इस बारे में होनी वाली गहन, कभी-कभी गरमागरम बहसों से मैंने बहुत कुछ सीखा.
उदाहरण के लिए, मैंने सीखा कि तीन तरीक़े हैं जिनसे एक परिवार को गरिमापूर्ण सक्रिय तथा स्वस्थ जीवन जीने के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराया जा सकता है.
इनमें से एक है इस भोजन को उगाना. इसके लिए किसानों, विशेष रूप से छोटे, सीमांत और काश्तकारों, तथा मत्स्य श्रमिकों एवं वन संग्राहकों के अधिकारों की रक्षा करना आवश्यक होगा.
दूसरा, परिवार अपनी खाद्य आवश्यकताओं को ख़रीदने में सक्षम हो सके. इसके लिए महिलाओं और विकलांगों सहित सभी कामकाजी लोगों के श्रम अधिकारों की सुरक्षा आवश्यक होगी.

तीसरा, परिवार को निजी दान या राज्य सामाजिक सुरक्षा के माध्यम से भोजन प्राप्त हो. यही वह अंतिम लक्ष्य था जिसे हमने अपने लिखे क़ानून के माध्यम से पूरा करने का प्रयास किया. लगभग 80 करोड़ लोग – आधे शहरी परिवार और तीन-चौथाई ग्रामीण परिवार – अपनी आधी कैलोरी आवश्यकताओं को लगभग मुफ़्त प्राप्त करने के हक़दार होंगे. लगभग 16 करोड़ बच्चों को स्कूल-पूर्व भोजन मिलेगा, और सरकारी स्कूलों के लगभग 12 करोड़ बच्चों को गर्म पका हुआ भोजन मिलेगा.
अपने दायरे के हिसाब से, यह शायद दुनिया में क़ानून द्वारा अनिवार्य रूप से लागू सबसे बड़ा सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम है. फिर भी, हर साल भारत वैश्विक भूख सूचकांक में और नीचे गिरता जा रहा है, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था लगातार बढ़ रही है. यहां तक कि नेपाल और बांग्लादेश जैसे भारत के बेहद ग़रीब पड़ोसी देश भी भूख से लड़ने में भारत से आगे निकल गए हैं.
मैंने सीखा कि सामाजिक अधिकारों के लिए क़ानून ज़रूरी है. लेकिन यह काफ़ी नहीं है.
मेरी मां और एक बेघर महिला
हाल के वर्षों में मेरे माता-पिता दोनों का निधन हो गया. मेरी मां का निधन 80 साल से अधिक उम्र में हुआ, और मेरे पिता का 92 वर्ष की आयु में. उनके निधन से पहले के इन वर्षों में, वे अस्पतालों के चक्कर लगाते रहे, कभी-कभी तो लगातार कई वर्षों तक. मैं हमेशा उनके साथ रहने की कोशिश करता था, हर बार उनके लिए बेहद आभारी होता था कि वे जीवन के कुछ और साल, महीने, दिन जी सकें.
लेकिन इन सबके बीच एक विचार मुझे परेशान करता रहता था. मेरे माता-पिता बढ़ते अस्पताल के बिलों का भुगतान केवल इसलिए कर पाते थे क्योंकि मेरे पिता भारत की उच्च प्रशासनिक सेवा और संयुक्त राष्ट्र में वर्षों तक सेवारत रहे थे. यह विचार मेरे मन से कभी नहीं जाता था कि अगर हम ग़रीब होते, तो मेरे माता-पिता इतने लंबे समय तक जीवित नहीं रह पाते. हालांकि मैं भाग्यशाली था कि वे जीवित रहे, मैं लगातार इस कठोर वास्तविकता के प्रति सचेत था कि मेरे देश में – और दुनिया के अधिकांश हिस्सों में – स्वास्थ्य सेवा तक मेरी पहुंच इस बात पर निर्भर नहीं करती कि मेरी ज़रूरत कितनी ज़रूरी है. बल्कि यह इस बात पर निर्भर करती है कि मेरा विशेषाधिकार कितना बड़ा है.
प्रभावशाली पदों पर रहते हुए, एक नीति सलाहकार के रूप में, एक अदालती पर्यवेक्षक के रूप में, एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में और एक नागरिक के रूप में, यही वो सबक़ है जो मैंने बार-बार सीखा है.
मैं उस बेघर मानसिक रूप से बीमार महिला के बारे में सोचता हूं जिसके बारे में मैंने पहले बात की थी. जैसा कि मैंने कहा, मैल से ढकी हुई. उलझे हुए बिखरे बाल. लगभग नग्न. नाम याद नहीं. परिवार का कुछ पता नहीं. गूढ़ शब्द बुदबुदाती हुई. लक्ष्यहीन भटकती हुई. एकाकी. दुनिया से पूरी तरह अनभिज्ञ.
मैं एक ऐसे विश्व की कामना करता हूं जहां उसे जीवन की ठीक वैसी ही संभावनाएं प्राप्त हों जैसी मेरी मां को थीं, जहां उसका इलाज उन्हीं अस्पतालों में उसी सम्मान, गरिमा और देखभाल के साथ किया जाए जहां मेरी मां को उपचार मिला था जिससे उसके जीवन में कई बहुमूल्य वर्ष जुड़ गए.
(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)
