भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों का आगमन: आशंका और सवाल

भारत सरकार ने विदेशी विश्वविद्यालयों को अपने यहां आने की इजाज़त दी है. बिना स्वतंत्रता के शिक्षा और ज्ञान का सृजन असंभव है. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में अब जिस तरह के नियंत्रण लागू किए जा रहे हैं, उसके बाद वहां के विश्वविद्यालयों का आकर्षण ख़त्म हो रहा है. क्या भारत में इन विदेशी विश्वविद्यालयों को यह स्वतंत्रता मिलेगी?

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(प्रतीकात्मक फोटो साभार: फेसबुक/Federation University Australia)

ब्रिटेन के आठ और विश्वविद्यालय भारत में अपनी शाखाएं शुरू करने जा रहे हैं. इस खबर के बाद आलोचना का सिलसिला शुरू हुआ है. लेकिन यूनिवर्सिटी ऑफ साउथैम्पटन के परिसर की स्थापना गुड़गांव में पहले ही हो चुकी है. अब बेंगलुरु में द यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल, लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी, मुंबई में यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क, यूनिवर्सिटी ऑफ एबरडीन, यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल, गिफ़्ट सिटी, गांधीनगर में क्वीन्स यूनिवर्सिटी ऑफ बेलफ़ास्ट, कोवेंट्री यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ सर्रे को अपने परिसर खोलने की इजाज़त दे दी गई है.

इस महीने भारत के प्रधानमंत्री और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के बीच हुई मुलाक़ात के बाद दोनों ने ही इसका ऐलान करते हुए ख़ुशी का इज़हार किया. ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने कहा कि ब्रिटेन अब भारत में उच्च शिक्षा देनेवाला सबसे बड़ा देश बन गया है.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की ख़ुशी की ठोस दुनियावी वजह है. उन्होंने अपनी जनता को बतलाया है कि भारत में ब्रिटिश शिक्षा संस्थाओं के विस्तार से तक़रीबन 50 मिलियन पाउंड, यानी 535 करोड़ रुपये की कमाई होगी. ब्रिटेन की तंग हाल अर्थव्यवस्था के लिए इस रक़म के मायने हैं. ब्रिटेन के लिए इसके और फ़ायदे हैं.

पिछले कुछ वर्षों में ब्रिटेन में बाहर से आनेवालों को लेकर आशंका और बेचैनी है और उनकी संख्या नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है. अच्छी ख़ासी तादाद वैसे विद्यार्थियों की है जो वहां पढ़ने जाते हैं और फिर काम की तलाश में वहां रह जाते हैं. काम के लिए वीज़ा की मांग करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. ब्रिटेन की सरकार इसे क़ाबू करना चाहती है.

लेकिन अगर वह विद्यार्थियों को वीज़ा न दे तो फिर उनसे होनेवाली कमाई की भरपाई कैसे हो? यह कमाई सबसे ज़्यादा भारत के विद्यार्थियों से होती रही है. उनकी तादाद अब चीनी विद्यार्थियों की तादाद से भी ज़्यादा हो गई है. ब्रिटेन उनसे पैसे तो चाहता है लेकिन यह नहीं चाहता कि पढ़ाई के बाद फिर काम के लिए वे वहां रुकें.

भारतीय विद्यार्थियों के लिए ब्रिटेन जाने का एक बड़ा आकर्षण वहां रहकर कमाई करने का है. बात सिर्फ़ कमाई की नहीं है. उन्हें ब्रिटेन का जीवन भारत से कहीं बेहतर जान पड़ता है. ऐसे लोगों की संख्या पिछले एक दशक में कई गुना बढ़ गई है.

 ब्रिटेन में विदेशियों की इस बढ़ती संख्या को लेकर विरोध बढ़ता जा रहा है. इसलिए छात्रों के लिए वीज़ा पर सख्ती भी बढ़ रही है. दोनों में संतुलन का एक तरीक़ा है ब्रिटेन की उच्च शिक्षा का निर्यात. वैसे भी भारतीयों से कमाई के लिए पहले ही ब्रिटिश विश्वविद्यालय कम अवधि के पाठ्यक्रम चला रहे थे. यह आर्थिक संकट से उबरने का उनका एक तरीक़ा है.

भारत में विलायत के ठप्पे की चाहत का लाभ उठाते हुए सिर्फ़ पैसे के लिए ब्रिटिश विश्वविद्यालयों ने ऐसे पाठ्यक्रम शुरू किए जिनकी अकादमिक क़ीमत बहुत कम है. ब्रिटेन में अकादमिक जगत में इसकी आलोचना भी हुई. लेकिन भारत की तरह ही ब्रिटेन की सरकार को शिक्षा की गुणवत्ता से अधिक दूसरी फ़िक्र है. एक तरफ़ अध्यापकों को काम से निकालना और दूसरी तरफ़ पैसा कमाने के लिए अकादमिक दृष्टि से संदिग्ध पाठ्यक्रम, जो भारतीयों के सहारे ही चलते हैं.

लेकिन जैसा पहले कहा गया, वीज़ा के नियमों में सख्ती की वजह से अब बाहरी छात्रों की संख्या में भी गिरावट आ रही है. इसका एक उपाय है अब उन देशों में जाकर पाठ्यक्रम शुरू करना जहां से छात्र ब्रिटेन आ रहे थे.

यह ब्रिटेन के लिए फ़ायदेमंद है. यहां खर्च कम होगा. अध्यापकों के वेतन से लेकर रखरखाव में घर के मुक़ाबले कम खर्च आएगा. यहां से मुनाफ़ा ब्रिटेन ले जाने की इजाज़त है. यह सब कुछ देखते हुए ब्रिटेन के आर्थिक दृष्टिकोण से यह फ़ायदे का धंधा है.

भारत को क्या मिलेगा? वह प्रधानमंत्री ने नहीं बतलाया.

लेकिन नीति आयोग, विश्वविद्यालय आयोग और भारत सरकार के शिक्षा विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक़, भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों को इसलिए बुलाया जा रहा है कि इससे भारतीय छात्रों को विश्वस्तरीय शिक्षा मिल पाएगी.

दूसरा फ़ायदा यह है, जो शायद पहला है कि इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी. जो पैसा बाहर जा रहा था,वह अब भारत में ही रहेगा. छात्र भी कम पैसे में विश्वस्तरीय शिक्षा हासिल कर पाएंगे. आने जाने, वहां रहने का खर्चा तो बचेगा ही, फ़ीस भी ब्रिटेन के मुक़ाबले कम होगी.

भारतीय विश्वविद्यालयों को भी अपनी गुणवत्ता बढ़ानी होगी क्योंकि उनकी प्रतियोगिता इन संस्थानों से होगी. अगर वे चाहते हैं कि छात्र उनके यहां दाख़िला लें तो उन्हें ख़ुद को बेहतर बनाना होगा. चूंकि बाहर के विश्वविद्यालयों में शोध, आदि का स्तर बेहतर है, यहां के विश्वविद्यालयों को मजबूर होकर ख़ुद को बेहतर बनाने के लिए मेहनत करनी होगी.

सरकार का कहना है कि इसका एक लाभ यह है कि भारत शिक्षा का अड्डा बन जाएगा. शिक्षा का अड्डा बनने का क्या मतलब है?

यही हो सकता है कि दूसरे देशों से छात्र और शोधार्थी भी आपके यहां आना चाहें. दूसरे देशों से विश्वविद्यालयों के शाखा खोलने का मतलब सिर्फ़ एक है कि भारत में एक बड़ा तबका उनका है जो विदेशी डिग्री के लिए ढेर सारा पासा खर्च कर सकते हैं और उस पर बाहर के संस्थानों की नज़र है. तो बेचने वाले यहां अपनी दुकान यहां खोलेंगे क्योंकि भारत में ख़रीदार बहुत हैं. लेकिन इससे भारत शिक्षा का अड्डा नहीं बन जाता.

अमेरिका ख़ुद को शिक्षा का अड्डा कह सकता था और ब्रिटेन भी. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के बाद अमेरिका के प्रति उन लोगों का आकर्षण कम हो रहा है जो श्रेष्ठ शिक्षा के लिए वहां जाते थे. अब अच्छे अध्यापक भी अमेरिका छोड़कर कहीं और रुख़ करने की सोच रहे हैं. अमेरिका के विश्वविद्यालय जिस वजह से श्रेष्ठता का दावा कर सकते थे, यानी स्वतंत्रता, वह अब नहीं रही. बिना स्वतंत्रता के शिक्षा और ज्ञान का सृजन असंभव है.

शोध, पाठ्यक्रम, कक्षा में चर्चा, अध्यापकों के चयन, विद्यार्थियों के दाख़िले और परिसर में अन्य गतिविधियों में स्वतंत्रता: इन सबके बिना ज्ञान का सृजन और स्थानांतरण असंभव है. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में अब जिस तरह के नियंत्रण लागू किए जा रहे हैं, उसके बाद वहां के विश्वविद्यालयों का आकर्षण ख़त्म हो रहा है. क्या भारत में यह स्वतंत्रता इन विदेशी विश्वविद्यालयों को मिलेगी?

सरकार ने वादा किया है कि भारतीय क़ानूनों के भीतर इन मामलों में हर तरह की स्वायत्तता इन संस्थानों को मिलेगी. इसका स्वागत किया जाना चाहिए. यह स्वायत्तता अभी कुछ मायनों में भारतीय निजी विश्वविद्यालयों को हासिल है. वहां अध्यापक ख़ुद अपने पाठ्यक्रम बना सकते हैं. उसी तरह वे अध्यापकों के चयन में भी उन्हें स्वायत्तता हासिल है.

यह कितनी अजीब बात है कि जो स्वायत्तता निजी विश्वविद्यालयों और विदेशी विश्वविद्यालयों को उपलब्ध है, वह दिल्ली विश्वविद्यालय या जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे शीर्ष संस्थानों को मयस्सर नहीं है. हर रोज़ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या शिक्षा मंत्रालय कोई न कोई निर्देश जारी करते रहते हैं जिनका पालन इन्हें करना पड़ता है.

मसलन, हर विषय में भारतीय ज्ञान परंपरा को लागू करने का आदेश. क्या यह विदेशी विश्वविद्यालयों को भी करना होगा? अगर उनके लिए यह अनिवार्य नहीं है तो पटना विश्वविद्यालय या मद्रास विश्वविद्यालय या दिल्ली विश्वविद्यालय के लिए क्यों अनिवार्य है? विदेशी विश्वविद्यालय के विद्यार्थी तो भारतीय ही हैं. उन्हें क्यों भारतीय ज्ञान परंपरा के ज्ञान से वंचित रखा जा रहा है?

उसी प्रकार हम यह भी जानते हैं कि पिछले 10 सालों में दिल्ली विश्वविद्यालय या जेएनयू में जिस तरह के अध्यापकों को नियुक्त किया गया है, उनमें से शायद ही किसी को विदेशी विश्वविद्यालय अपने यहां आमंत्रित करेंगे. इसका अर्थ क्या है? क्यों विदेशी विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को ऐसे अध्यापकों की मेधा का लाभ नहीं मिले?

आशंका जतलाई जा रही है कि विदेशी विश्वविद्यालय अच्छे अध्यापकों को अपने यहां ले जाएंगे. अगर हम भारत के निजी विश्वविद्यालयों का रिकॉर्ड देखें तो उनमें पिछले 10 सालों में जिन अध्यापकों को नियुक्त किया गया है, उन्हें जेएनयू या दिल्ली विश्वविद्यालय कभी नौकरी न देते. यह बात युवा और वरिष्ठ, दोनों तरह के अध्यापकों पर लागू होती है. इससे भारत के सार्वजनिक विश्वविद्यालयों के बारे में क्या पता चलता है.

विदेशी शिक्षा संस्थानों की भारत में स्थापना अपने आप में कोई विपदा नहीं है. अगर जूते या फोन या कार के विदेशी ब्रांड यहां आ सकते हैं तो शिक्षा क्यों नहीं? पूंजीवाद का सिद्धांत शिक्षा पर क्यों नहीं लागू होगा? अगर स्कूलों में भी हम विदेशी बोर्ड को स्वीकृति दे चुके हैं तो विश्वविद्यालय इससे बाहर क्यों रहें?

 मुझे एक दूसरी बात की भी ख़ुशी है. जिन युवा अध्येताओं को हमारे सार्वजनिक विश्वविद्यालय कभी नियुक्त नहीं करेंगे, उनके लिए इन विश्वविद्यालयों में जगह हो सकती है. यह इसलिए कि निजी या विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति का आधार उनके अपने विषयों में उनकी दक्षता होगी, न कि हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के प्रति उनकी वफ़ादारी. कम से कम ऐसे योग्य अध्येता भटकते तो नहीं रहेंगे!

दूसरे, संभवतः इन विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम विषय की मांग के अनुसार बनाए जाएंगे, सरकारी राष्ट्रवाद के प्रचार के लिए नहीं. तो भारत में इसका बोध बचा रहेगा कि इतिहास क्या होता है या समाजशास्त्र किसे कहते हैं. यही बात साहित्य पर लागू होती है. साहित्य का बोध भी बचा रहेगा.

इन विश्वविद्यालयों ने अभी वैसे पाठ्यक्रम ही घोषित किए हैं जिन पर राष्ट्रवादी निगाह नहीं जाएगी. सूचना प्रौद्योगिकी, प्रबंधन या टेक्नोलॉजी से जुड़े हुए पाठ्यक्रम ही अभी शुरू किए जा रहे हैं. विज्ञान या समाज विज्ञान या मानविकी के पाठ्यक्रमों में देर है. या शायद वे लंबे अरसे तक शुरू ही न हों. अगर हुए, तो इसकी संभावना है कि कभी उनकी और हमारे शीर्ष विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों की कोई तुलना करेगा. तब मालूम होगा कि एक ही देश में ज्ञान की समझ और गुणवत्ता में कितनी असमानता पैदा कर दी गई है.

हम ऐसी संगोष्ठियों की कल्पना भी कर सकते हैं जिनमें इन विदेशी विश्वविद्यालयों के अध्यापक और हमारे विश्वविद्यालयों के अध्यापक एक साथ भाग लें. तब जेएनयू या जामिया मिलिया इस्लामिया या दिल्ली विश्वविद्यालयों के छात्र यह देख पाएंगे कि विद्वत्ता क्या होती है और उनके संस्थानों ने उनके साथ क्या खिलवाड़ किया है.

यह भी हो सकता है कि ख़ुद को बचाने के लिए ये विश्वविद्यालय अपने इर्दगिर्द इतनी ऊंची दीवारें खड़ी कर लें कि हमें कुछ मालूम ही न हो सके कि उनके भीतर क्या चल रहा है. एक बात का भांडा तो अभी ही फूट गया है. सरकार यह कह रही है कि स्थानीय शिक्षा संस्थानों को इन विदेशी संस्थानों से गुणवत्ता और ज्ञान के स्तर का कुछ पता चलेगा. यानी गुणवत्ता और ज्ञान का भान इन 11 वर्षों के राष्ट्रवादीकरण के बाद भी नहीं हो पाया है और वह सिखलाने के लिए आज भी हमें विदेशी चाहिए. इससे इन 11 वर्षों के बारे में क्या मालूम होता है?

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं. )