नई दिल्ली: दिल्ली की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार द्वारा उर्दू मीडिया से जुड़े पत्रकारों के साथ ‘भेदभाव’ और ‘सौतेला व्यवहार’ किए जाने का मामला प्रकाश में आया है.
गौरतलब है कि गत 13 अक्टूबर को दिल्ली सरकार के सूचना एवं प्रचार निदेशालय, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ने अपने ‘दीपावली मंगल मिलन’ कार्यक्रम के अंतर्गत अशोका होटल में आयोजित समारोह में प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों को मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के साथ विशेष संवाद और बातचीत के लिए आमंत्रित किया था. इस समारोह में दिल्ली कैबिनेट के सारे मंत्री उपस्थित थे.
उर्दू मीडिया के मुताबिक दिल्ली की भाजपा सरकार ने पिछली सरकारों की परंपरा को तोड़ते हुए उर्दू मीडिया से जुड़े किसी पत्रकार और उन उर्दू पत्रकारों को भी इस मिलन समारोह में नहीं बुलाया, जो लंबे समय से दिल्ली सरकार और भाजपा को कवर करते आ रहे हैं.
शायद ये पहला मौक़ा है जब दिल्ली सरकार ने उर्दू मीडिया से दूरी बनाने की कोशिश की है.
आज दिवाली मंगल मिलन समारोह में हमारे मीडिया बंधुओं से आत्मीय संवाद का अवसर मिला।
कार्यक्रम में कैबिनेट मंत्रिगण श्री प्रवेश साहिब सिंह जी, श्री आशीष सूद जी, श्री मनजिंदर सिंह सिरसा जी, श्री रविन्द्र इन्द्राज जी एवं श्री कपिल मिश्रा जी की गरिमामयी उपस्थिति रही।
मीडिया के सभी… pic.twitter.com/roKc4OPQCY
— Rekha Gupta (@gupta_rekha) October 13, 2025
उर्दू और उर्दू वालों को छोटा दिखाने की कोशिश
जानकारी के मुताबिक़, समारोह में शिरकत के लिए निमंत्रण डीआईपी निदेशक सुशील सिंह द्वारा वॉट्सऐप पर भेजा गया था.
पत्रकारों के बीच इसे अल्पसंख्यक विरोधी क़दम बताया जा रहा है, और इसे उर्दू और उर्दू वालों को छोटा दिखाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है.
आम आदमी पार्टी के नेता और पूर्व खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री इमरान हुसैन ने भाजपा पर सांप्रदायिक राजनीति का आरोप लगाते हुए कहा है कि, ‘उर्दू पत्रकारों के साथ सौतेला बर्ताव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.’
उन्होंने ये भी इल्ज़ाम लगाया कि इससे पहले उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उर्दू के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी की थी, अब ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता उनसे भी आगे निकलना चाहती हैं.’
सरकार के इस क़दम से नाराज़ कई पत्रकारों ने दिल्ली सरकार के पीआरडी डिपार्टमेंट में इस मामले को मजबूती उठाने की बात कही है. दावा किया जा रहा है कि भाषा के स्तर पर ऐसे भेदभाव का यह पहला मामला है.

उर्दू अख़बार ‘हमारा समाज’ के संपादक सादिक शेरवानी ने द वायर को बताया, ‘दिल्ली की पिछली भाजपा सरकार की बात करें तो उस समय भी उर्दू मीडिया के साथ इस तरह का सुलूक नहीं किया गया था, बल्कि मदन लाल खुराना और सुषमा स्वराज उर्दू-प्रेमी समझे जाते थे. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं और ऐसा माना जाता है कि भाजपा हर वो काम करती है, जो उसके तुष्टीकरण की राजनीती को मज़बूत कर सकती है.’
उन्होंने कहा, उर्दू ‘सिर्फ़ मुसलमानों की ज़बान नहीं है, लेकिन भाजपा ऐसा संदेश देना चाहती है कि ये मुसलमानों की ज़बान है.’
सादिक यह भी कहते हैं कि अगर ये ‘चूक’ है तो कैसे मुमकिन है कि उर्दू मीडिया से जुड़े किसी भी पत्रकार को निमंत्रण नहीं मिला. अगर ये चूक होती तो किसी एक मीडिया संस्थान के पत्रकार तो इस समारोह में होते.
वहीं, ‘हमारा समाज’ से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार संजय गोयल पूछा कि आख़िर उर्दू भाषा से जुड़े पत्रकारों की अनदेखी क्यों की गई, जबकि उर्दू दिल्ली की दूसरी आधिकारिक भाषा है.’
गोयल ने बताया, ‘1993 से 1998 तक दिल्ली में बनी पहली भाजपा सरकार- जिसमें मदन लाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा और कुछ महीनों के लिए सुषमा स्वराज भी मुख्यमंत्री थीं- के दौरान हमने देखा है कि न सिर्फ सरकारी स्तर पर, बल्कि पार्टी स्तर पर भी उर्दू के साथ कभी कोई भेदभाव नहीं हुआ.’
अख़बार के मुताबिक़, वरिष्ठ पत्रकारों का एक प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से मिलकर इस व्यवहार पर आपत्ति दर्ज कराएगा.
‘हिंदुस्तान एक्सप्रेस’ से जुड़े पत्रकार फरहान यह्या ने द वायर को बताया, ‘मैं 2007 से एक्रीडेटेड पत्रकार हूं, और इससे पहले जब शीला दीक्षित और अरविंद केजरीवाल की सरकारें थी तो हमेशा दीपावली और दूसरे मौकों पर कभी ऐसा नहीं हुआ कि भाषा की बुनियाद पर पत्रकारों के साथ भेदभाव किया गया. पहली बार ऐसा हुआ है कि उर्दू के किसी सहाफ़ी को नहीं बुलाया गया.’
वो कहते हैं, ‘उर्दू पत्रकारों को इस बात का दुःख नहीं है कि उन्हें क्यों नहीं बुलाया गया, बल्कि उन्हें इस बात से ठेस पहुंची है कि इस सरकार ने भाषा के नाम पर पत्रकारों को बांटने की कोशिश की है.’
फरहान का दावा है कि ‘बहुत जल्द उर्दू मीडिया से जुड़े पत्रकार दिल्ली के उपराज्यपाल से मुलाक़ात करेंगे.’
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक मासूम मुरादाबादी ने बताया, ‘सरकार का जो रवैया उर्दू के साथ है वही रवैया उर्दू के पत्रकारों और अखबारों के साथ भी है. इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है.’
वो कहते हैं, ‘मौजूदा व्यवस्था में उर्दू के लिए कोई जगह नहीं है. आम आदमी पार्टी की सरकार तक उर्दू अख़बारों को इश्तिहार मिलता था, वो अब नदारद है. ये पूर्वाग्रह और संकीर्णता है, और इनका जो एजेंडा है उसमें ये कोई हैरतअंगेज बात भी नहीं है.’
‘भाजपा हर मुद्दे को धर्म के चश्मे से देखना चाहती है’
हिंदुस्तान एक्सप्रेस के न्यूज़ एडिटर शाहिद-उल-इस्लाम इसे एजेंडे की राजनीति बताते हैं, ‘अगर भाजपा सरकार पत्रकारों को धर्म के आधार पर बांटना चाहती है, तो मुझे हैरानी नहीं है.’
13 अक्टूबर के मिलन समारोह के दौरान मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता हर टेबल पर पत्रकारों के साथ बातचीत करती नजर आईं. इस दौरान पत्रकारों ने मुख्यमंत्री के सामने अपनी चिंताएं भी रखीं और वरिष्ठ पत्रकारों ने दिल्ली में डीआईपी ‘मान्यता समिति’ के नवीनीकरण नहीं होने का मामला उठाया.
बहरहाल, उर्दू मीडिया के साथ दिल्ली सरकार के इस कथित भेदभाव के बाद सवाल ये है कि क्या सरकार इन प्रश्नों पर विराम लगाने की कोशिश करेगी?
