पिछली क़िस्त में आपने पढ़ा: कुछ दिनों की अनवरत वर्षा के पश्चात उत्तर बंगाल में स्थित अलीपुरद्वार सबडिवीज़न में, जहां मैं एसडीओ था, 20 जुलाई 1993 को दिन में कालजानी नदी पर बना बांध टूट गया और अलीपुरद्वार शहर में जल भरने लगा. परंतु बाढ़ आने पर केवल कोई स्थान मात्र जल प्लावित नहीं होता, उस जगह में, वहां वास कर रहे जीवों में, और साथ ही मानव समाज में भी इसके कुछ अनपेक्षित परिणाम होते हैं. आज आगे पढ़ें:
आशा की किरण भी प्रकाश के किसी स्रोत से निकलती है लेकिन गहरा स्लेटी आसमान तो केवल अंधकार की सूचना दे रहा था. शाम के क़रीब चार बजे सेना को इत्तला करने के पंद्रह मिनट बाद वायरलेस सेवा बंद हो गई. टेलीफोन परिसेवा कुछ देर पहले ही ठप्प हो चुकी थी. पंद्रह-बीस मिनट बाद उन दोनों गाड़ियों तथा दलों को, जो शहर के भिन्न वॉर्डों में बांध के टूटने की खबर और चिह्नित राहत केंद्रों की जानकारी देने के लिए गए थे, वापस लौटना पड़ा क्योंकि शहर के मुहल्लों में पानी भर चुका था और तेज़ी से बढ़ता जा रहा था.
उनके वापस आने के साथ ही बिजली भी चली गई. मेरा दफ़्तर लगभग ख़ाली हो चुका था. अधिकतर कर्मचारी और अधिकारी किराए के घरों में रहते थे और उन्हें अपने घर में पानी घुस आने का समाचार मिल रहा था. धीरे-धीरे नियंत्रण कक्ष भी ख़ाली हो चला, मेरे अलावा सिविल डिफेंस के दो अधिकारी, बिनय बनर्जी और निखिल चक्रवर्ती जो पास ही रहते थे, ही रह गए थे. उन दोनों ने दो मंज़िले एसडीओ बंगले के निचले तले पर बने दफ़्तर में और दो घंटे मेरा साथ दिया. फिर वे भी खाना खाकर चले गए.
रात भर मैं मनाता रहा कि वर्षा थम जाए और पूरी रात तेज बारिश ने मुझे जगाए रखा. कई बार मैं उठकर बाहर बालकनी पर भी गया परंतु टॉर्च की रोशनी में सिर्फ़ बरसते पानी के चमचमाते धार ही दिखे.
मेरे मन में कई प्रश्न उठ रहे थे— क्या मेरा अंतिम वायरलेस संदेश सेना तक पहुंच पाया था? कर्नल कपूर ने सेना की टुकड़ी को भेजा या नहीं? अगर भेजा है तो वो पहुंची क्यों नहीं? उस संदेश को मैंने ज़िला मजिस्ट्रेट को भी भेजा था. उन्हें मिला या नहीं? आशा को थामे रहने तथा आशंकाओं से जूझते मेरा मन रह रहकर यह भी समझने की कोशिश कर रहा था कि यह बाढ़ आई कैसे?
वर्षा सारी हदें पार कर गई थी, लेकिन बांध एक नहीं कई जगहों से टूटा था. कालजानी का जल बांध को लांघकर नहीं भेदकर, तोड़कर शहर में घुसा था. बांध क्यों और कैसे टूटा और पूरे शहर में पानी इतनी जल्दी क्यों भर गया? घटनाक्रम को समझने के लिए मैं शहर की स्थिति को चित्रित करने लगा.
कालजानी नदी के पूरबी छोर पर बसे अलीपुरद्वार शहर को उत्तर से दक्षिण जाती रेलवे लाइन और राज्य सड़क, शहर का मुख्य मार्ग, दो भाग में विभाजित करते हैं. सर्वाधिक जनसंख्या वाले वॉर्ड और मोहल्ले कालजानी नदी के किनारे, बांध की ओट में, तथा रेलवे लाइन के बीच स्थित थे. चुनाव के वक्त शहर का परिदर्शन करते हुए मैंने पाया था कि ज़्यादातर रिहायशी इलाक़े नीची जगहों पर अवस्थित हैं. लोगों ने मुझे बताया था कि स्वाभाविक क्रम में दोनों किनारों की ज़मीन का ढलाव नदी की ओर है.
इसके अलावा राज्य सड़क, रेल लाइन और नदी के छोर पर बना बांध— तीनों को बनाने के लिए उनकी अगल-बगल की ज़मीन से मिट्टी निकाली गई थी. सरकारी संस्थान और दफ़्तर राज्य मार्ग के पूरब में बने थे, आवासीय क्षेत्रों से हटकर. एसडीओ बंगला, दफ़्तर, कोषागार, न्यायिक अदालत तथा थाना शहर के सबसे ऊंचे स्थल पर आस-पास निर्मित थे.
मुझे अचानक ख़्याल आया कि मुख्य सड़क और रेल लाइन के उस पार के वॉर्डों में तो वर्षा का पानी तीन दिनों से यूं ही ठहरता जा रहा था. लबालब भरी कालजानी नदी में उसका निकास असंभव था. 20 जुलाई की दोपहर तक इतना पानी उन क्षेत्रों में भर चुका था कि घरों में प्रवेश करने लगा था. इसलिए जब कई स्थानों में बांध टूटने लगा और पानी तेज़ी से नगर में घुसा तो पहले से ठहरे हुए जल का स्तर द्रुतगति से बढ़ना अवश्यम्भावी हो गया. लेकिन एक प्रश्न फिर भी रह गया— बांध इतनी जगहों से टूटा क्यों?
पौ फटने लगी तो बारिश की गति कुछ कम हुई. तब जाकर मेरी आंख लग गई. लेकिन घंटे-डेढ़ घंटे बाद ही मेरी नींद खुल गई. भारी वर्षा हल्की बूंदा-बांदी में बदल गई थी. बालकनी पर निकलकर देखा बंगले के चारों ओर पानी ही पानी था. बंगले की सीढ़ियों के सामने बना चार फुट ऊंचा पौधों का गोलंबर लगभग समूचा ही डूब गया था, उसके बाड़े के खंभों और तारों से लिपटकर कई सांप खुद को बचाने की चेष्टा कर रहे थे. बगल में गोद में हमारे आठ महीने के पुत्र को लिए खड़ी मेरी पत्नी बोल पड़ीं, ‘देखो, परेड मैदान में…’
एसडीओ बंगले के दक्षिण में एक विशाल मैदान था. नज़र उठाकर मैंने देखा, मैदान में कई गायों-बैलों के शव तैर रहे हैं. तभी देखते-देखते एक और मवेशी का शव रास्ते की ओर से मैदान में बहता हुआ चला गया. समझा, बाढ़ का पानी अभी भी शहर में घुसा चला आ रहा था, कालजानी में जल का स्तर अब भी बढ़ा हुआ था.
सात बजने जा रहे थे, टेलिफोन मूक पड़ा था और मैं जानने के लिए बेचैन था कि विपन्न शहर और सबडिवीज़न की क्या स्थिति है, क्या किया जा सकता है. टेलीफोन और वायरलेस के बग़ैर हम जैसे अंधकार में पड़े थे. सबडिवीज़नल पुलिस अधिकारी (एसडीपीओ) छुट्टी पर थे. स्थानीय थाने का पुलिस बल छोटा था लेकिन एक सशस्त्र पुलिस की पलटन भी थाने में ही रुकी हुई थी. इसलिए मैंने पहले थाने जाने का निर्णय लिया.
दूसरी मंज़िल से उतरकर पानी में डूबे बरामदे पर पहुंच कर मैं सीढ़ियों से कमर भर पानी में उतरा, फिर आस-पास तैरते कीड़े–मकौड़ों और सांपों से बचता हुआ चल पड़ा. सड़क पर पहुंचा तो पानी घुटने तक ही था. शायद इसमें जीप चल सकेगी, मैंने सोचा. थाने पहुंचकर देखा तो पूरे परिसर में जल भरा हुआ था, थाना प्रभारी के कमरे में टखने के ऊपर तक जल था. मैंने आवाज़ दी तो थाना प्रभारी इंस्पेक्टर, अनिमेष मजूमदार, अपने क्वार्टर से निकलकर आए. उनके साथ दो कॉन्स्टेबल और आए. लेकिन थाने की दूसरी मंज़िल की छत पर खड़े सशस्त्र पुलिस के बीस-पच्चीस जवानों में से कोई नहीं उतरा. बूंदा-बांदी शायद बढ़ गई थी.
थाने की जीप में हम मुख्य सड़क की ओर बढ़े. रास्ते में सिविल डिफेंस के बनर्जी और चक्रवर्ती दफ़्तर की ओर आते दिखे और हमारे साथ हो लिए. कुछ लड़कों ने उन्हें जानकारी दी थी कि सेना का एक ट्रक कुछ ही दूर पर रेल-फाटक के पास खड़ा है.
दूर से ही रेल फाटक के पास भीड़ दिखी. पहुंचकर देखा कि सेना का ट्रक सड़क पर रेल लाइन के बीच बने एक गड्ढे में फंस गया था. राहत और बचाव के लिए आई सेना की उस टुकड़ी का नेतृत्व मेजर जीएस पुजारी कर रहे थे. उनसे मिलकर मुझे कुछ राहत मिली. लेकिन मेरे पहुंचने पर भीड़ से कुछ रोष भरी आवाजें उठने लगीं.
सहसा मेरे कानों में पहुंचा, ‘ऐइ एसडीयो आमादेर डूबिए दिएचे (इस एसडीओ ने हमें डुबा दिया).’ मैंने लोगों से बात करने की कोशिश की पर उनका ग़ुस्सा बढ़ता ही गया. उसी समय स्थानीय विपक्षी दल के दो नेता, बिशु सरकार और मंटू रक्षित, ने मेरे पास आकर मुझसे धीरे से कहा कि लोग प्रशासन से बहुत नाराज़ हैं और अपना क्रोध आप पर निकाल रहे हैं. आप कृपया अभी उनसे अधिक बातचीत न करें. सेना बल को शीघ्रतम बचाव कार्यों में लगाएं.
लोगों का क्षुब्ध होना अपेक्षित था. निश्चित रूप से वे अभूतपूर्व शारीरिक और मानसिक कष्ट झेल रहे थे, उनके माल-असबाब का अकल्पनीय नुक़सान हुआ था. लेकिन मेरे प्रति उनका यूं कुपित होना मुझे कुछ अस्वाभाविक लगा.
मेजर पुजारी का दल बचाव के कार्य में लग गया. रेल लाइन पार के मुहल्लों में कोई ऐसा घर न था जिसमें उसके निवासियों ने रात जागते हुए न बिताई हो. ढहे हुए घरों को छोड़कर हर मकान में निचले तले में सात-आठ फुट की ऊंचाई तक मटमैला पानी भरा हुआ था. इन घरों में रहने वाले परिवारों ने या तो ऊपरी मंज़िल में शरण ली थी या फिर सीढ़ियों या मुंडेर पर. इस तरह से अटके लोगों को सुरक्षित जगह पर पहुंचाना हमारा प्रथम कार्य था और सेना के जवानों तथा नाव की मदद से यह अब संभव था.
दोपहर तक बाढ़ का पानी बढ़ना बंद हो गया और फिर धीरे-धीरे जल घटने लगा. मैं जानता था कि पाने उतरते ही शहर के लोगों की मांग होगी तिरपाल, खाद्यान, शिशु खाद्य, दूध, किरोसीन और दवाइयां. समस्या तो यह थी कि बिना संचार के संसाधन के यह सब सामग्री अलीपुरद्वार शहर और सुदूर गांवों तथा क़स्बों में पहुंचेगी कैसे? टेलीफोन सेवा के पुनरारंभ के आसार नहीं दिख रहे थे और वायरलेस भी अभी तक काम नहीं कर रहा था. बिजली के वापस आने में तो पता नहीं कितना समय लगेगा. पीने के पानी की भी समस्या होने ही वाली थी. पता नहीं सड़कों का क्या हाल था.
मैं इन्हीं बातों की उधेड़-बुन में था कि नगरपालिका के अत्यंत ही जनप्रिय अध्यक्ष, दोलन नाग, मेरे कमरे में आए. कुर्सी में बैठते हुए उन्होंने कहा, ‘आपनाके की बोलबो, एसडीओ शाहेब, आमार-ई बाईरे बेरोते शाहस होच्चे ना (आपको क्या बताऊं, एसडीओ साहब, मुझे ही बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हो रही है)’…
(क्रमशः)
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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