राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पत्रकारों पर हमले को लेकर तीन राज्यों को नोटिस जारी किया

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 30 अगस्त को केरल और मणिपुर में और 21 सितंबर को त्रिपुरा में अलग-अलग जगहों पर तीन पत्रकारों पर हुए हमले के बारे में मीडिया में आई ख़बरों का स्वतः संज्ञान लिया है. आयोग ने तीनों राज्यों के पुलिस महानिदेशकों से दो सप्ताह के भीतर मामले पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है.

(इलस्ट्रेशन: पिक्साबे/द वायर)

नई दिल्ली: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने बुधवार (22 अक्टूबर) को पिछले तीन महीनों में राज्यों के विभिन्न स्थानों पर तीन पत्रकारों पर कथित हमले पर केरल, त्रिपुरा और मणिपुर सरकारों को नोटिस जारी किया.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग ने तीनों राज्यों के पुलिस महानिदेशकों से दो सप्ताह के भीतर मामले पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है.

बयान में कहा गया है कि आयोग ने 30 अगस्त को केरल और मणिपुर में और 21 सितंबर को त्रिपुरा में अलग-अलग जगहों पर तीन पत्रकारों पर हुए हमले के बारे में मीडिया में आई ख़बरों का स्वतः संज्ञान लिया है.

आयोग की एक विज्ञप्ति के अनुसार, मणिपुर में एक पत्रकार पर 30 अगस्त को सेनापति जिले के लाई गांव में एक पुष्प महोत्सव को कवर करते समय हमला किया गया था. उन्हें एयर गन से दो बार गोली मारी गई और वह गंभीर रूप से घायल हो गए.

उसी दिन एक अन्य पत्रकार पर लोगों के एक समूह ने हमला किया जब वह केरल के थौडुपुझा के पास मंगट्टुकवला पहुंचे. वह एक शादी समारोह से लौट रहे थे.

उसी दिन केरल के एक अन्य पत्रकार पर थोडुपुझा के पास मंगट्टुकवाला पहुंचते ही लोगों के एक समूह ने हमला कर दिया. वह एक शादी समारोह से लौट रहे थे.

त्रिपुरा में एक अन्य मामले में 21 सितंबर को बदमाशों के एक समूह द्वारा एक पत्रकार पर लाठियों और धारदार हथियारों से हमला किया गया था. वह पश्चिम त्रिपुरा के हेज़ामारा इलाके में एक राजनीतिक दल द्वारा आयोजित कपड़े वितरण कार्यक्रम में भाग ले रहे थे. उनकी मोटरसाइकिल भी चोरी हो गई.

तीनों घटनाओं में पीड़ितों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया और पुलिस द्वारा मामले दर्ज किए गए.

कई पत्रकारों पर जानलेवा हमले होने पर भी एनएचआरसी ने नहीं लिया था संज्ञान

उल्लेखनीय है कि बीते कुछ सालों में पत्रकारों को विभिन्न तरीकों से निशाना बनाया गया है, इससे पहले भी देश के विभिन्न हिस्सों में पत्रकारों पर कई जानलेवा हमले हुए हैं लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने उनका कोई संज्ञान नहीं लिया था.

गौरतलब है कि इस साल शुरुआत में छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के अंतर्गत बीजापुर जिले के स्थानीय पत्रकार मुकेश चंद्राकर की मौत ने पत्रकारिता जगत को झकझोर कर रख दिया था. चंद्राकर एक जनवरी को लापता हुए थे. तीन जनवरी को उनका शव एक सेप्टिक टैंक से बरामद किया गया था. दावा किया गया कि उनकी हत्या के पीछे एक स्थानीय ठेकेदार सुरेश चंद्राकर का हाथ है, जो मुकेश चंद्राकर द्वारा सड़क निर्माण में भ्रष्टाचार की एक खबर किए जाने को लेकर नाखुश था.

इसके बाद 8 मार्च को उत्तर प्रदेश में दैनिक जागरण के पत्रकार व आरटीआई कार्यकर्ता राघवेंद्र बाजपेयी की हत्या कर दी गई थी.

इसी साल 4 जुलाई को महाराष्ट्र में पुणे के पास एक कस्बे में नदी किनारे अवैध निर्माण गतिविधि की रिपोर्टिंग कर रहीं पत्रकार स्नेहा बर्वे पर दिनदहाड़े जघन्य हमला किया गया था. आरोपी भूमि मालिक ने उन्हें लाठी से तब तक पीटा, जब तक वह बेहोश नहीं हो गईं.

इसी तरह जुलाई में असम में एक स्थानीय परिषद चुनाव और कथित अवैध निर्माण और खनन कार्यों से जुड़ी घटनाओं पर रिपोर्टिंग के दौरान एक पत्रकार पर हमला किया था.

प्राग न्यूज़ के पत्रकार मधुरज्य सैकिया पर भी 4 जुलाई को भाजपा सदस्यों और अन्य स्थानीय राजनेताओं के बीच हुई झड़प का वीडियो बनाते समय हमला किया गया था. सैकिया असम के धेमाजी जिले के डिमो पाथर गांव में एक स्थानीय परिषद चुनाव की रिपोर्टिंग कर रहे थे, जब कम से कम 20 हमलावरों के एक समूह ने कथित तौर पर उन्हें पीछे से मारा और उनका फोन छीन लिया.

13 जुलाई को ओडिशा के मलकानगिरी जिले के मुरलीगुड़ा गांव के पास स्थानीय ऑनलाइन न्यूज पोर्टल ‘टाइम्स ओड़िया’ के पत्रकार नरेश कुमार की बेरहमी से हत्या कर दी गई.

इससे पहले 29 जून को असम में हुए एक अन्य हमले में स्थानीय टेलीविजन आउटलेट एनडी24 के दो पत्रकारों, बिमलज्योति नाथ और बिपुल फोयेल पर ढेकियाजुली में उस समय हमला किया गया जब वे कथित अवैध खनन गतिविधियों को कवर करने का प्रयास कर रहे थे.

हल ही में सितंबर में उत्तराखंड में सरकारी अस्पताल का हाल दिखाने वाले पत्रकार राजीव प्रताप की संदिग्ध मौत हुई थी. उनकी पत्नी ने आरोप लगाया था कि राजीव ने 16 सितंबर को अपने यूट्यूब चैनल ‘दिल्ली उत्तराखंड लाइव’ पर उत्तरकाशी जिला अस्पताल और एक स्कूल की रिपोर्ट अपलोड की थी, जिसके बाद उन्हें धमकियां मिलने लगीं थी.

सितंबर में ही नगालैंड में उपमुख्यमंत्री द्वारा धमकाए जाने के हफ़्ते भर बाद पत्रकार पर गोली चलाई गई थी. नगालैंड के उपमुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता वाई. पैटन ने हॉर्नबिल टीवी के रिपोर्टर दीप सैकिया को एक जनसभा में सरेआम डांटा और धमकाया था. उसके एक सप्ताह बाद मणिपुर के सेनापति ज़िले में उन पर गोली चलाई गई थी, जिसमें वे घायल हो गए.

ख़राब रहा है रिकॉर्ड

इंटरनेशनल फ़ेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (आईएफजे) की दक्षिण एशिया प्रेस स्वतंत्रता रिपोर्ट 2024-25 में मई 2024 से अप्रैल 2025 की अवधि में भारत में पत्रकारों पर कुल 13 लक्षित हमले और पांच पत्रकारों की हत्या दर्ज की गई.

पिछले साल रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि 2014 से भारत में मारे गए 28 पत्रकारों में से कम से कम 13 पर्यावरण संबंधी विषयों मुख्यतः ज़मीन पर कब्ज़ा, औद्योगिक उद्देश्यों के लिए अवैध खनन और भ्रष्टाचार पर काम कर रहे थे,

प्रेस एंड प्लैनेट इन डेंजर, 2024′ रिपोर्ट में यूनेस्को ने अपने विश्लेषण में ऐसे उदाहरण उजागर किए, जिनमें 2009-2023 की अवधि में पर्यावरणीय मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने वाले कम से कम 749 पत्रकारों और समाचार मीडिया संस्थानों को हत्या, शारीरिक हिंसा, हिरासत और गिरफ्तारी, ऑनलाइन उत्पीड़न या कानूनी हमलों का निशाना बनाया गया. 2019-2023 के बीच 300 से ज़्यादा हमले हुए – जो पिछले पांच वर्षों (2014-2018) की तुलना में 42% अधिक है.

पिछले 15 वर्षों में कम से कम 44 पत्रकारों ने पर्यावरणीय मुद्दों की जांच की है, जिनमें से केवल 5 मामलों में ही दोषसिद्धि हुई है. यानी लगभग 90% मामलों में कुछ नहीं हुआ.

उल्लेखनीय है कि पिछले 16 वर्षों में भारत की रैंकिंग ग्लोबल प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में लगातार गिरती रही है. यह इंडेक्स रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स नामक मीडिया निगरानी संस्था द्वारा जारी किया जाता है. 2009 में भारत इस सूची में 105वें स्थान पर था, जबकि 2025 में यह गिरकर 151वें स्थान पर आ गया है.

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की 2025 की रिपोर्ट में भारत की स्थिति पर कई गई टिप्पणी में लिखा है, ‘2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत की मीडिया एक ‘अनौपचारिक आपातकाल’ की स्थिति में आ गई है.’