पराली जलाने में 77% कमी के बावजूद दिल्ली की हवा दीपावली के बाद पांच साल में सबसे ज़्यादा प्रदूषित

पंजाब-हरियाणा में पराली जलाने में 77 फीसदी गिरावट के बावजूद दिल्ली की हवा दीपावली के बाद पांच साल में सबसे ज़्यादा प्रदूषित रही. रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस बार रिकॉर्ड स्तर का प्रदूषण स्थानीय कारणों, ख़ासकर पटाखों और धीमी हवाओं, की वजह से हुआ, न कि बाहर से आए धुएं से.

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इस साल 1 से 12 अक्टूबर के बीच पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की सिर्फ 175 घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या 779 थी. यह 77.5 फीसदी की गिरावट है. (प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: दिल्ली की हवा ने इस दीपावली पर एक नया और चिंताजनक रिकॉर्ड बनाया. दीपावली की अगली सुबह (21 अक्टूबर) राजधानी का एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) पिछले पांच वर्षों के सबसे खराब स्तर पर पहुंच गया.

क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिपोर्ट के अनुसार, दीपावली के बाद पीएम2.5 का औसत स्तर 488 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया, जो त्योहार से पहले के स्तर की तुलना में 212 फीसदी की वृद्धि है. यह आंकड़ा विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित सीमा से करीब 100 गुना अधिक है.

लेकिन इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि यह रिकॉर्डतोड़ प्रदूषण उस साल हुआ जब पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में 77 फीसदी की गिरावट आई थी.

यह तथ्य एक बार फिर उस बहस को पलटता है जो हर साल दिल्ली के प्रदूषण को लेकर होती है कि क्या किसान असली दोषी हैं, या फिर शहर के भीतर ही समस्या की जड़ें हैं?

बाढ़ ने दिखाया आईना

इस साल अक्टूबर में पंजाब और हरियाणा में आई अभूतपूर्व बाढ़ ने एक ऐसा दुर्लभ मौका खड़ा कर दिया जिसकी कल्पना नीति निर्माता शायद कभी नहीं कर सकते थे.

डाउन टू अर्थ के मुताबिक, सैटेलाइट फायर डाटा, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के रीडिंग और क्लाइमेट ट्रेंड्स के तुलनात्मक विश्लेषण के अनुसार, इस साल 1 से 12 अक्टूबर के बीच पंजाब और हरियाणा में सिर्फ 175 पराली जलाने की घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या 779 थी. यह 77.5 फीसदी की भारी गिरावट है.

केवल पंजाब की बात करें, तो 2024 में कुल 392 मामले सामने आए थे, जो 2025 में घटकर 105 रह गए यानी 73.2 फीसदी की गिरावट. हरियाणा में यह गिरावट और भी अधिक है, जहां 387 मामलों से घटकर केवल 70 मामले रह गए यानी 81.9 फीसदी की कमी.

यह भारी गिरावट मुख्य रूप से बाढ़ के कारण हुई. खेतों में जलभराव हो गया, जिससे धान की कटाई में देरी हुई. इसके परिणामस्वरूप, दिल्ली का औसत पीएम2.5 स्तर अक्टूबर के पहले पखवाड़े में 2024 की तुलना में 15.5 फीसदी कम रहा. यह 60.79 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से घटकर 51.48 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पहुंच गया.​

क्लाइमेट ट्रेंड्स की संस्थापक और निदेशक आरती खोसला ने कहती हैं, ‘2025 की बाढ़ ने अनजाने में वह हासिल कर दिया जो प्रवर्तन नहीं कर सका: आग में 77 फीसदी की गिरावट. फिर भी, दिल्ली का दम घुटता रहा. यही असली चेतावनी है.​

दीपावली की रात दिल्ली के 77% प्रदूषण मॉनिटरों ने काम करना बंद कर दिया था. 39 में से 30 वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों ने डेटा नहीं मिल रहा था. कई स्टेशनों ने रात भर डेटा नहीं दिया. (फोटो: पीटीआई)

दीपावली की रात: जब प्रदूषण ने तोड़े सारे रिकॉर्ड

अक्टूबर के पहले दो हफ्तों में राहत अल्पकालिक साबित हुई. जैसे ही दीपावली आई, प्रदूषण का स्तर आसमान छू गया. सीपीसीबी के नेटवर्क ने दीपावली के बाद औसत पीएम2.5 स्तर 488 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया, पिछले पांच वर्षों में सबसे अधिक. देर रात यह स्तर 675 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक हो गया, जिसे ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रैप) के तहत ‘अत्यंत गंभीर आपात स्थिति’ की श्रेणी में रखा गया.​

क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिसर्च लीड पलक बालयान कहती हैं, ‘इस साल की दीपावली पहले से भी बदतर साबित हुई. डेटा स्पष्ट रूप से प्रदूषण के स्तर में तेज वृद्धि दिखाता है, दीपावली के बाद पीएम रीडिंग औसतन 488 के आसपास थी, जबकि त्योहार से पहले यह केवल 156.6 थी. यह तीन गुना से अधिक की वृद्धि है, जो 2025 को हाल के वर्षों में सबसे प्रदूषित दीपावली में से एक बनाती है. 19 और 20 तारीख की रातों के बीच यह उछाल सीधे तौर पर दिल्ली-एनसीआर में पटाखों के व्यापक उपयोग से मेल खाता है.’

इस साल का एक्यूआई पिछले साल (328) से अधिक था और पिछले दो वर्षों की तुलना में भी बहुत अधिक- 2023 में यह 218 और 2022 में 312 था. यह बताता है कि ‘ग्रीन’ पटाखे भी जहरीली धुंध को नियंत्रित करने में विफल रहे.

ये आंकड़े तब समाने आए, जब दीपावली की रात दिल्ली के 77% प्रदूषण मॉनिटरों ने काम करना बंद कर दिया था. 39 में से 30 वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों ने डेटा नहीं मिल रहा था. कई स्टेशनों ने रात भर डेटा नहीं दिया. जहां के डेटा उपलब्ध हैं, उनसे पता चलता है कि उस रात पीएम 2.5 का स्तर 1,700 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया था.

पराली का योगदान: महज 1-2 फीसदी

दिल्ली की प्रदूषण पर होने वाली राजनीतिक बहसों में पंजाब और हरियाणा के किसानों को दोषी ठहराया जाता रहा है. लेकिन डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (डीएसएस) का डेटा कुछ और ही कहानी बयान करता है.

इस सीजन के अधिकांश दिनों में दिल्ली के पीएम2.5 स्तर में पराली जलाने का योगदान 1 फीसदी से भी कम रहा. सबसे अधिक योगदान 17 अक्टूबर को 2.6 फीसदी था.

डीएसएस के डेटा से पता चला कि इस सप्ताह पराली के धुएं ने बुधवार को दिल्ली के पीएम2.5 सांद्रता में केवल 1.62 फीसदी, मंगलवार (21 अक्टूबर) को 1 फीसदी और सोमवार (20 अक्टूबर) को 0.83 फीसदी का योगदान दिया. पिछले साल 22 अक्टूबर 2024 तक, पराली के धुएं का 8 फीसदी तक पहुंच गया था और महीने के अंत तक 27 फीसदी तक चढ़ गया था.

मौसम की भूमिका

मौसम संबंधी परिस्थितियों ने दीपावली के बाद के संकट को और बदतर बना दिया.

दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. एसके ढाका ने बताते, ‘दीपावली की रात हवा की गति 1 मीटर प्रति सेकंड से कम थी, जिसमें आर्द्रता (नमी) का स्तर 60 से 90 फीसदी के बीच था. इन स्थिर स्थितियों ने प्रदूषकों को सतह के करीब फंसा दिया, फैलाव को रोक दिया. वृद्धि विशुद्ध रूप से स्थानीय थी, बाहर से नहीं लाई गई.’

‘ग्रीन’ पटाखों की असफलता

सुप्रीम कोर्ट ने दो घंटे के लिए ‘ग्रीन’ पटाखों को चलाने की अनुमति दी थी, लेकिन दिल्ली-एनसीआर के निवासियों ने आदेश का उल्लंघन किया और निर्धारित समय के पहले और बाद में भी पटाखे फोड़ते रहे.

बालयान कहती हैं कि दृश्य और जमीनी डेटा पुष्टि करते हैं कि तथाकथित ‘ग्रीन’ पटाखों को जलाने से नियमित पटाखों की तुलना में कोई खास अंतर नहीं आया.

डॉ. ढाका ने कहा ‘हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि ग्रीन पटाखों ने बहुत तेजी से हवा में कणीय प्रदूषण (पार्टिकुलेट मैटर) बढ़ाया, और यह प्रदूषण स्थानीय स्तर पर हुआ है, कहीं और से नहीं आया. इसका मतलब है कि हमें ग्रीन पटाखों की गुणवत्ता की जांच करने की ज़रूरत है.’

बालयान ने कहा, ‘दिल्ली-एनसीआर में हवा की गुणवत्ता पहले से खराब है, ऐसे में अब यह स्पष्ट है कि साल के इस समय पटाखों की अनुमति देना बिलकुल भी ठीक नहीं है.’

सुप्रीम कोर्ट ने दो घंटे के लिए ‘ग्रीन’ पटाखों को चलाने की अनुमति दी थी, लेकिन दिल्ली-एनसीआर के निवासियों ने आदेश का उल्लंघन किया. (फोटो: पीटीआई)

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

इस पूरे मामले के बीच राजनीतिक दलों के बीच दोषारोपण का खेल भी चल रहा है. दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने आम आदमी पार्टी (आप) पर पंजाबी किसानों को दीपावली से पहले फसल और पराली जलाने के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया.

मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, सिरसा ने तरनतारन और बठिंडा जैसे क्षेत्रों में किसानों द्वारा कथित रूप से पराली जलाने के वीडियो दिखाए. उन्होंने कहा, ‘आम आदमी पार्टी, जिसने पिछले 10 वर्षों से दिल्ली में एक अक्षम सरकार चलाई है, पिछले चार दिनों में संदिग्ध गतिविधियों में शामिल रही है… ये दृश्य तरनतारन और बठिंडा के हैं, ध्यान दें कि लोगों के चेहरे ढके हुए हैं. किसानों को अपनी पहचान छुपाते हुए पराली जलाने के लिए मजबूर किया जा रहा है.’

मंत्री ने 2020 के डेटा का हवाला देते हुए दावा किया कि दिल्ली की खराब हवा के लिए पटाखे जिम्मेदार नहीं हैं.

दूसरी ओर, आप दिल्ली के अध्यक्ष और पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज ने मंगलवार को सरकार पर जोरदार हमला करते हुए उस पर दीपावली के बाद प्रदूषण को नियंत्रित करने में विफल रहने का आरोप लगाया. साथ ही सवाल किया कि वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए ‘कृत्रिम बारिश’ का वादा किया गया था, वो क्यों नहीं किया गया?’

तो सबक क्या है?

उपरोक्त डेटा से स्पष्ट है कि पराली जलाना निश्चित रूप से एक समस्या है, लेकिन यह दिल्ली के प्रदूषण का एकमात्र या सबसे बड़ा कारण नहीं है. जब पराली जलाने में 77 फीसदी की गिरावट के बावजूद दिल्ली का पीएम2.5 स्तर गंभीर स्तर तक बढ़ गया, तो यह साफ हो जाता है कि शहर के भीतर मौजूद प्रदूषण के स्रोत व्यापक भूमिका निभा रहे हैं.

इस बार बाढ़ ने एक दुर्लभ मौका दिया, जिससे पता चला कि पराली कम जलाने से हवा स्वच्छ हो सकती है. लेकिन दीपावली से वायु प्रदूषण में हुई वृद्धि साबित करती है कि स्थानीय उत्सर्जन, विशेष रूप से आतिशबाजी, उन लाभों को तुरंत खत्म कर सकती है.