एमपी: ओबीसी व्यक्ति से ब्राह्मण आरोपी के पैर धुलवाने वाले केस से अलग हुए हाईकोर्ट के दो जज

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ओबीसी समुदाय के एक शख़्स को 'एआई तस्वीर' पोस्ट करने के लिए कथित तौर पर ब्राह्मण जाति के एक व्यक्ति के पैर धुलवाने और पानी पीने के लिए मजबूर किए जाने की घटना का स्वतः संज्ञान लिया था. मंगलवार को दो न्यायाधीशों- जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई से ख़ुद को अलग कर लिया.

ज़मीन विवाद से जुड़े एक मामले में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को जनता के प्रति उसकी जिम्मेदारी याद दिलाई. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के दो न्यायाधीशों ने मंगलवार (28 अक्टूबर) को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदाय के एक युवक को कथित तौर पर एक ब्राह्मण व्यक्ति के पैर धुलवाने और पानी पीने के लिए मजबूर करने के मामले से संबंधित स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया.

ज्ञात हो कि इस महीने के शुरूआत में मध्य प्रदेश के दमोह जिले में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के एक युवक को कथित तौर पर सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया था. आरोप था कि एक ब्राह्मण व्यक्ति की ‘आपत्तिजनक एआई-एडिटेड तस्वीर’ शेयर करने पर उसे उसके पैर धुलवाकर पानी पीने के लिए मजबूर किया. पुलिस ने इस मामले में चार लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया था.

पीड़ित की पहचान पुरुषोत्तम कुशवाहा के रूप में हुई थी. उन्हें अनुज पांडे के पैर धोने के लिए मजबूर किया गया ताकि वह जूते की माला पहने हुए अपनी एआई-एडिटेड तस्वीर शेयर करने के लिए माफ़ी मांगे.

कुशवाहा का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था जिसमें वह स्थानीय लोगों से घिरे हुए और एक व्यक्ति के पैर धोते हुए दिख रहे थे. वीडियो में कुशवाहा को यह कहते हुए सुना जा सकता है, ‘मैं ब्राह्मण समुदाय से माफ़ी मांगता हूं. ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी. हम ब्राह्मणों की इसी तरह पूजा करते रहेंगे.’

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस एके सिंह की पीठ ने मंगलवार को मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया और आदेश दिया कि मामले को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष रखा जाए.

इस कदम के पीछे न्यायाधीशों ने कहा कि जिन मामलों की सुनवाई शुरू में जस्टिस अतुल श्रीधरन की पीठ कर रही थी, अब वे मुख्य न्यायाधीश की पीठ द्वारा निपटाए जा रहे हैं.

इस महीने की शुरुआत में जस्टिस श्रीधरन का मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट में तबादला कर दिया गया था. केंद्र सरकार द्वारा पुनर्विचार के अनुरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने श्रीधरन का छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के बजाय इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरण करने की सिफारिश की थी.

इससे पहले जस्टिस श्रीधरन की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने मीडिया में आई ख़बरों के आधार पर पांव धुलवाए जाने की घटना का स्वतः संज्ञान लिया था और मामले की सुनवाई की थी. पीठ ने दमोह पुलिस और प्रशासन को आरोपियों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) लगाने का निर्देश दिया था.

इसके बाद पांच लोगों पर एनएसए के तहत मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.

सुप्रीम कोर्ट ऑब्ज़र्वर के अनुसार, जस्टिस श्रीधरन को शिफ्ट करने के सरकार के अनुरोध को सार्वजनिक रूप से दर्ज करने का सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम का निर्णय अभूतपूर्व है. हालांकि, कॉलेजियम के प्रस्ताव में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं था कि पुनर्विचार का अनुरोध क्यों किया गया.

उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर में अपने कार्यकाल के दौरान जस्टिस श्रीधरन की पीठ ने जन सुरक्षा अधिनियम के तहत कई निवारक निरोध आदेशों को रद्द कर दिया था.