पिछली किस्त में आपने पढ़ा: 20 जुलाई 1993 को अलीपुरद्वार में कालजानी पर बने बांध के टूट जाने पर जिस रेत-मिट्टी भरे जल ने पूरे शहर को प्लावित कर दिया था, वह अगली सुबह कई मुहल्लों से निकल कर शहर से बाहर बह चुका था.
इस सर्वग्राही बाढ़ ने समूची सरकारी व्यवस्था को स्तब्ध कर दिया था. विभिन्न दफ़्तरों के अधिकतर अधिकारी तथा कर्मचारी अपने-अपने घर परिवार को बचाने में जुटे हुए थे. पुलिस कर्मियों की भारी कमी लग रही थी. मेरे अंतिम वायरलेस संदेश के जवाब में 21 जुलाई की सुबह, बहुत मुश्किल से सेना की एक टुकड़ी एक मोटर नौका के साथ अलीपुरद्वार पहुंच सकी थी और राहत तथा बचाव कार्य में जुट गई थी. आगे पढ़ें:
दोपहर बाद नगरपालिका अध्यक्ष, दोलोन बाबू, मेरे पास आए— मुख मलिन, देह पर मिट्टी से सनी भीगी बुशर्ट, घुटनों के ऊपर तक मुड़ी पतलून— कुर्सी के सामने आकर वे बैठने से झिझक रहे थे. मेरे कहने पर बैठते हुए उन्होंने कहा, ‘आपनाके की बोलबो, एसडीओ शाहेब, आमार-ई बाईरे बेरोते साहश होच्चे ना (आपको क्या बताऊं, एसडीओ साहब, मुझे ही बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हो रही है).’
अन्य घरों की तरह दोलोन बाबू का मकान भी आठ फुट जल में डूब गया था. सारी रात अपनी छत पर सपरिवार खड़े रहने के बाद जब पानी के उतरने पर वह भी नीचे उतरे और पास के मुहल्लों के लोगों का हालचाल पूछने निकले तो उन्हें भीषण रोष का सामना करना पड़ा. जनता प्रशासन तथा नगरपालिका को अपनी दुर्दशा के लिए कोस रही थी, हालांकि उनका गुस्सा मूलतः सिंचाई विभाग पर केंद्रित था.
बांध के संलग्न बसे कई मुहल्लों में लोगों ने देखा था कि पिछले दिन भारी वर्षा के दौरान सर्वप्रथम कालजानी का जल बांध में चूहों द्वारा बनाए हुए सैकड़ों बिलों के रास्ते शहर में घुस आया था. शुरुआत हुई जगह-जगह पर धीमे रिसाव से, जो धारों में परिवर्तित होता गया और फिर उन्हीं जगहों पर बांध में विशाल दरारें पड़ गईं जिनसे आते जलप्रवाह ने शीघ्र ही भयावह रूप धारण कर लिया. यही कारण था कि बाढ़ का जल इतनी तेज़ी से पूरे नगर में भर गया था.
लोगों का क्रोध युक्तिसंगत था— हर साल बांधों के रख-रखाव पर व्यय किए गए करोड़ों रुपये कहां गए? लेकिन सिंचाई विभाग के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, जो इस प्रश्न का उत्तर दे सकते थे, बांध टूटने से ठीक पहले हृदय की धड़कन बढ़ जाने की वजह से पास के कूच बिहार शहर के एक निजी अस्पताल में जा भर्ती हुए थे.
दोलोन बाबू ने मुझे बताया कि शहरवासियों का मुझ पर क्रोधित होने का एक और कारण भी उनके सुनने में आया था. कुछ लोग कह रहे थे कि भारी बारिश के बाद 20 जुलाई की सुबह भूटान के चुखा डैम से अतिरिक्त जल छोड़ा गया जिसकी वजह से ही कालजानी में बाढ़ आई. उनका कहना था कि चुखा डैम से जल छोड़ने की आगम सूचना वहां के अधिकारियों ने मुझे 19 जुलाई को ही दी थी लेकिन मैंने इसे शहरवासियों के साथ साझा नहीं किया था.
यह सुनकर मैं चकराया. पहली बात तो यह कि मेरे पास भूटान सरकार या अपने शासन से ऐसा कोई संवाद नहीं मिला था. दूसरी बात, मैं जानता था कि चुखा डैम भूटान में कालजानी पर नहीं, रैडक नदी पर बनाया गया है. उस डैम का कालजानी से कोई संबंध नहीं था. मैंने दोलोन बाबू को जब यह बताया तो उन्होंने कहा, ‘एखोन चार दिके गुजोब छाडाच्चे’ (अभी चारों ओर अफ़वाहें फैल रही हैं).
दोलोन बाबू और मैं कुछ देर तक स्थिति के बारे में बातें करते रहे. उन्होंने बताया कि 20 जुलाई को कालजानी का जल देर रात तक शहर में आता ही रहा, और इस हद तक आया कि अलीपुरद्वार लगभग जलमग्न हो गया. पूरे शहर में शायद ही कोई ऐसा मकान था जिसके अंदर आठ-दस फुट की ऊंचाई तक, यानी पहले तल्ले तक, पानी नहीं भर गया था. अब जब वह जल सिमटकर वापस निकल रहा था तो अपने पीछे विदाई उपहार स्वरूप कीचड़ की दो फुट मोटी परत छोड़ता जा रहा था.
बांध को भेद कर आया पानी इस फुर्ती के साथ घुसा था कि लोगों को अपने माल-असबाब को संभालने-बचाने का समय ही नहीं मिला. यह मलिन, डाही जल बिछौनों को खाटों पर, कपड़ों के संदूकों तथा आलमारियों में, किताब-काग़ज़ात को ताखों पर, गल्ले को बोरों और डिब्बों में— यानी घर की हर मूल्यवान और मूल्यहीन वस्तु को अपने मटमैले आग़ोश में भरता चला गया. यही जल अब गलियों में गाय-बैलों की लाशों की सौगात छोड़कर जा रहा था.
हमारा अंदाज़ा था कि ज़्यादातर लोगों के घरों में खाने को बहुत कुछ नहीं बचा होगा. पीने का पानी भी दुर्लभ होता जा रहा था क्योंकि कुओं तथा हैंड पंप जैसे आम पेय जलस्रोतों के भी दूषित हो जाने की पूरी संभावना थी. इन सब प्रतिकूल परिस्थितियों के घेरे में संक्रामक रोगों का आक्रमण भी स्वाभाविक था. लेकिन बहुत सारी आवश्यक सार्वजनिक सेवाएं एवं संस्थान भी तहस-नहस हो गई थीं. अस्पताल हो या स्कूल सब जगह बाढ़ का कीच घुसा बैठा था. बिजली लापता, टेलीफोन परिसेवा और वायरलेस गूंगे तथा पथ और परिवहन दोनों ही अचल हो गए थे.
आज सबडिवीज़न के बारे में कहीं से कोई खबर नहीं थी. मेरे पास पूरे एसडीओ दफ़्तर से बस दो व्यक्तियों, सिविल डिफेंस के बनर्जी और चक्रवर्ती का ही साथ था. वह ही शहर का कुछ समाचार ला पा रहे थे. सुबह हाशिमारा से आए मेजर पुजारी ने बताया था कि राष्ट्रीय सड़क कई स्थानों पर बुरी तरह क्षतिग्रस्त थी. कुछ पुल भी बह गए थे. रास्ते में उन्हें कई मृत मवेशी भी दिखे थे. न जाने चारों तरफ़ बाढ़ की तबाही से लोग कैसे जूझ रहे होंगे.
बिना किसी जानकारी के, बिना संचार के साधनों के, बिना सरकारी कर्मियों के बाढ़ के उतरते जल के जाने के बाद अलीपुरद्वार शहर और सबडिवीज़न में उठती राहत सामग्री की अनगिनत मांगों को कैसे पूर्ण किया जाएगा? चारों ओर बिछे मृत मवेशियों के शवों को हटाने की व्यवस्था कैसे की जाएगी? सबसे पहले हमें कार्मिक संसाधन, विशेषतः पुलिस बल, की आवश्यकता थी.
शाम के पौने आठ बजे थाने का वायरलेस फिर से काम करने लगा. आठ बजे ज़िला मुख्यालय से प्रश्नों की एक बौछार आई— सेना पहुंची है या नहीं? स्पीड बोट पहुंची है या नहीं? कूच बिहार से हेलिकॉप्टर द्वारा खाद्य पैकेट गिराए गए हैं या नहीं? रेल यात्रियों के खाने की व्यवस्था की गई है कि नहीं? कितने लोगों का उद्धार किया गया है और उन्हें कहां रखा गया है? कितने लोग कहां-कहां जलबंदी हैं? अंत में यह सूचना भी थी कि कल हेलिकॉप्टर से अलीपुरद्वार में खाद्य सामग्री पहुंचाई जाएगी. कर्मियों को सामान उतारने के लिए तैयार रखा जाए.
मेरी समझ में आ गया कि ज़िले में भी अलीपुरद्वार में बाढ़ से उत्पन्न स्थिति की जानकारी न्यूनतम है. मैंने वायरलेस से उसी समय उत्तर दिया— स्थानीय परिस्थिति की भीषणता के बारे में यथासंभव विस्तार से लिखा तथा यह भी लिखा कि कार्मिक और पुलिस बल की आवश्यकता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए.
21 जुलाई 1993 की रात मेरे लिए बहुत धीरे-धीरे बीती.
(क्रमशः)
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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