सीवी रमन, जिन्होंने सिखाया कि ‘क्यों और कैसे’ को न भूलें, क्योंकि यही वैज्ञानिकता के आधार हैं

सीवी रमन की यादों को ताज़ा करने या उनके प्रति श्रद्धा निवेदित करने की दिशा में इससे बेहतर कोई और क़दम नहीं हो सकता कि देश को उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण की दिशा में ले जाने के बहुविध जतन किए जाएं, जिसकी अपेक्षा हमारे संविधान में की गई है.

सीवी रमन. (फोटो साभार: britannica.com)

अभी कुछ देर पहले जब मैं आपको यावत्जीवन विज्ञान व अनुसंधान को समर्पित रहे दुनिया के जाने-माने भौतिक विज्ञानियों में से एक स्मृतिशेष चंद्रशेखर वेंकटरमन (सीवी रमन) के बारे में कुछ बातें बताने के लिए थोड़ी खोजबीन कर रहा था, मेरे पड़ोसी आ धमके और आते ही पूछने लगे कि क्या कर रहे हो? काम की निरंतरता में पड़े विघ्न से पैदा हुई झुंझलाहट छिपाते हुए मैंने उन्हें बताया कि सीवी रमन की बाबत कुछ जानकारियां इकट्ठी कर रहा हूं. इस पर एक भी पल गंवाए बिना उनका सवाल था कि ये बीवी रमन कौन हैं?

मेरे निकट यह हद थी. जो पड़ोसी अपनी डॉक्टरेट को लेकर व्यर्थ के गर्व से इतने भरे रहते हैं कि महज इतनी-सी बात से खासे उद्विग्न हो जाते हैं कि किसी ने उनका नाम लिखते हुए उससे पहले आदर सूचक ‘डॉक्टर’ शब्द नहीं लिखा, उन्हें यह पूछते हुए तनिक भी लज्जा नहीं आ रही थी कि सीवी रमन कौन हैं? ‘लानत है!’ कहते कहते रुक गया मैं. सोचकर कि यह उनकी अकेले की जड़ता थोड़े ही है.

इक्कीसवीं सदी का एक चौथाई हिस्सा बीत जाने के बाद भी वैज्ञानिक चेतना से सर्वथा विपन्न हिंदी समाज अपनी पोंगापंथियों व कूपमंडूकताओं के जश्न में वक्त जाया न कर रहा होता तो उनके जैसा ‘डॉक्टर’ तो क्या, कोई कंपाउंडर भी सीवी रमन को लेकर ऐसा सवाल नहीं पूछता. क्योंकि तब सीवी रमन की अद्भुत वैज्ञानिक प्रतिभा किसी के लिए भी अपरिचित नहीं होती.

तब इस समाज के लोग कम से कम इतना तो याद ही रखते कि 1930 में प्रकाश के प्रकीर्णन से जुड़े और उनके नाम पर ‘रमन इफेक्ट’ कहलाने वाले मील के पत्थर सरीखे अनुसंधानों के लिए उन्हें भौतिक विज्ञान का उस साल का नोबेल पुरस्कार दिया गया तो न सिर्फ गुलामी का दंश झेल रहा भारत बल्कि समूचा एशिया महाद्वीप गर्व से भर उठा था. हां, काले कहकर अपमानित किए जाने वाले दुनिया के सारे अश्वेत भी. उनका गर्व से भर जाना स्वाभाविक था क्योंकि रमन यह पुरस्कार पाने वाले पहले एशियाई व अश्वेत भारतीय वैज्ञानिक थे.

जानकारों के अनुसार, यह पुरस्कार उनकी प्रतिभा के साथ संघर्ष का भी परिचायक था क्योंकि किसी झटके में उनकी झोली में नहीं आ गिरा था- कड़ी प्रतिस्पर्धा में लगातार तीसरे नामांकन के बाद हासिल हुआ था. इससे दो साल पहले 1928 में उन्हें इसके लिए नामित किया गया तो उस साल का नोबेल ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी ओवेन रिचर्डसन ले उड़े थे और उसके अगले साल 1929 में उन्हें फिर नामित किया गया तो फ्रांस के भौतिक विज्ञानी लुई डी ब्रोगली बाजी मार ले गए थे.

अलबत्ता, 1929 का यह वर्ष उनके लिए इस मायने में बहुत सौभाग्यशाली रहा था कि इसी साल उन्होंने भारतीय विज्ञान कांग्रेस की अध्यक्षता की और इसी साल उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य की प्रतिष्ठित ‘नाइटहुड’ की उपाधि मिली थी. इससे पहले 1924 में उनको लन्दन की ‘रॉयल सोसाइटी’ का सदस्य भी बनाया जा चुका था.

1930 के नोबेल पुरस्कार समारोह में अन्य विजेताओं के साथ सीवी रमन (एकदम बाएं). (फोटो साभार: Wikimedia Commons)

गौरतलब है कि उनकी ये उपलब्धियां तब थीं, जब उन्होंने भौतिक विज्ञानी के रूप में नहीं, कोलकाता (तब कलकत्ता) में भारतीय वित्त सेवा में सहायक महालेखाकार के रूप में अपना करिअर शुरू किया था- महज अठारह साल की उम्र में. अलबत्ता, भौतिकी के प्रति झुकाव के चलते 1917 में उन्होंने यह पद त्याग दिया. फिर प्रोफेसर के रूप में कलकत्ता विश्वविद्यालय से जुड़ गए और ‘इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस’ की प्रयोगशाला में शोधकार्य में रत हो गए.

इसके बाद 1933 में वे बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान के पहले भारतीय निदेशक बने, जहां 1937 तक निदेशक और 1948 तक भौतिकी विभाग के प्रमुख रहे. 1948 में उन्होंने बेंगलुरु में ही स्वायत्त संस्थान के रूप में रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट की स्थापना की, जिसे 1972 में पुनर्गठित किया गया और जो अब प्लेटिनम जयंती मना चुका है.

उनके बारे में एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि उनकी अभिरुचि विज्ञान तक ही सीमित नहीं थी और संगीत के क्षेत्र तक भी फैली थी. इसके चलते उन्होंने मृदंगम व तबला वादन का भी अध्ययन किया और लंबे समय तक कक्षाओं में छात्रों को पढ़ाने, प्रयोगशालाओं में प्रयोग करने और वीणावादन में लीन हो जाने को अपनी दिनचर्या में शामिल कर रखा था.

उनकी एक बड़ी विशेषता यह भी थी कि उनके व्यक्तित्व में विचारों के स्तर पर कहीं भी कतई कोई असमंजस नहीं था. अपने छात्रों से वे जो एक बात सबसे ज्यादा जोर देकर कहते थे, वह यह थी कि वे ‘क्यों और कैसे’ को कतई न भूलें, क्योंकि यही वैज्ञानिकता के आधार स्तंभ हैं. इसके अलावा वे अपने छात्रों को हमेशा तर्कसंगत रहने और सही सवाल पूछने को कहा करते और बताते थे कि फिर तुम देखोगे कि प्रकृति कैसे तुम्हारे लिए अपने सभी रहस्यों के द्वार खोल देती है.

इनमें ‘क्यों’ और ‘कैसे’ को न भूलने वाली सीख को वे अपनी सबसे बड़ी सीख बताया करते थे. यहां कहना जरूरी है कि पिछड़े हुए, अवैज्ञानिक, दकियानूसी और पोंगापंथी समाजों में इस सीख की राह में ही सबसे ज्यादा अवरोध खड़े किए जाते हैं क्योंकि उन्हें सबसे ज्यादा डर इन्हीं से लगता है.

बहरहाल, 1928 में 28 फरवरी की जिस तारीख को उन्होंने रमन इफेक्ट का अनुसंधान किया था, देश में 1987 से उस तारीख को हर वर्ष ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा. विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार परिषद ने 1986 में देश की सरकार को हर 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाने का प्रस्ताव भेजा, जिसे बिना देर किए स्वीकार कर लिया गया.

लेकिन जल्दी ही इस दिवस से भी एक विडंबना आ जुड़ी. यह कि कई बार 28 फरवरी को उनकी जयंती या कि जन्मदिन समझ लिया जाता है, जबकि वह रमन इफेक्ट की खोज का दिन है. उनका जन्मदिन तो 7 नवंबर का यानी आज का दिन है और इस दिन उनकी यादों को ताजा करने या उनके प्रति श्रद्धा निवेदित करने की दिशा में इससे बेहतर कोई और कदम नहीं हो सकता कि देश को उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण (साइंटिफिक टेम्परामेंट) की दिशा में ले जाने के बहुविध जतन किए जाएं, जिसकी अपेक्षा हमारे संविधान में की गई है.

लेकिन अभी तो हालात कुछ ऐसे हैं कि भले ही लोग वैज्ञानिक उपकरणों पर ज्यादा से ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उनकी दूरी खत्म या कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)