नई दिल्ली: महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्र मेलघाट में कुपोषण से दर्जनों शिशुओं की मौत को ‘भयावह’ बताते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार (12 नवंबर) को राज्य सरकार को इस संकट के प्रति बेहद लापरवाह रवैये के लिए फटकार लगाई.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस संदेश पाटिल की पीठ अमरावती जिले के मेलघाट क्षेत्र में कुपोषण के कारण शिशुओं की मौतों को लेकर दायर कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. यह क्षेत्र आदिवासी बहुल है और वर्षों से कुपोषण की समस्या से जूझ रहा है. अदालत ने स्थिति को ‘भयावह’ बताते हुए कहा कि सरकार को चिंतित होना चाहिए.
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित किया कि जून 2025 से अब तक मेलघाट में शून्य से छह महीने की उम्र के 65 शिशुओं की कुपोषण के कारण मृत्यु हो चुकी है. अदालत ने कहा कि 2001 से कई आदेशों के बावजूद उन निर्देशों के क्रियान्वयन में कमी के कारण यह समस्या महामारी की तरह बनी हुई है.
‘निमोनिया, कुपोषण नहीं’
हालांकि, राज्य सरकार ने दावा किया कि ये मौतें निमोनिया के कारण हुईं, कुपोषण के कारण नहीं. इस पर अदालत ने पूछा, ‘क्या क्षेत्र में एक मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल बनाने के 2001 के अदालती आदेश का वास्तव में पालन किया गया है?’ सरकार ने इसका कोई जवाब नहीं दिया.
राज्य सरकार को आड़े हाथों लेते हुए अदालत ने कहा, ‘यह इस मुद्दे पर आपकी गंभीरता को दर्शाता है. आपका रवैया बेहद लापरवाह है, और कई बातों पर आपको जवाब देने की ज़रूरत है.’
राज्य द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेज़ों में उसके प्रयासों को दर्शाया गया था जिसे लेकर अदालत ने कहा, ‘कागज़ पर तो सब कुछ ठीक दिखता है, लेकिन वास्तविकता से कोसों दूर.’
अदालत ने जन स्वास्थ्य, जनजातीय मामलों, महिला एवं बाल विकास और वित्त विभागों के प्रमुख सचिवों को उठाए गए कदमों पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने तथा आगे और मौतें रोकने के ठोस उपायों की रूपरेखा तैयार करने का निर्देश दिया.
अदालत ने सरकार से इस मुद्दे को गंभीरता से लेने का आग्रह किया और राज्य सरकार के चार विभागों – जन स्वास्थ्य, जनजातीय मामले, महिला एवं बाल विकास तथा वित्त – के प्रमुख सचिवों को 24 नवंबर को अदालत में उपस्थित रहने का आदेश दिया.
अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि ऐसे आदिवासी क्षेत्रों में तैनात डॉक्टरों को अधिक वेतन दिया जाना चाहिए ताकि वहां की परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें कुछ प्रोत्साहन मिल सके.
हाईकोर्ट ने कहा, ‘कुछ जवाबदेही होनी चाहिए. आपके पास कोई व्यवस्था होनी चाहिए.’
ज्ञात हो बॉम्बे हाईकोर्ट ने पहले भी आदिवासी बहुल इलाकों में कुपोषण से होने वाली मौतों को लेकर कई बार सरकार को फटकार लगाई थी.
सितंबर 2021 में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि आदिवासी समुदायों के लिए कल्याणकारी योजनाएं केवल कागज पर हैं और पूछा था कि महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण से बच्चों की मृत्यु रोकने के लिए राज्य सरकार क्या कदम उठा रही है.
इस क्षेत्र में कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय याचिकाकर्ताओं ने अदालत को सूचित किया था कि इस साल अगस्त से सितंबर के बीच कुपोषण तथा इलाके में डॉक्टरों की कमी की वजह से 40 बच्चों की मृत्यु हो गई और 24 बच्चे मृत जन्मे.
अदालत ने कहा था, ‘अगर इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की मृत्यु हुई है, तो इन सभी योजनाओं का क्या फायदा? ये योजनाएं केवल कागज पर हैं. हम जानना चाहते हैं कि बच्चों की मृत्यु क्यों हो रही है और राज्य सरकार क्या कदम उठा रही है.’
एक अन्य सुनवाई में महाराष्ट्र सरकार से कहा था कि राज्य के आदिवासी इलाकों में कुपोषण और चिकित्सा सहायता की कमी के कारण कोई मौत नहीं होनी चाहिए.
दिसंबर 2021 में अदालत ने निर्देश दिया था कि आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण से मौतों को रोकने के लिए महाराष्ट्र सरकार योजना तैयार करे. अदालत ने यह भी कहा था कि जब सवाल आदिवासी आबादी के स्वास्थ्य से जुड़ा हो तो उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जाना चाहिए.
