यह साहित्य को जांचने-परखने का जाना-माना पैमाना नहीं है. फिर भी, मुझे लगता है कि हममें से ज़्यादातर लोग अगर साहित्य के पास जाते और उससे प्रतिकृत होते हैं तो उसमें जीवन के स्पंदन की बड़ी भूमिका होती है. अगर हमें किसी लेखक या कृति में जीवन का स्पंदन महसूस होता या दिखाई देता है तो वह हमें आकर्षित करता है और अगर ऐसा स्पंदन महसूस नहीं होता तो हमें साहित्य से अपनापा नहीं लगता.
यह स्पंदन ज़्यादातर उन ब्यौरों से चरितार्थ होता है जो किसी कविता या कथा में कोई लेखक चुनता और विन्यस्त करता है. मैं बरसों से इस पर इसरार करता रहा हूं कि साहित्य का देवता उसके ब्यौरों में बसता है. हम साहित्य के पास विचार पाने नहीं जीवन का स्पंदन पाने जाते हैं और स्पंदन का स्थापत्य जिन तत्वों से बनता है उनमें विचार भी है. पर वह केंद्रीय नही होता- केंद्रीयता तो व्यापक जीवन की होती है. जीवन से हटकर जो रचनाएं विचार-केंद्रित होती हैं वे प्रायः निष्प्राण लगती हैं- वे अंततः स्पंदनहीन भी होती हैं.
यह धारणा एक बार फिर पुष्ट हुई जब मैंने न्यू डायरेक्शंस से, अंग्रेज़ी अनुवाद में प्रकाशित हंगरी उपन्यासकार लाज़्लो क्राज़्नाहोरकाई का उपन्यास ‘सैटनटैंगो’ पढ़ना शुरू किया. पहले अध्याय का शीर्षक है: ‘उनके आने की ख़बर’ या थोड़ा लयात्मक बनाने के लिए ‘ख़बर उनके आने की’.
पहले दो पृष्ठों में अक्टूबर के अंत की सुबह, लंबी बारिश की निष्ठरता, घंटियों का स्वर; शायद चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित चैपल से; उस बुर्ज से नहीं जो पिछले युद्ध में ध्वस्त हो गया था; बर्फ़ की तरह ठण्डे फ़र्श पर एक बिल्ली की तरह बेआवाज़ चलना; तेज़ हवा के झोंके में कुछ न सुन पाना; अकेशिया के एक डंठल में, जैसे किसी सपने में, वसंत-ग्रीष्म-पतझर-शिशिर का विकासक्रम देखना और अनुभव करना कि जैसे यह सब एक अतिरिक्त अंतरिम चरण में, अनंत के. दूसरा पृष्ठ ख़त्म होने के पहले किरदार जिन चीज़ों से घिरा है और जो अब तक सुन भर रही थीं उनसे एक नर्वस सा संवाद करने लगता है- साइडबोर्ड ने आवाज़ सी दी, एक सॉसपैन खड़खड़ाया और एक रकाबी रैक में वापस सरक गई…. किरदार को यह फ़ैसला करना है कि उसे अब यहां नहीं रहना है.
आखिर 223 पृष्ठों के उपन्यास का समापन होता है पर अभी तक फ़ैसला लिया जाना है और साइडबोर्ड-सासपैन-रकाबी आदि ठीक वही कर रहे हैं जो दूसरे पृष्ठ पर कर रहे थे. इस बीच बहुत कुछ हो चुका है पर जीवन वैसा ही स्पंदित हो रहा है, कई ब्यौरों में अपने को दुहराता हुआ.
अक्सर आलोचना में रचना का जीवन-स्पंदन अपनी विविधता-जीवंतता में प्रगट नहीं हो पाता. कई बार तो उसमें साहित्य का स्पंदन भी नहीं आ पाता. यह आलोचक की निजी विफलता है या कि आलोचना की जैविक अक्षमता, यह कहना कठिन है.
झटपटी
उमर का तकाजा है कि जैसे-जैसे शरीर शिथिल हो रहा है वैसे-वैसे सब कुछ धीमा कर दिया जाए ताकि थकान न हो, कोई अघट न घट जाए. इस बेहद सयानी सद्भावी सलाह पर अब तक अमल नहीं कर पाया हूं, भले उसे चेतावनी की तरह याद रखता हूं. सो, 9 नवंबर की सुबह दस बजे की उड़ान से मुंबई गया और रात साढ़े दस बजे एक और उड़ान से दिल्ली वापस आ गया. प्रसंग बना मुंबई के नेशनल सेंटर ऑफ आर्ट्स में चल रहे ‘लाइवलिट फ़ेस्ट’ के एक सत्र से, जिसमें रज़ा पर अंग्रेज़ी में लिखित एक पुस्तक और उनके अंतिम चरण पर संपादित दूसरी पुस्तक पर चर्चा होनी थी.
ऐसे आयोजनों का एक लाभ यह होता है कि आप ऐसे अनेक लोगों से मिलते हैं जिनसे आपकी पहले कोई जान-पहचान नहीं होती. जिस सभागार में यह चर्चा हुई वह सौभाग्य से ठसाठस भरा हुआ था जिसमें मेरे गुजराती कविमित्र सितांशु यशचन्द्र भी थे जिन्हें इसी आयोजन में विनोद कुमार शुक्ल के साथ पुरस्कृत किया गया है. मुझे याद आया कि बरसों पहले इसी पुरस्कार की जूरी में मैं था और हमने बांग्ला कवि जय गोस्वामी को चुना था.
पिछले दो दिन और शामें, देर तक, एक पारिवारिक विवाह में गुज़रे थे तो उसकी ऊब और थकान भी थी. रज़ा के जीवन और कला में मुंबई का बहुत महत्व है. एक तरह से वे यहीं अपने जीवन में पहली बार चित्रकार के रूप में पहचाने गए; उन्हें बम्बई आर्ट सोसाइटी का गोल्ड मेडेल मिला; यहीं उन्हें अपने सबसे महत्वपूर्ण और बेहद सहायक तीन यहूदी कलाविद् मिले, बम्बई में ही उन्होंने फ्रेंच सीखी; यहीं उन्होंने सूज़ा; आरा, हुसैन, बाकरे और गाड़े के साथ मिलकर प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप की स्थापना की; यहीं के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से वे कला-प्रशिक्षित हुए और यहीं से फ्रेंच स्कॉलरशिप पर वे पेरिस के लिए रवाना हुए जहां फिर वे अगले साठ वर्ष बसे रहे. इसलिए मुंबई में रज़ा पर घंटे भर चर्चा होना सर्वथा उपयुक्त था.
रज़ा पर बात हो और उनके लगभग पर्याय बन गए बिंदु पर बात न हो यह संभव नहीं होता. मैंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि रज़ा के यहां बिंदु उनके यहां अचानक 1980 के दशक में या उससे कुछ पहले नहीं आया. उनके फ्रांस में बनाए गए अनेक लैंडस्केप और सिटीस्केप में वह पहले एक श्याम सूर्य के रूप में मौजूद रहा है: तब वह एक बेचैन, लगभग क्षुब्ध नेत्र की तरह है- कई बार अनिष्ट और आशंका से भरा हुआ. एक से अधिक चित्रों में वह निर्जन मकानों के दृश्य पर अचिंतित ऊपर लटका हुआ-सा नज़र आता है. चित्र की अपनी संरचना में मेल खाता हुआ, पर अपने आशय में थोड़ा अनमेल.
जब रज़ा ने अपनी वैकल्पिक आधुनिकता की खोज, बाद में, करना शुरू की तो उनके यहां बिंदु ऊर्जा और शक्ति के केंद्र के रूप में, कभी सृजन और समरसता के मुक़ाम की तरह, कभी सब कुछ के आरंभ के बिंब की तरह प्रस्फुटित और पल्लवित हुआ. वह एक साथ शक्ति और विनय का उद्गम बन गया. रज़ा के यहां बिंदु की यात्रा जीवनदृष्टि और कलादृष्टि की यात्रा भी है.
चित्रकार और कविता
चित्रकला और कविता का संबंध हमारी परंपरा में बहुत पुराना है: चित्रकाव्य तक लिखे गए हैं. उनके कृतियों का चित्रों से अलंकरण होता आया है. आधुनिकता के दौर में, दुर्भाग्य से, कविता का चित्रकला से और चित्रकला का कविता से संबंध काफ़ी शिथिल पड़ गया और कई बार तो परस्पर अबोला तक व्याप्त हो गया. फिर भी, ऐसे कवि हुए हैं जिन्होंने चित्रों या चित्रकारों पर कविताएं लिखी हैं.
इधर श्रीकान्त वर्मा के कुछ कविता संग्रह पलट रहा था तो हिम्मत शाह और रामकुमार के चित्रों पर लिखी उनकी कविताओं पर ध्यान गया. श्रीकान्त वर्मा की कई चित्रकारों से मित्रता थी. उनमें स्वामीनाथन भी शामिल थे. उन्होंने, हिंदी में शायद पहली बार, अनेक आधुनिक कलाकारों के चित्र, अपनी पत्रिका ‘कृति’ में आवरण पर प्रकाशित किए थे.
रामकुमार पर दो छोटी कविताएं हैं:
रामकुमार के चित्र-1
छायाएं,
न हिलती, न डुलती, न मिलती
एक-दूसरे की उदासी में घुलती
केवल
खड़ी हैं.
रामकुमार के चित्र-2 (बेकार ग्रैजुएट)
स्याही के धब्बे सोचते खड़े हैं.
हिम्मत शाह के चित्रों के लिए एक कविता ‘मत्स्यबेध’ शीर्षक से है. उसकी कुछ पंक्तियां:
अपना ही पीछा करते हुए करते दबे पांव
नहर में काले कपड़े पहने हुए वह
‘शाम न हो, शाम न हो’
कहती-कहती पहुंच गई है
दोपहर में.
. . .
पैरों पर चढ़ती हैं चीटियां/कन्धे पर पंजे गड़ाता है. रीछ,
भुजा पर/प्रेमिका करती है कै
– बची रह गई है/मुद्राएं, सर्प,
हाथ, धनुष,
और
उरोज.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
