नई दिल्ली: आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीतारामराजू जिले में मंगलवार (18 नंवबर) की सुबह हुई एक कथित मुठभेड़ में छह माओवादियों के मारे जाने की पुष्टि पुलिस ने की है.
आंध्र प्रदेश पुलिस के इंटलिजेंस चीफ़ महेश चंद्र लडहा ने पत्रकारों को बताया कि मुठभेड़ में मारे गए छह लोगों में शीर्ष माओवादी कमांडर हिड़मा और उनकी पत्नी राजे शामिल हैं.
उन्होंने बताया कि 2-3 दिन पहले से उन्हें पुख्ता जानकारी थी कि माओवादी पार्टी के बड़े नेता छत्तीसगढ़ से आंध्र प्रदेश के जंगलों में आए हुए हैं. मुठभेड़ जिले के मारेडुमिल्ली के जंगल में सुबह 6.30 से 7 बजे के बीच हुई बताई जा रही है.
हिड़मा कौन है?
बताया जा रहा है कि वह माओवादी पार्टी की सेंट्रल कमेटी के सबसे युवा सदस्य थे. उनकी उम्र लगभग पचास के करीब बताई जा रही है. हाल ही में उन्हें दण्यकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (डीके एसजेडसी) का सचिव बनाने की खबरें सामने आईं थीं. इस प्रकार दंडकारण्य में पिछले 45 सालों से जारी नक्सलवादी या माओवादी आंदोलन में वे सबसे पहले स्थानीय आदिवासी थे जो उस पद पर पहुंचे थे.
माओवादी संगठन की जानकारी रखने वालों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पूवरती गांव का मूल निवासी हिड़मा 1994-95 के बीच माओवादी पार्टी में शामिल हुए थे. वह उस समय लगभग 17 साल के थे, और सातवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी.
शुरूआत में उन्होंने दक्षिण बस्तर क्षेत्र के बासागुड़ा, कोंटा, किष्टारम इलाकों में दस्ता सदस्य से लेकर एरिया कमेटी सचिव के रूप में काम किया. स्थानीय होने के कारण पूरे दक्षिण बस्तर क्षेत्र में वह लोगों के बीच लोकप्रिय नेता बन गए.
2007 में दक्षिण बस्तर के उरपलमेट्टा के पास सीआरपीएफ के 24 जवानों को घेरकर मारने की घटना से हिड़मा का नाम जोड़ा गया. इसके बाद दक्षिण बस्तर क्षेत्र (सुकमा जिला) में हुए कई हमलों में हिड़मा का नाम सामने आया. 10 अप्रैल 2010 को ताडिमेट्ला के पास माओवादियों ने घात लगाकर हमला करके 76 जवानों की हत्या की थी, जो भारत के माओवादी आंदोलन के इतिहास में सबसे बड़ी घटना मानी जाती है. इसे भी हिडमा के बटालियन ने अंजाम दिया बताया जाता है. सुरक्षा बलों की जानकारी के मुताबिक कुल 26 हमलों में हिड़मा की भागीदारी थी.
इसके साथ ही पार्टी के संगठन में उनका कद बढ़ने लगा. पहले कंपनी-3 के कमांडर रहे हिड़मा को 2008 में बनी पहली बटालियन का कमांडर बनाया गया. 2011 में उन्हें दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी का मेंबर चुन लिया गया. आगे चलकर वह उस कमेटी के सचिव बने और केंद्रीय कमेटी के मेंबर भी बने.
माओवादी आंदोलन पर नजर रखने वाले बताते हैं कि हिडमा के एक तेजतर्रार कमांडर बनने के पीछे उस समय की परिस्थितियां भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं. क्योंकि एक तरफ माओवादी और दूसरे तरफ सरकार के सुरक्षा बलों के बीच भीषण संघर्ष होने लगे थे. पहले सलवा जुडूम उसके बाद ऑपरेशन ग्रीन हंट, ऑपरेशन समाधान जैसे कई मिलिट्री ऑपरेशन चले थे. जिस दौरान हिड़मा एक लड़ाकू कमांडर के तौर पर उभरे.
यह भी बताया जा रहा है कि हिड़मा का मारा जाना माओवादी पार्टी के उस धड़े के लिए, जो सशस्त्र संघर्ष को जारी रखना चाहता है – बहुत बड़ा झटका है. पिछले महीने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली ज़िले में माओवादी पार्टी के पोलित ब्यूरो और सेंट्रल कमेटी के सदस्य मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ सोनू ने 60 अन्य माओवादी साथियों सहित हथियारों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया था.
उसके बाद जगदलपुर में 208 सदस्यों के साथ स्पेशल जोनल कमेटी के सदस्य रूपेश उर्फ वासुदेव राव ने हथियारों के साथ समर्पण किया. लेकिन माओवादी पार्टी के दूसरे गुट ने उन दोनों नेताओं को गद्दार ठहराया और हथियारबंद संघर्ष को जारी रखने का ऐलान किया. बताया जाता है इस गुट का एक मुख्य चेहरा हिड़मा थे.
हाल ही में छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा हिड़मा के गांव पुवरती में उनकी मां से मुलाकात की थी और उनसे उनके बेटे की वापस आने की अपील करवाई थी. इसके एक हफ्ते बाद ही हिड़मा की मौत की ख़बर आई है.
मुठभेड़ पर सवाल
आंध्र प्रदेश की सिविल लिबर्टीज़ कमेटी ने इस मुठभेड़ को फर्जी करार देते हुए दावा किया, ‘पिछले महीने की 28 तारीख से हिड़मा और उसके साथी आंध्र प्रदेश के एक गुप्त ठिकाने में रह रहे थे. आंध्र प्रदेश पुलिस ने उन्हें वहां से हिरासत में लिया. इसके बाद पुलिस इन निहत्थे लोगों को मारेडुमिल्ली के जंगलों में ले गई और उनकी बेरहमी से हत्या कर दी.’
इस बीच ख़बरें आ रही हैं कि आंध्र प्रदेश के कृष्णा ज़िले के पेनमालुरु के पास पुलिस ने एक घर से 29 माओवादियों को गिरफ्तार किया है जिनमें 21 महिलाएं हैं.
कृष्णा जिला एसपी विद्यासागर नायडु ने पत्रकारों से बात करते हुए बताया कि गिरफ्तार किए गए लोग हिड़मा के बटालियन के हैं. इसके अलावा, नए पार्टी महासचिव तिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी की सुरक्षा टीम में शामिल नौ लोग शामिल हैं.
