दादरी: नीले और लाल रंग से पुता एक छोटा सा लकड़ी का दरवाजा, जिस पर सालों की धूल जमा है. दो खिड़कियां, जिन पर लगी जालियां अब फट चुकी हैं. दीवार पर दरार हैं और घर के आस-पास घास का ढेर. ये जर्जर घर मोहम्मद अख़लाक़ का है, जिसके दरवाजे की कुंडी खुली हुई है और इसका उजड़ापन एक दशक पहले हुए दर्दनाक घटना की कहानी बयां कर रहा है.
दादरी के ठाकुर-बहुल गांव बिसाहड़ा में करीब दस साल पहले 52 वर्षीय मोहम्मद अख़लाक़ की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी. इस हमले में अख़लाक़ के छोटे बेटे दानिश भी बुरी तरह घायल हो गए थे. ये गो-हिंसा से जुड़ी देश की पहली मॉब लिंचिंग की बड़ी घटना थी. लेकिन एक दशक बीत जाने के बाद भी यहां के लोगों में इस हत्याकांड को लेकर कोई दुख-पछतावा नहीं दिखाई देता. दिखती है, तो सिर्फ आरोपियों के लिए सहानुभूति.

मालूम हो कि बीते महीने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने ‘सामाजिक सद्भाव’ का हवाला देते हुए गौतम बुद्ध नगर की उच्च सत्र अदालत में दायर एक आवेदन में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत मुकदमा वापस लेने का अनुरोध किया है.
सरकार के इस कदम ने पुराने घाव ताज़ा कर दिए हैं. अगर हिंदू इसे नई उम्मीद की तरह देख रहे हैं कि आरोपी अब बरी हो जाएंंगे, तो वहीं मुसलमान डरे हुए हैं.
बिसाहड़ा के लोगों में मीडिया को लेकर बहुत गुस्सा है कि वह आरोपियों के प्रति सहानुभूति नहीं दिखा रही. लोग मीडिया से बात करने को तैयार नहीं हैं, तस्वीर खींचना तो दूर. कई जगह लोग गाली-गलौच से लेकर मार-पीट तक पर उतारू हैं.
पंचायत के एक वरिष्ठ सदस्य के अनुसार, इस गांव में लगभग 35 हज़ार की आबादी है, जिसमें से करीब 6-7 हज़ार मुस्लिम आबादी है. हिंदुओं में ज्यादातर घर ठाकुरों के हैं और अधिकतर घरों के बाहर सिसौदिया लिखा है.
शनिवार (22 नवंबर) की सुबह ग्राम प्रधान के घर पर कई लोग मौजूद थे, जिन्होंने अख़लाक़ लिंचिंग को लेकर ढेर सारी बातें तो की, लेकिन वे लोग कैमरे पर बोलने को तैयार नहीं थे, ‘अभी तो हमारे बच्चों के साथ कुछ ठीक होने जा रहा है, ऐसे में कुछ गड़बड़ हो गई तो.’

हमारे लड़कों की जिंदगी खराब हो गई: स्थानीय लोग
कई लोगों का कहना था कि आरोपी लड़कों की जिंदगी बर्बाद हो गई है, एक की सरकारी लगी लगाई नौकरी छीन गई, तो अन्य की अब सरकारी नौकरी की उम्र नहीं बची. इन लड़कों के साथ बहुत गलत हुआ है. ये सब राजनीति के शिकार हुए हैं.
यह पूछे जाने पर की अख़लाक़ के साथ जो हुआ क्या वो गलत नहीं था, लोग कहते हैं, ‘मंदिर के माइक से गोमांस की घोषणा होने के बाद भीड़ इकट्ठा हो गई थी. इसमें गांव के लोग, आते-जाते राहगीर सब शामिल थे. बच्चों का खून गरम होता है, अब गुस्से में किसने क्या किया किसे पता. लेकिन इन लड़कों की तो पूरी जिंदगी खराब हो गई.’
कुछ लोग आगे ये भी कहते हैं कि गाय की तो हमारे धर्म में मां मानकर पूजा की जाती है, अब अगर कोई उसी गाय को मार दे, तो कोई क्या करेगा. आपका खून नहीं खौलेगा. ये सब उसी का नतीज़ा है.
ग्राम प्रधान के घर से सटे एक घर की छत पर एक युवक ने कहा, ‘ये सब समाजवादी सरकार की देन थी, जो हमें जेल पहुंचा दिया गया और उन लोगों को पैसे से मालामाल कर दिया गया.’
इन युवक ने खुद को इस मामले में एक आरोपी बताया. वे तीन साल जेल में थे और अब बेल पर बाहर हैं. उनका कहना था कि अख़लाक़ के परिवार को खूब पैसे मिल गए और हमारी जिंदगी नरक बन गई.
‘योगी आदित्यनाथ सरकार हमारे साथ सब सही करना चाहती है’
वहां मौजूद अन्य लोगों का भी कहना था कि योगी आदित्यनाथ सरकार उनके साथ सब सही करना चाहती है. ‘समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार, जो आज़म खान के इशारों पर चलती थी, ने इस पूरे मामले को अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल किया.’
ये पूछे जाने पर कि आज़म खान या अख़लाक़ के परिवार की यहां के लोगों से कोई खास दुश्मनी थी, जो उन्होंने ऐसा कुछ किया है, यहां के लोगों के पास इसका कोई जवाब नहीं था.
इस बीच अख़लाक़ के घर की खस्ता हालत ये बताती थी कि कैसे एक बसा-बसाया घर, ईंट के खंडहर में तब्दील हो चुका है.

लोगों ने बताया कि अख़लाक़ के दसवें (मौत के दस दिन बाद) के बाद उनका पूरा परिवार गांव छोड़कर चल गया था और उसके बाद कभी वापस नहीं लौटा.
इस घर के ठीक पीछे और बगल में अख़लाक़ के तीन और भाइयों के घर हैं, जो खाली पड़े हुए हैं. यहां कोई नहीं रहता. फर्श पर घास उगी हुई है, तो कहीं कूड़े का ढेर लगा हुआ है.
कुछ लोगों का कहना है कि अख़लाक़ के दो भाइयों ने अपना घर बेच दिया और इसके बाद वे यहां से चले गए. हालांकि इसकी पुष्टि द वायर हिंदी नहीं कर सका है.

इस गली से थोड़ा ही आगे गुजरते वह मंदिर है, जहां से गोमांस रखने की घोषणा की गई थी. इस मंदिर के आस-पास के कई घरों के युवक इस मामले में आरोपी हैं और जेल में कुछ साल रहने के बाद जमानत पर बाहर आए हैं.
गो-मांस की घोषणा करने वाले मंदिर के पुजारी और चेले दोनों फरार
एक अभियुक्त के रिश्तेदार ने बताया कि मंदिर में उन दिनों कोई भागवत या कथा का आयोजन चल रहा था, जिसके चलते माइक और लाउडस्पीकर की व्यवस्था की गई थी.

वे आगे बताते हैं कि घटना वाली रात करीब 9.30 बजे मंदिर के पुजारी, जो मंदिर परिसर में ही रहते थे, ने माइक से कहा कि यहां गाय की हत्या कर दी गई और गोमांस रखा और खाया जा रहा है. इस पर लोगों की भीड़ जमा हो गई और मंदिर वाली गली से कुछ ही दूरी पर स्थित अख़लाक़ के घर पर धावा बोल दिया.
कई लोगों का कहना है कि उस रात के बाद वह पुजारी और उनका चेला दोनों यहां से फरार हो गए. वे पुलिस के हाथ भी नहीं आए और न ही फिर इस गांव लौटे.

मंदिर के पास इस समय काफी तनाव का माहौल बना हुआ है. मीडिया के लोगों को देखकर लोग अपना आपा खो दे रहे हैं. और अपने बच्चों का जीवन खराब करने का आरोप मीडिया पर लगा रहे हैं.
लोगों को लगता है कि अगर सरकार द्वारा मामला वापस लेने की खबर ज्यादा सुर्खियों में रही, तो फिर से कहीं उनके बच्चों को जेल न जाना पड़े.

इस मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर एक छोटी मस्जिद भी है. लोगों ने बताया कि यहां रोज़ाना नमाज़ अदा की जाती है. मस्जिद के आस-पास कुछ मुसलमान लोगों के घर हैं, लेकिन सब सन्नाटे से भरा नज़र आता है.
इस गांव में फिलहाल एसआईआर का काम भी चल रहा है.
कुछ लोग हमें एक खाट पर बैठे मिले, जिन्होंने बताया कि इस इलाके में पूरी तरह से शांति है. उस घटना से पहले और बाद में सब ठीक रहा है. कोई हिंदू-मुस्लिम तनाव नहीं देखने को मिला. लोग एक-दूसरे के घरों में शादी-ब्याह और त्यौहारों में जाते हैं, और मिलकर रहते हैं.
हालांकि, किसी को यहां अख़लाक़ की मौत का दुख हो ऐसा नज़र नहीं आता. सबको चिंता है, तो यह कि के आरोपी लड़कों के ऊपर से मुकदमा हट जाए और वे बरी हो जाएं.

मुसलमानों में डर और तनाव का माहौल
साथ खड़े करीब 20-22 साल के एक मुसलमान युवक ने हमसे कैमरे पर कहा कि इस इलाके में सौहार्दपूर्ण माहौल है. सभी लोगों में भाईचारा है, सब मिल-जुल कर रहते हैं. लेकिन थोड़ी देर बाद जब कैमरा बंद हो गया और वह हमें थोड़ी दूरी पर दोबारा मिले, तो उन्होंने कहा- ‘बहुत डर का माहौल है, इन लोगों के सामने बोलना पड़ता है कि सब ठीक है, नहीं तो यहां कुछ भी हो सकता है.’
कुछ मुसलमान लोगों ने हमें बताया कि उन्हें अपनी जान बचानी है. सब ठीक बोलना ही मजबूरी है. यहां किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता. माहौल खराब है, गांव बर्बाद हो गया है. ऊपर से लेकर नीचे तक उनकी सरकार है.

ये मुसलमान आज भी अख़लाक़ की मौत को भुला नहीं पाए हैं और वे भी यहां से चले जाना चाहते हैं, लेकिन उनके पास कहीं और ठिकाना नहीं है. यहां अपने घरों में बंद रहकर चुप-चाप अपना छोटा-मोटा काम-धंधा चलाने के अलावा उनके पास कोई और चारा नहीं है.
एक 50-55 साल के बुजुर्ग व्यक्ति हमें बताते हैं, ‘अख़लाक़ की मौत से करीब तीन-चार दिन पहले बकरीद थी, ऐसे में बकरे का मांस घर में होना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन इस मांस के लिए जिस तरीके से उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया, ये बहुत ही डरावनी बात है. शायद ही यहां कभी कोई उस घटना को भूले.’

इस मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी ने इस बात की पुष्टि की थी कि अख़लाक़ के घर से कभी किसी मांस के टुकड़े का सैंपल नहीं लिया गया था. जो सैंपल टेस्टिंग के लिए लिया गया था, वो उनके घर से कुछ मीटर की दूरी से लिया गया था, जहां उन्हें पीटा गया था.
ज्ञात हो कि घटनास्थल से बरामद मांस को स्थानीय पशु चिकित्सा की एक प्रारंभिक रिपोर्ट में बकरी का बताया गया था. इसके बाद मथुरा की फॉरेंसिक लैब रिपोर्ट ने इसे गोमांस बताया.
हालांकि, अख़लाक़ के परिवार ने इसका खंडन करते हुए कहा था कि उनके घर में गाय का मांस नहीं था.
गौरतलब है कि 28 सितंबर 2015 की रात में हुई इस घटना को लेकर दिसंबर 2015 में पुलिस ने अपनी चार्जशीट दायर की, जिसमें 15 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था. इसमें एक नाबालिग और एक स्थानीय भारतीय जनता पार्टी नेता संजय राणा के बेटे विशाल राणा के नाम शामिल थे. बाद में इस मामले में आरोपियों की संख्या कुल 19 हुई.
इस मामले में 2016 में एक अभियुक्त रवीन सिसोदिया की मौत जेल में हो गई थी.
इस मामले का 2021 में ट्रायल शुरू हुआ था. अख़लाक़ के परिवार के वकील मोहम्मद यूसुफ़ सैफ़ी का कहना है कि अब तक केवल एक गवाह का बयान कोर्ट के सामने पेश हुआ है.
अभियुक्तों पर भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे, जिनकी जगह अब भारतीय न्याय संहिता ने ले ली है, जिनमें 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 504 (जानबूझकर अपमान करना) और 506 (आपराधिक धमकी) शामिल हैं.
अख़लाक़ की लिंचिंग एक भयावह मिसाल के तौर पर देखी जाती है, जिसने भीड़ हिंसा, असहिष्णुता और गोमांस खाने पर देशव्यापी बहस छेड़ दी थी. इस घटना के बाद भी देश में कई ऐसे मामले सामने आए, जहां स्वयंभू ‘गौरक्षकों’ ने गौरक्षा के नाम पर गोहत्या या मवेशियों के परिवहन के आरोप में मुस्लिमों को निशाना बनाया.
आज बिसाहड़ा को देखकर कहा जा सकता है कि ‘हिंदू गांव में मुस्लिम की हत्या से किसी को फ़र्क नहीं पड़ता.’
