भारतीय रुपया एशिया की सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा बनी

अमेरिकी डॉलर (यूएसडी) के मुकाबले 4.3% की तेज़ गिरावट के साथ भारतीय रुपया एशिया का सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला मुद्रा बन गया है. विदेशी मुद्रा विश्लेषकों का कहना है कि अगर भारत-अमेरिका व्यापार समझौता जल्द नहीं होता है, तब रुपया और गिरकर 1 डॉलर के मुकाबले 90 रुपए तक पहुंच सकता है.

प्रतीकात्मक तस्वीर: करेंसी नोट. (फोटो: रवि रोशन/पेक्सेल्स)

नई दिल्ली: इस (जनवरी-दिसंबर 2025) अमेरिकी डॉलर (यूएसडी) के मुकाबले 4.3% की तेज़ गिरावट के साथ भारतीय रुपया एशिया का सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला मुद्रा बन गया है. विदेशी मुद्रा विश्लेषकों का कहना है कि अगर भारत-अमेरिका व्यापार समझौता जल्द नहीं होता है, तब रुपया और गिरकर 1 डॉलर के मुकाबले 90 रुपए तक पहुंच सकता है.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, चॉइस वेल्थ के अक्षत गर्ग ने कहा, ‘रुपया चीनी युआन और इंडोनेशियाई रुपियाह जैसी मुद्राओं की तुलना में कमजोर रहा है. हालांकि, यह अब भी जापानी येन और कोरियाई वॉन जैसी संरचनात्मक रूप से कमजोर मुद्राओं से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है.’ 

उन्होंने आगे कहा, ‘कुल मिलाकर अब रुपये की दिशा घरेलू अर्थव्यवस्था से ज़्यादा वैश्विक डॉलर की मजबूती पर निर्भर करती है.’ 

एक्सिस बैंक के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट (बिजनेस एंड इकोनॉमिक रिसर्च) तनय दलाल ने कहा कि रुपये पर कई महीनों से गिरावट का दबाव बना हुआ है. यह दबाव चालू खाते (करंट अकाउंट) की वजह से नहीं, बल्कि पूंजी निकासी (capital outflows) के कारण है. 

उन्होंने बताया, ‘रुपया एशियाई मुद्राओं के मुकाबले कमजोर हुआ है, खासकर उन देशों के मुकाबले जिनका चालू खाता सरप्लस में है. अब तक कैलेंडर वर्ष 2025 में रुपया 4% गिरा है, जबकि इंडोनेशियाई रुपियाह 2.9% और फिलीपींस पेसो 1.3% कमजोर हुआ है.’ 

दलाल ने कहा कि एशिया की बाकी मुद्राओं में मज़बूती देखी गई है, जो मुख्य रूप से चीनी युआन के कारण है. 

21 नवंबर को रुपया डॉलर के मुकाबले नई ऐतिहासिक गिरावट पर पहुंच गया था. यह 88.8 के स्तर को पार कर 89.66 तक गिर गया. हालांकि, इसके बाद रुपये ने कुछ रिकवरी की और मंगलवार को डॉलर के मुकाबले 89.22 रहा. 

अक्यूट रेटिंग्स एंड रिसर्च के एमडी और सीईओ शंकर चक्रवर्ती ने कहा, ‘पिछले दो महीनों में डॉलर में 3.6% की मज़बूती ने अधिकांश मुद्राओं पर दबाव डाला है, जिसमें रुपया भी शामिल है. भारत दोहरी बाहरी चुनौतियों का सामना कर रहा है, एक अमेरिका के बढ़े टैरिफ और दूसरा कीमती धातुओं की कीमतों में बढ़ोतरी. इन प्रतिकूल परिस्थितियों का असर भारत के व्यापार घाटे पर पड़ रहा है.’

डॉ. विजयकुमार ने बताया कि शेयर बाज़ार में विदेशी निवेशकों (एफआईआई) की लगातार बिक्री से भी रुपये पर दबाव पड़ा है. भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में देरी ने निवेशकों के भरोसे को कमजोर किया है. 

उन्होंने कहा, ‘अगर यह व्यापार समझौता जल्द हो जाता है और भारत पर टैरिफ दरें घटती हैं, तो रुपये में मज़बूत सुधार देखने को मिल सकता है.’

उन्होंने अनुमान लगाया कि रुपया पहले 90 के स्तर तक गिर सकता है और फिर 2026 की पहली तिमाही में 88.50 के आसपास वापस आ सकता है.

अक्षत गर्ग ने कहा कि ‘भारत पर टैरिफ प्रभाव इसलिए ज़्यादा पड़ा क्योंकि हाल के हफ्तों में व्यापार घाटा बढ़ा है और विदेशी निवेशकों द्वारा बिक्री भी लगातार जारी है. आरबीआई ने हस्तक्षेप किया, लेकिन जब रुपया मनोवैज्ञानिक स्तरों से नीचे गिरा, तो गिरावट और तेज़ हो गई.’