असम: छह समुदायों को एसटी का दर्जा देने के विरोध में उतरे आदिवासी समूह

असम मंत्रिमंडल ने राज्य के छह समुदायों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी है, जिसके बाद राज्य के कई आदिवासी संगठन और छात्र इसके ख़िलाफ़ उतरे हैं और सरकार से यह फैसला वापस लेने की मांग कर रहे हैं. उनका आरोप है कि यह स्थानीय आदिवासी समुदायों के हितों को कमज़ोर करता है.

छह समुदायों को एसटी का दर्जा देने के खिलाफ कोकराझार में छात्रों और आदिवासी संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया. (फोटो साभार: सोशल मीडिया वीडियो स्क्रीनग्रैब)

नई दिल्ली: असम के कई आदिवासी संगठन मंत्रिमंडल द्वारा राज्य के छह समुदायों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने के विरोध में उतरे हैं.

द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, गुरुवार (27 नवंबर) को कोकराझार में छात्रों और आदिवासी संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया. बोडोलैंड यूनिवर्सिटी के आदिवासी समूह के छात्रों ने सबसे पहले प्रदर्शन किया, सुबह 8 बजे से दोपहर 12 बजे तक मुख्य द्वार के बाहर धरना दिया और उस दिन होने वाले सभी तीसरे सेमेस्टर की परीक्षाएं रद्द करने पर मजबूर कर दिया.

उन्होंने इस फैसले को वापस लेने की मांग करते हुए नारे लगाए और आरोप लगाया कि यह स्थानीय आदिवासी समुदायों के हितों को कमज़ोर करता है.

उन्होंने ताई अहोम, चुटिया, मोरन, मुटैक, कोच-राजबोंगशी और टी ट्राइब्स – समुदायों को एसटी का दर्जा देने के गुरुवार के कैबिनेट के फैसले की निंदा की और मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा के खिलाफ नारे लगाए. उनके प्लेकार्डों पर ‘एंटी-ट्राइबल हाय-हाय’, ‘हम छह समुदायों को एसटी का दर्जा देने का विरोध करते है’ और ‘सीसीटीओए ज़िंदाबाद’ लिखा था.

1996 में बनी असम की  ट्राइबल ऑर्गनाइज़ेशन ऑन कोऑर्डिनेशन कमिटी (सीसीटीओए) 26 आदिवासी संगठनों का एक छत्र संगठन है, जिसने सबसे पहले पूरे राज्य में विरोध शुरू करते हुए 10 नवंबर को गुवाहाटी के पास एक बड़ी रैली की थी.

गुरुवार शाम को बोडो, राभा, गारो और दूसरे समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले आदिवासी संगठनों ने कोकराझार में एक टॉर्चलाइट रैली निकाली, जिसमें उन्होंने एसटी सूची में ‘उन्नत और ज़्यादा आबादी वाले’ समुदायों को शामिल करने के राजनीतिक कदम का विरोध किया.

राज्य मंत्रिमंडल ने बुधवार को असम की छह बड़े समुदायों – ताई अहोम, चुटिया, मोरन, मुटैक, कोच-राजबोंगशी और टी-ट्राइब्स को एसटी का दर्जा देने के प्रस्ताव के बारे में मंत्रियों के समूह की रिपोर्ट को मंजूरी दे दी थी.

मुख्यमंत्री ने गुरुवार को कहा था कि मंत्रियों के समूह की रिपोर्ट विधानसभा में पेश की जाएगी और फिर केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी जाएगी. तीन सदस्यों वाले मंत्रियों का समूह के अध्यक्ष शिक्षा मंत्री रनोज पेगु हैं, जिसमें पीयूष हजारिका और केशव महंता सदस्य हैं. शर्मा ने यह भी कहा कि मौजूदा एसटी आबादी पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

लेकिन, उनका आश्वासन विरोध करने वाले समूहों को मनाने में नाकाम रहा. छात्रों ने कहा कि अभी एसटी की आबादी करीब 45 लाख है, जबकि छह समुदायों की कुल संख्या एक करोड़ से ज़्यादा है.

एक छात्र ने कहा, ‘हम जन्म से एसटी हैं. उनकी संख्या के आगे हम दब जाएंगे. हमारा भविष्य खतरे में पड़ जाएगा.’

असम टाइम्स के मुताबिक, पत्रकारों से बात करते हुए ऑल बोडो स्टूडेंट्स यूनियन (एबीएसयू) के उपाध्यक्ष ख्वोरवमदाओ वैरी ने कहा कि जिन छह समुदायों को एसटी का दर्जा देने का प्रस्ताव है, वे असम के मौजूदा आदिवासी समूहों की तुलना में पहले से ही सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक रूप से कहीं ज़्यादा आगे हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि उन्हें आदिवासी का दर्जा देने से मूल जनजातियों की सुरक्षा और अधिकार कमज़ोर हो जाएंगे.

वैरी ने राज्य सरकार से तुरंत फैसला वापस लेने की अपील की, उन्होंने ऐसा न करने पर आंदोलन को और तीव्र और तेज़ की चेतावनी दी.