नई दिल्ली: ‘एक मेडिकल छात्र पहले पांच साल एमबीबीएस करता है, फिर दो साल एक अनिवार्य बॉन्ड के तहत राज्य के पिछड़े इलाकों में दुर्लभ परिस्थितियों के बीच अपनी सेवाएं देता है और जब उसके पीजी की बारी आती है, तो सरकार उसका हक़ मार लेती है. ये राज्य के युवा डॉक्टर्स के भविष्य के साथ खिलवाड़ है.’
ये बातें छत्तीसगढ़ के सरगुजा के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज की छात्रा की हैं. वे अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई के आखिरी साल में हैं और हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मेजिकल पीजी प्रवेश को लेकर बदले गजट नियमों से परेशान हैं.
मालूम हो कि छत्तीसगढ़ सरकार ने हाल ही में गजट नोटिफिकेशन जारी कर मेडिकल स्नातकोत्तर (पीजी) प्रवेश नियम 2025 में आंशिक संशोधन कर राज्य कोटे की सीटें 50% से घटाकर 25% कर दी हैं. नए नियम के लागू के बाद अब राज्य के मेडिकल कॉलेजों में 75 प्रतिशत एडमिशन केवल मेरिट यानी नीट पीजी रैंकिंग के आधार पर ही होगा और इंस्टिट्यूशनल प्रेफरेंस यानी आपने किस कॉलेज से एमबीबीएस किया है, ये कोई मायने नहीं रखता है.
इस आदेश के सामने आते ही छत्तीसगढ़ के सीनियर, जूनियर डॉक्टरों के साथ ही चिकित्सकों के संगठन ने भी भारी विरोध दर्ज करवाया. कई दिन लगातार प्रदर्शन किए गए, सरकार से लेकर विपक्ष तक के नेताओं को ज्ञापन सौंपे गए. इसके अलावा मामले को अदालत में भी चुनौती दी गई है.
इस संबंध में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बुधवार (10 दिसंबर) को सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी कर दो दिनों के भीतर जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं. इस मामले की अगली सुनवाई के लिए अदालत ने 16 दिसंबर की तारीख निर्धारित की है.

दरअसल, सरकार के नए नियम को पांच डॉक्टरों ने अदालत में चुनौती दी है.
इन चिकित्सकोंं का कहना है कि ऑल इंडिया कोटे की सीटें बढ़ा देने से राज्य के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों को मेडिकल पीजी में प्रवेश से वंचित होना पड़ेगा. नई नीति पूर्व में आए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले की गलत व्याख्या के चलते लाई गई है, जिससे स्थानीय युवा डॉक्टरों का भविष्य खतरे में पड़ गया है.
‘हाईकोर्ट के पहले आदेश की गलत व्याख्या की गई’
छत्तीसगढ़ डॉक्टर्स फेडरेशन के अध्यक्ष हीरा सिंह लोधी ने द वायर को बताया कि इससे पहले हाईकोर्ट का जो फैसला आया था, उसमें राज्य सरकार अपना पक्ष सही से नहीं रख पाई थी. अदालत को स्पष्ट तौर पर ये बताया ही नहीं गया था कि छत्तीसगढ़ के सरकारी चिकित्सा संस्थानों में पहले से ही 50 प्रतिशत सीटें ऑल इंडिया ओपन कोटे के तहत आती हैं. इसके अलावा जो फैसला आया था वो भी सिर्फ प्राइवेट संस्थानों के लिए था.
डॉक्टर लोधी आगे बताते हैं, ‘इस मामले की शुरुआत डॉक्टर समृद्धि दुबे की याचिका से हुई. वे छत्तीसगढ़ की मूल निवासी हैं, लेकिन उन्होंने अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई राज्य के बाहर शायद केरल के किसी प्राइवेट संस्थान से की है. उनकी रैंकिंग 75,000 है, ऐसे में उन्होंने यहां स्टेट कोटे के तहत दाखिला पाने के लिए हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था, जिस पर अदालत ने स्टेट कोटे के तहत इंस्टिट्यूशनल प्रेफरेंस की सीटों में कटौती का फैसला सुनाया और इसे 50 प्रतिशत तक सीमित कर दिया. लेकिन सरकारी संस्थान तो पहले से ही 50 प्रतिशत सीटें सभी के लिए खुली रखते हैं.’
डॉक्टर हीरा बताते हैं कि राज्य के प्राइवेट संस्थान 90 प्रतिशत तक सीटें स्थानीय छात्रों को देते हैं. इसके अलावा उनका कुछ एनआरआई कोटा भी होता है. लेकिन सरकारी संस्थान तो पहले से ही 50-50 के फार्मूले पर काम कर रहे हैं, जो फैसला आया था, वो प्राइवेट संस्थानों पर लागू होता है, लेकिन सरकार ने गलत व्याख्या के चलते इसे सभी संस्थानों पर लागू कर दिया.
डॉक्टर हीरा के अनुसार, बुधवार को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भी सरकार से यही सवाल किया कि जो फैसला था वो प्रइवेट संस्थानों से जुड़ा था, आपने सरकारी संस्थानों को क्यों इस दायरे में लिया. अदालत ने ये भी पूछा कि क्या एडमिशन हो गए हैं, इस पर जवाब दिया गया कि नहीं, अभी मेरिट लिस्ट बनी है. अदालत ने फिर इस पर कहा कि इसे रोकना पड़ेगा. ये गलत हो गया है.
इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच कर रही है. अदालत की सुनवाई के बाद ही राज्य सरकार ने काउंसलिंग के फैसले को स्थगित कर दिया.
हालांकि, सरकार ने इसके पीछे अपने आदेश में अपरिहार्य कारण का हवाला दिया है.

देशभर में इंस्टिट्यूशनल प्रेफरेंस का मॉडल वैध, फिर छत्तीसगढ़ में अवैध क्यों?
इस संबंध में जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का कहना है कि दिल्ली समेत देशभर में इंस्टिट्यूशनल प्रेफरेंस का मॉडल वैध है, लेकिन छत्तीसगढ़ में इसे अवैध बताकर नई व्यवस्था लागू कर दी गई, जिससे अब राज्य के अपने मेडिकल छात्रों के लिए सीटें कम हो जाएंगी और बाहरी उम्मीदवारों को ज्यादा अवसर मिलेगा.
संगठन के एक पदाधिकारी ने द वायर को बताया कि इस नई व्यवस्था के चलते छत्तीसगढ़ में जो दूसरे राज्यों से पीजी के लिए डॉक्टर आएंगे, उनके पास दोहरा मौका होगा. एक तो उन्होंने जिस राज्य से एमबीबीएस किया है, वहां वे स्थानीय कोटे में एडमिशन ले सकते हैं और दूसरा यहां ऑल इंडिया ओपन कोटा के तहत आने वाली 75 प्रतिशत सीटों पर भी. यानी उनके पास दो मौके. वहीं, यहां के छात्रों के पास केवल एक मौका वो भी 25 प्रतिशत के भीतर.’
रायपुर के एक सरकारी संस्थान से मेडिकल की पढ़ाई कर रहे अमित बताते हैं कि ये राज्य सरकार द्वारा मेडिकल छात्रों के लिए नई चुनौती खड़ी करने जैसा है. यहां छात्र पहले ही दो साल की बॉन्ड व्यवस्था और इसके एवेज में 25 लाख की गारंटी को लेकर परेशान हैं. वहीं अब सरकार सात-साढ़े सात साल की मेहनत के बाद पीजी में दाखिले का भी हक़ छीन रही है.
एक अन्य छात्र शिवम सिंह बताते हैं कि 75-25 का नियम अत्यंत अन्यायपूर्ण है और बिना आगे पढ़ने का पर्याप्त अवसर दिए ग्रामीण सेवा की शर्त थोपना, बंधुआ मजदूरी जैसी स्थिति की ओर धकेल रहा है.

मेडिकल छात्रों की उम्मीद
शिवम कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में प्राइवेट मेडिकल कॉलेज की पीजी फीस करीब 12-15 लाख सालाना है, वहीं सरकारी संस्थान में ये करीब 25 हज़ार सालाना है. ऐसे में एमबीबीएस छात्रों को उम्मीद रहती है कि इस कोटे के तहत उन्हें सरकारी संस्थान में दाखिला मिल जाएगा. और यही कारण है कि वे नक्सल प्रभावित इलाकों में भी सेवाएं देते हैं. कई बार बिना बिजली-पानी और टूटी-फूटी सड़क वाले इलाकों में बॉन्ड सेवा के तहत अपना काम करते हैं, क्योंकि उन्हें एक उम्मीद होती है. नए नियमों ने इन सब उम्मीदों पर पानी फेर दिया है.
कई छात्रों का ये भी कहना है कि बाहर के लोग सिर्फ अपना पीजी करने यहां आएंगे और इसके बाद विशेषज्ञता (specialization) लेकर यहां बिना किसी सेवा के अपने गृह राज्य वापस लौट जाएंगे, इससे यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी असर पड़ेगा. क्योंकि कम स्थानीय पीजी डॉक्टरों का होना सरकारी हेल्थ सिस्टम को पंगु बना सकता है.

वहीं, कई डॉक्टरों ने ज्यादा ओपन कोटे के चलते यहां के प्राइवेट कॉलेजों की भी आने वाले दिनों में फीस बढ़ने की आशंका जाहिर की है.
उनका कहना है कि देश के अन्य राज्यों के मुकाबले छत्तीसगढ़ के प्राइवेट कॉलेज की फीस भी सस्ती है. क्योंकि यहां मेट्रो सिटी की चकाचौंध और लाइफस्टाइल नहीं है, साथ ही लोगों की आमदनी भी सीमित है लेकिन अगर यहां ज्यादा बाहरी लोग आ गए तो सीटें खरीदी जाने लगेंगी, जिससे फीस में बढ़ोतरी देखी जा सकती है.
जूनियर डॉक्टरों और चिकित्सक संगठनोंं का कहना है कि यदि सरकार जल्द ही अपना नया नियम वापस नहीं लेती तो व्यापक स्तर पर आंदोलन किए जाएंगे क्योंकि ये मुद्दा सिर्फ उनका नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था के भविष्य से जुड़ा हुआ है.
उल्लेखनीय है कि संशोधित नियम का विरोध करने के लिए छत्तीसगढ़ डॉक्टर्स फेडरेशन, जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन, रेगुलर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन और छत्तीसगढ़ इनसर्विस डॉक्टर्स एसोसिएशन जैसे सभी प्रमुख संगठन एकजुट हैं. इन सभी संगठनों का कहना है कि यह बदलाव राज्य के छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है.
पक्ष-विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप
गौरतलब है कि इस मामले ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है. इस मुद्दे का असर विधानसभा के शीतकालीन सत्र में देखे जाने की संभावना है. इस संबंध में नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को पत्र लिखकर छात्रों के हित में नया आदेश वापस लेने की मांग की है. उन्होंने इस नियम को स्थानीय छात्रों के खिलाफ बताते हुए पुरानी व्यवस्था को फिर से लागू करने की बात कही है.
इस पत्र पर प्रतिक्रिया देते हुए स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने कहा कि कांग्रेस नेताओं की पत्र लिखने की पुरानी परंपरा है. सरकार ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और फैसले तक काउंसलिंग पर रोक लगाई गई है. उम्मीद है कि राज्य का 50 प्रतिशत कोटा पूरी तरह वापस मिलेगा.
हालांकि, चिकित्सा संगठनों का कहना है कि ये विडंबना ही है कि सरकार ने ही इस नियम को लागू करने से पहले कोई कदम नहीं उठाया. न ही हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. अब जब विवाद ने तूल पकड़ लिया, तो सरकार छात्रहितैषी होने का दावा कर रही है.
