नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (15 दिसंबर) को ‘द हिंदू’ के पत्रकार महेश लांगा को अंतरिम जमानत दी है. लांगा को पिछले साल अक्टूबर में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया गया था.
लांगा 14 महीने से ज़्यादा समय से साबरमती जेल में बंद हैं.
जमानत की शर्त के तौर पर देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने लांगा को उनके खिलाफ लगे आरोपों से जुड़े कोई भी लेख लिखने से रोक लगाई है. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक स्पेशल कोर्ट को बाकी नौ गवाहों के बयान दर्ज करने के लिए रोज़ाना सुनवाई करने का भी निर्देश दिया है. लांगा को कार्यवाही में पूरा सहयोग करने और इस आधार पर कोई स्थगन न मांगने का आदेश दिया गया है कि मामले को रद्द करने की उनकी याचिका लंबित है.
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को इन निर्देशों के पालन पर एक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है. मामले की अगली सुनवाई 6 जनवरी को होगी.
ज्ञात हो कि लांगा को पिछले साल गुजरात पुलिस ने कथित जीएसटी धोखाधड़ी के आरोपों से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार किया था और बाद में उन पर कई मामले दर्ज किए गए. बाद में ईडी ने उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत केस दर्ज किया था.
लांगा की याचिका का विरोध करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आरोप लगाया कि लांगा ने, यह दावा करते हुए कि अगर भुगतान नहीं किया गया तो आपत्तिजनक सामग्री प्रकाशित की जाएगी धन उगाही की थी. मेहता ने कोर्ट से कहा, ‘एक पत्रकार वसूली करते हुए पाया गया है… हम एक अतिरिक्त आरोप दाखिल करना चाहते हैं.’
लांगा की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस कदम पर आपत्ति जताते हुए कहा कि ईडी अपना रुख बदलना चाह रही है. उन्होंने तर्क दिया कि ’68 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी’ के आरोप बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए हैं. उन्होंने यह जोड़ा कि ‘यह राशि 68 लाख रुपये भी नहीं है.’
सिब्बल ने आगे कहा कि पीएमएलए केस का आधार बनने वाले मूल अपराध में कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है. उन्होंने गवाहों को प्रभावित करने के आरोपों को ‘हैरान करने वाला’ बताते हुए अपने मुवक्किल की तरफ से कहा, ‘मैं अक्टूबर 2024 से हिरासत में हूं. किस अपराध के लिए? यह हत्या का मामला नहीं है.’
सिब्बल ने यह भी आरोप लगाया कि बचाव पक्ष को महत्वपूर्ण दस्तावेज नहीं दिए गए हैं. उनका कहना था कि कोई सप्लीमेंट्री शिकायत नहीं थी और अभियोजन पक्ष ‘अपनी मनमर्जी से नहीं चल सकता.’
इसके बाद अदालत ने इस पहलू को मद्देनजर रखते हुए कि सिर्फ़ नौ गवाहों से पूछताछ बाकी है, लांगा को अंतरिम ज़मानत दे दी.
आदेश के बाद संक्षिप्त बातचीत के दौरान सॉलिसिटर मेहता ने जबरन वसूली के आरोप को दोहराया, जिस पर सिब्बल ने जवाब देते हुए कहा कि उद्योगपति पत्रकारों को निशाना बना रहे हैं. जिस पर मेहता ने किसी भी राजनीतिक मकसद से इनकार किया, और कहा कि अभियोजन पक्ष पूरी तरह पेशेवर तरीके से काम कर रहा है.
जब यह बहस बढ़ी, तो सीजेआई ने दखल देते हुए इस बात पर ज़ोर दिया कि ट्रायल में देरी नहीं होनी चाहिए, साथ ही लांगा को पत्रकार के तौर पर अपने पद का गलत इस्तेमाल न करने की चेतावनी दी. सिब्बल ने जवाब दिया कि ऐसा कोई भी उल्लंघन ज़मानत रद्द करने का आधार होगा.
इससे पहले गुजरात हाईकोर्ट ने लांगा को ज़मानत देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे.
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