नई दिल्ली: अरावली के लिए एक समान नई परिभाषा को स्वीकार करने संबंधी अपने ही 20 नवंबर के फैसले को रोकने के सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश को ‘बहुत ज़रूरी और स्वागत योग्य’ बताते हुए वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि शीर्ष अदालत को ऐसे तीन अन्य पर्यावरणीय मुद्दों पर भी स्वतः संज्ञान लेना चाहिए, जैसे उसने अरावली के मामले में किया.
मंगलवार (30 दिसंबर) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में रमेश ने कहा कि 6 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार और भारत सरकार के सरिस्का टाइगर रिज़र्व की सीमाओं को दोबारा तय करने के प्रस्ताव पर रोक लगा दी थी – इसके तहत लगभग 57 बंद खदानों को खोलने का रास्ता बनाया जा रहा था. इस प्रस्ताव को साफ तौर से खारिज कर देना चाहिए.
पिछले वर्ष 5 अगस्त को नागरिकों और पर्यावरण संगठनों ने अदालत में एक याचिका दायर की थी, जिसमें यह चिंता जताई गई थी कि राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (एनबीडब्ल्यूएल) ने राजस्थान सरकार के उस प्रस्ताव को मंजूरी कैसे दे दी, जिसमें सरिस्का टाइगर रिज़र्व के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (सीटीएच) को 881 वर्ग किमी से बढ़ाकर 924 वर्ग किमी करने और बफ़र ज़ोन को 245 वर्ग किमी से घटाकर 203 वर्ग किमी करने की बात कही गई थी.
उनका कहना था कि इससे लगभग 50 संगमरमर और डोलोमाइट खदानों को दोबारा चालू करने का रास्ता बन सकता है, जिन्हें पहले सुप्रीम कोर्ट के 2024 के आदेश से बंद कराया गया था. 6 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई की और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण तथा एनबीडब्ल्यूएल की स्थायी समिति दोनों को इस मामले में जल्दबाज़ी दिखाने पर कड़ी फटकार लगाई थी.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल सितंबर में कोर्ट ने आदेश दिया कि टाइगर रिजर्व की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने के प्रस्ताव पर कोई भी अंतिम फैसला लेने से पहले सार्वजनिक परामर्श किया जाना चाहिए. अदालत ने कहा था कि क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट और अभयारण्य दोनों के संबंध में आपत्तियां मांगी जाएंगी.
जयराम रमेश ने कहा कि दूसरा मुद्दा जिस पर कोर्ट को ध्यान देना चाहिए, वह है पूर्व में पर्यावरण मंज़ूरी देने की अनुमति देने वाले अपने फैसले की समीक्षा करना. 8 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही 16 मई 2025 के उस फैसले की समीक्षा का दरवाज़ा खोल दिया था, जिसमें पूर्व प्रभाव से दी जाने वाली पर्यावरणीय मंज़ूरियां (retrospective environmental approvals) पर रोक लगाई गई थी.
जनवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2021 और जनवरी 2022 के केंद्र सरकार के दो आदेशों पर रोक लगा दी थी, जिनमें 2006 के पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) नोटिफिकेशन के तहत अनिवार्य पूर्व पर्यावरण मंज़ूरी के बिना अलग-अलग सेक्टर के प्रोजेक्ट्स को बाद में पर्यावरण मंज़ूरी दी गई थी. मई में अदालत ने कहा था कि ऐसी पूर्व प्रभाव से स्वीकृतियां देना ‘गंभीर गैर-कानूनी‘ है. लेकिन नवंबर के एक अन्य फैसले में अदालत ने इस निर्णय को पलट दिया और कहा कि पूर्व प्रभाव से मंजूरी न देना ‘पैसे की बर्बादी’ होगी और देश भर की कई सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए समस्या पैदा करेगा.
रमेश ने अपनी 30 दिसंबर की पोस्ट में कहा, ‘ऐसी मंज़ूरियां न्यायशास्त्र की बुनियाद के विरुद्ध हैं और शासन व्यवस्था का उपहास बनाती हैं. इस फैसले की समीक्षा अनावश्यक थी. पूर्व प्रभाव से मंज़ूरी कभी भी नहीं दी जानी चाहिए. क़ानूनों, नियमों और प्रावधानों को अक्सर जानबूझकर इस भरोसे के साथ दरकिनार किया जाता है कि परियोजना शुरू हो जाने के बाद निर्णय प्रक्रिया को ‘मैनेज’ कर लिया जाएगा.’
कांस्टिट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप – पूर्व सिविल सेवा अधिकारियों का एक समूह – ने 28 दिसंबर को मुख्य न्यायाधीश को लिखे खुले पत्र में भी इसी मुद्दे को उठाया था.
रमेश के अनुसार तीसरा मुद्दा, जिस पर सुप्रीम कोर्ट को ध्यान देना चाहिए, वह है राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की शक्तियों को मज़बूत करना.
उन्होंने लिखा, ‘राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) को अक्टूबर 2010 में संसद के एक अधिनियम द्वारा विस्तृत विचार-विमर्श और सुप्रीम कोर्ट के पूर्ण समर्थन के बाद स्थापित किया गया था. पिछले एक दशक में इसकी शक्तियां काफी हद तक कमज़ोर कर दी गई हैं. अब सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप आवश्यक है, ताकि एनजीटी कानून के अनुसार बिना किसी भय या पक्षपात के काम कर सके.’
उदाहरण के लिए 2017 में नरेंद्र मोदी सरकार ने वित्त अधिनियम 2017 पारित किया, जिसके तहत एनजीटी सहित कई न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया में बड़े बदलाव किए गए. कार्यकर्ताओं और पर्यावरण वकीलों का कहना है कि इससे एनजीटी की ‘स्वतंत्रता और प्रभावशीलता’ पर असर पड़ा है.
