28 फरवरी, 2015 को संसद में प्रधानमंत्री मोदी ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम को पिछली सरकारों की नाकामियों का ‘जीवित स्मारक’ कहकर ख़ारिज कर दिया था. उन्होंने कहा था कि इसने लाखों ग़रीब लोगों को ‘गड्ढे खोदकर’ जीने के लिए मजबूर कर दिया है.
अपने खास व्यंग्यात्मक अंदाज़ में मोदी ने घोषणा की थी, ‘मेरा राजनीतिक विवेक कहता है कि मनरेगा को कभी ख़त्म न करें… क्योंकि हम चाहते हैं कि लोगों को पता चले कि ये खंडहर किसने छोड़े हैं… इतने सालों बाद भी आपको गड्ढे खोदने के लिए किसने मजबूर किया.’
इसके लगभग एक दशक बाद तक यह कार्यक्रम चलता रहा, हालांकि इसकी स्थिति अच्छी नहीं थी, बजट कम था, मज़दूरी का भुगतान महीनों, यहां तक कि सालों की देरी से होता था. केंद्र सरकार ने कभी यह स्वीकार नहीं किया कि रोज़गार की गारंटी इस क़ानून की आत्मा है. यह कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं था जिसे कार्यपालिका अपनी मर्ज़ी से वापस ले सकती थी और बजट देने से मना कर सकती थी.
यह क़ानूनन अनिवार्य था. फिर भी, अब तक प्रधानमंत्री 2015 में संसद में दिए गए अपने आश्वासन पर क़ायम रहे. कार्यक्रम और उसे संचालित करने वाले क़ानून को कमज़ोर किया गया, लेकिन निरस्त नहीं किया गया.
प्रधानमंत्री यह मानने को तैयार नहीं होंगे, लेकिन सच तो यह है कि मनरेगा और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून की वजह से सख़्त कोविड लॉकडाउन के दौरान लाखों लोग भुखमरी जैसी स्थिति में जाने से बच पाए. वह यह भी नहीं मानेंगे कि दुनिया भर की सरकारों और कामकाजी लोगों ने इस अनोखे क़ानून की तारीफ़ की.
काम के अधिकार की गारंटी
उत्तरी गोलार्ध के देशों में काम के अधिकार को मान्यता देने का मतलब उन लोगों को बेरोज़गारी भत्ता देना था जो काम नहीं ढूंढ पा रहे थे. सिर्फ़ भारत ने काम के अधिकार की गारंटी देने का एक बिल्कुल अलग रास्ता दिखाया. यहां बेरोज़गारों को भत्ता नहीं, बल्कि रोज़गार देकर इस लक्ष्य को पूरा किया गया. इस तरह भारत ने इस क़ानून के ज़रिये मानवीय गरिमा की रक्षा करते हुए सम्मानजनक तरीक़े से बेरोज़गारों को भूख और गरिमा से बचाने के रास्ते दिखाया.
हालांकि, मोदी सरकार ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में, बिना किसी पूर्व चेतावनी के, बिना किसी सार्वजनिक चर्चा के, संसद में सिर्फ़ दो दिनों की सरसरी बहस के बाद, मनरेगा क़ानून को अचानक ख़त्म कर दिया गया. गारंटी ख़त्म कर दी गई; इसके बजाय अब यह कार्यक्रम केंद्र सरकार द्वारा चुने गए इलाक़ों में चलेगा.
जीवन के मौलिक संवैधानिक अधिकार के तहत मिलने वाले काम के अधिकार को केंद्र सरकार के द्वारा की जाने वाली अनिश्चित मेहरबानी तक सीमित कर दिया गया.
खेती के महीनों में यह कार्यक्रम नहीं चलेगा, जिससे खेत मज़दूरों की अपने मालिकों के साथ मोलभाव करने की उनकी वह ताक़त छीन ली गई जो लगभग एक दशक पहले उन्हें पहली बार मिली थी. और राज्य सरकारों का योगदान 10% से बढ़ाकर 40% कर दिया गया.
ज़्यादातर राज्य सरकारों की बदहाल आर्थिक स्थिति को देखते हुए, यह कार्यक्रम ख़ासकर बिहार, झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे ग़रीब राज्यों में लगभग ख़त्म हो जाएगा, जहां यह कार्यक्रम भारत के सबसे ग़रीब लोगों के लिए जीने का सहारा था.
मनरेगा कार्यस्थल पर ख़ुद काम करने का अनोखा अनुभव
जब संसद ने एक ऐसा क़ानून ख़त्म कर दिया जो दस साल से ज़्यादा समय तक मज़दूरी करने वाले लोगों के संघर्षों का नतीजा था, तो मुझे उस समय की याद आ गई जब मुझे एक दिन मनरेगा कार्यस्थल पर ख़ुद काम करने का अनोखा अनुभव मिला था.
उन कुछ घंटों ने मुझे यह समझने में मदद की कि दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम उन लाखों लोगों के लिए असल में क्या मायने रखता है, जो इसके अंतर्गत मेहनत से काम करते हैं, यह बात मैं ढेर सारी किताबें पढ़कर (या एक ज़िला प्रशासक के तौर पर निरीक्षण करके) भी नहीं समझ पाता. इसलिए मैंने अपने उन अनुभवों को फिर एकत्रित किया, जिन्हें मैं यहां आपके साथ साझा कर रहा हूं.
मज़दूर किसान शक्ति संगठन के दोस्तों ने राजस्थान के राजसमंद ज़िले में अरावली रेंज से सटे रेगिस्तानी मैदानों में स्कूल फॉर डेमोक्रेसी के नाम से एक शानदार स्कूल बनाया है.
इस स्कूल में, मैं अपने साथ अमन बिरादरी के 60 सदस्यों की एक टीम को लोकतंत्र पर एक हफ़्ते के विचार-विमर्श के लिए ले गया था, जिसमें शांति और न्याय कार्यकर्ताओं तथा बेघर लोगों के अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता शामिल थे. मज़दूर किसान शक्ति संगठन के साथियों को लगा कि मनरेगा कार्यस्थल पर एक दिन शारीरिक श्रम करने से हमें क्लासरूम लेक्चर से कई गुना ज़्यादा सीखने को मिलेगा. वे सही थे.
ठीक से पता नहीं था कि हमें क्या करना है. वह बसंत की एक सुहानी-सी सुबह थी जब हम अनमने ढंग से अपनी बस से उतरे, और हम जल्दी ही पांच-पांच लोगों की एक टीम में बंट गए. ‘काम के साथी’ ने हमें काम समझाया: एक छोटे सिंचाई टैंक के वास्ते तटबंध बनाने के लिए मिट्टी खोदना.
हर टीम को कुछ स्क्वायर-मीटर ज़मीन दी गई, जहां से उन्हें मिट्टी खोदकर तटबंध की दीवार तक ले जानी थी. हमें मिट्टी खोदने के लिए फावड़े और सिर पर मिट्टी ले जाने के लिए तसले गिए गए. हमें नाप के नियम के बारे में भी बताया गया.
हमें चार घंटे या आधे दिन काम करेना होगा, लेकिन हमें आधे दिन की मज़दूरी तभी मिलेगी जब हम कम से कम तय काम पूरा करेंगे. ये मज़दूरी नियमित मनरेगा मज़दूरों के बैंक खाते में दिया जाना था, जिनमें ज़्यादातर महिलाएं थीं, जो आस-पास के टीलों पर बैठकर हमें काम करते हुए हैरानी से देख रही थीं.
मेरी टीम में हैदराबाद के बेघर पुरुष और महिलाएं थीं, जो हमारे शेल्टर में रहते थे. ये सभी पहले बेघर थे और अब दूसरे बेघर लोगों के साथ वॉलंटियर बन गए थे. हमारी टीम के सदस्यों ने काम को आपस में बांट लिया. जवान लड़के मिट्टी खोदते थे, और मेरी उम्र का लिहाज़ करते हुए खोदी हुई मिट्टी को सिर पर ले जाने का अपेक्षाकृत कम थकाने वाला काम मुझे दिया गया.
पहले पंद्रह मिनट मज़ेदार थे, आस-पास के टीम के बीच हंसी-मज़ाक़ चल रहा था. लेकिन जल्द ही शारीरिक मेहनत का असर दिखने लगा क्योंकि किसी को इसकी आदत नहीं थी. मैंने पहले कभी अपने सिर पर भारी वज़न नहीं उठाया था, भारी वज़न उठाने से मेरे सिर में दर्द हो रहा था.
बसंत की हल्की धूप खिली हुई थी, लेकिन फिर भी जैसे-जैसे पसीना आने लगा, धूप चुभने लगी. चट्टानी ज़मीन खोद रहा मेरी टीम का एक नौजवान अचानक बेहोश हो गया. हम उसे छांव में ले गए, और नियमित काम करने वाली महिला मज़दूरों ने उसे होश में लाने में मदद की. वह शर्मिंदा था, लेकिन सबने मिलकर उसे हिम्मत दी. एक मज़दूर ने मिट्टी के घड़े से पानी पिलाया. बहुत से लोगों ने ख़ुशी-ख़ुशी ख़ूब सारा पानी पिया और पसीने से तर अपने चेहरे को धोया.
कम पैसे कमाने में ज्यादा मेहनत
चार घंटे ऐसे बीते जैसे वे कभी ख़त्म नहीं होंगे. जब हमारे लिए तय किया गया आधे दिन का काम ख़त्म हुआ तो सबको राहत मिली. हमने आराम किया, और फिर जानना चाहा कि हमारे काम से कितनी कमाई हुई. ज़मीन की पैमाइश के बाद हमें पता चला कि हमारी टीम के सदस्यों में हर किसी ने 80 रुपये से भी कम कमाए थे.
इतने कम पैसे कमाने में कितनी मेहनत लगती है, यह देखकर हम हैरान भी हुए और विनम्र भी. लेकिन साथ ही एक अजीब-से गर्व, उपलब्धि और सम्मान का एहसास भी था.
एक युवा साथी ने हैरानी के साथ कहा, ‘कोई इसे ‘बिना हुनर वाला काम’ कैसे कह सकता है?’ इसके लिए टीम वर्क, प्लानिंग और सावधानी से रणनीति बनाने की ज़रूरत होती है. दूसरे लोगों ने टीम में काम करने से बनी एकजुटता के बारे में बात की, कि कैसे हमने जल्दी ही अपनी-अपनी क्षमता का फ़ायदा उठाना सीखा, साथ ही अपनी कमज़ोरियों को भी दूर किया.
फिर हम कुछ देर घने पेड़ों की छांव में नियमित मज़दूरों के साथ बैठे, जिनमें ज़्यादातर औरतें थीं, और कई अपने छोटे बच्चों को साथ लाई थीं. हमने उन्हें बताया कि हम कौन हैं, हम सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों, भूख और बेघर सड़क पर रहने वाले लोगों के साथ काम करते हैं. फिर हमने उनसे पूछा कि वे मनरेगा कार्यस्थल पर किए जाने वाले काम के बारे में क्या सोचते हैं.
उनका मूल्यांकन प्रधानमंत्री के मूल्यांकन से बिल्कुल अलग था. उन्होंने शिकायत की कि मज़दूरी मिलने में बहुत देरी होती है, कभी-कभी हाज़िरी रजिस्टर में गड़बड़ी की जाती है, और ज़्यादातर पंचायतें उन्हें 100 दिनों का पूरा काम नहीं देतीं. लेकिन किसी ने भी काम को बेकार नहीं माना; इसके बजाय, उन्होंने गांव के आधारभूत ढांचे को धीरे-धीरे निर्मित करने में अपने सामूहिक योगदान पर गर्व से बात की.
बहुत ज़रूरी टैंक, कुएं, स्कूल और गांव की सड़कें बनाईं. अपनी ज़मीनों को बेहतर बनाने और पानी बचाने का काम किया. अगर खेती के काम में उन्हें कम पैसे मिलते थे तो उन्होंने खेती के काम का विकल्प खोजा, जिससे उनकी किसी पीढ़ी को पहली बार अपने से ऊंची जाति के ज़मींदारों के साथ मोलभाव करने का मौक़ा मिला.
पहली बार भूमिहीन महिलाओं के हाथों में पैसा आया जिसे उन्होंने बचाया और खाने, अपने बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य इमरजेंसी पर ख़र्च किया. और सबसे बढ़कर, उन्हें भूख का एक सम्मानजनक विकल्प खोजने, अपने बच्चों के लिए बेहतर ज़िंदगी तलाशने, क़र्ज़ से तथा दूर दराज़ के इलाक़ों में मुश्किल और अकेलेपन वाले पलायन से ख़ुद का बचाव करने का मौक़ा मिला.
तब मुझे इसकी ज़रूरत महसूस हुई थी – और अब तो और भी ज़्यादा होती है – कि अगर हर सांसद को मनरेगा कार्यस्थल पर कुछ घंटे काम करने के लिए कहा जाए, तो शायद यह काम बेकार गड्ढे खोदना और सरकारी नाकामी की निशानी जैसा नहीं लगेगा.
वे इसे सरकारी संसाधनों की बर्बादी के एक और उदाहरण के रूप में नहीं देख पाएंगे. इसके बजाय, शायद वे इसे लाखों ग़रीब और मज़बूत लोगों के लिए सम्मानजनक जीवन जीने का एक क़ीमती ज़रिया मानेंगे, जो पूरी दुनिया में अपने तरह की अनोखी पहल है.
(लेखक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.)
