नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 2006 की लिंगदोह समिति की रिपोर्ट को लागू करने की मांग करने वाली एक याचिका को खारिज कर दिया. यह रिपोर्ट देशभर के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनावों के लिए नियामक ढांचा तय करती है.
शीर्ष अदालत के निर्देश पर केंद्र सरकार ने लिंगदोह समिति का गठन किया था. समिति की रिपोर्ट का उद्देश्य कैंपस राजनीति से ‘धन और बाहुबल’ को खत्म करना और साथ ही शैक्षणिक मानकों को बनाए रखना था.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने शिव कुमार त्रिपाठी द्वारा दायर याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा कि इसमें कोई दम नहीं है.
संक्षिप्त सुनवाई के दौरान त्रिपाठी की ओर से पेश वकील ने कहा कि यह याचिका कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्र संगठनों के लिए निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने हेतु समिति की रिपोर्ट को लागू कराने की मांग करती है.
मुख्य न्यायाधीश ने इस याचिका को ‘पब्लिसिटी के लिए दायर याचिका’ बताया. वकील की बात सुनने के बाद याचिका खारिज करते हुए सीजेआई ने कहा, ‘आप बस बाहर जाकर दूसरों (मीडिया) को संबोधित करना चाहते हैं. सिर्फ पब्लिसिटी के लिए है.’
ज्ञात हो कि लिंगदोह समिति का गठन 2005 में छात्र राजनीति में सुधार के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर किया गया था. समिति ने अपनी रिपोर्ट 2006 में सौंपी, जिसे शीर्ष अदालत ने स्वीकार करते हुए देशभर के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के लिए अनिवार्य कर दिया. इस समिति ने छात्र संघ चुनावों में अपराधीकरण और अत्यधिक खर्च पर अंकुश लगाने के लिए व्यापक सुधारों का प्रस्ताव रखा था, साथ ही शैक्षणिक वातावरण की रक्षा पर भी जोर दिया.
समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्नातक (अंडरग्रेजुएट) छात्रों के लिए कॉलेज चुनाव लड़ने की आयु सीमा 17 से 22 वर्ष तय की थी.
वहीं, स्नातकोत्तर (पोस्टग्रेजुएट) छात्रों के लिए विश्वविद्यालय चुनावों में उम्मीदवार बनने की आयु सीमा 24 से 25 वर्ष निर्धारित की गई थी. इसके अलावा, समिति ने ऐसे चुनावों के लिए अन्य नियामक उपाय भी सुझाए थे.
यह रिपोर्ट बार-बार कानूनी और राजनीतिक बहस का विषय रही है, जिसमें अलग-अलग राज्यों में छात्र संगठन या तो इसे सख्ती से लागू करने की मांग कर रहे हैं या इसकी व्यावहारिकता पर सवाल उठा रहे हैं.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले इसे लागू करने का निर्देश दिया था, लेकिन मौजूदा याचिका में गाइडलाइंस के लगातार उल्लंघन का दावा करते हुए इसे फिर से लागू करने की मांग की गई थी.
