हिंदी का विश्व: साहित्य, अनुवाद और वैश्विक पहचान का जायज़ा

अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस पर देश के प्रमुख साहित्यकारों से बातचीत के ज़रिये यह पड़ताल की गई कि वर्तमान में हिंदी की स्थिति क्या है, अनुवाद की भूमिका कितनी निर्णायक है और हिंदी किस हद तक वैश्विक भाषा के रूप में उभर पाई है. उनके विचार हिंदी की चुनौतियों और संभावनाओं की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं.

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हिंदी की स्थिति आज एक विचित्र द्वंद्व से घिरी हुई है. वह अभी तक ढंग से अखिल भारतीय भाषा नहीं बन पाई है, न प्रशासनिक अर्थों में, न ही सांस्कृतिक स्वीकृति के सर्वमान्य स्तर पर. ऐसे में उसके ‘वैश्विक भाषा’ बनने की आकांक्षा पहली नज़र में विरोधाभासी प्रतीत होती है.(फोटो साभार: FreePik)

अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस के अवसर पर हिंदी की समकालीन स्थिति और वैश्विक यात्रा पर ठहरकर विचार करना ज़रूरी हो जाता है. आज जब हिंदी दुनिया की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में शामिल है, तब सवाल केवल उसके विस्तार का नहीं, बल्कि उसके साहित्यिक स्वरूप, मौलिकता और संवाद की क्षमता का भी है.

क्या हिंदी में आज नए अनुभवों, नए विषयों और नए सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्त किया जा रहा है? अनुवाद की भूमिका इसमें कितनी महत्वपूर्ण है और हिंदी अन्य भाषाओं से किस तरह का साहित्यिक संवाद बना पा रही है? साथ ही, यह भी समझना आवश्यक है कि हिंदी वैश्विक मंच पर किस हद तक एक प्रभावी भाषा के रूप में उभरी है.

इन्हीं सवालों को केंद्र में रखते हुए हमने अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस पर देश के जाने-माने साहित्यकारों से बात की और उनसे तीन मूल प्रश्न पूछे. उनके जवाब आज हिंदी की स्थिति, उसकी चुनौतियों और संभावनाओं पर एक व्यापक दृष्टि प्रदान करते हैं.

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वर्तमान में हिंदी भाषा में साहित्य लेखन की स्थिति कैसी है? क्या आज हिंदी में मौलिक और नवीन विषयों पर लिखा जा रहा?

उदयन वाजपेयी (कवि-कथाकार और ‘समास’ पत्रिका के संपादक)

उदयन वाजपेयी (फोटो साभार: स्पेशल अरेंजमेंट)

हिंदी भाषा में कितने विविध विषयों पर लिखा जा रहा है, तो बहुत विषयों पर नहीं भी लिखा जा रहा है. हिंदी साहित्य के इतर भी अनेक विषयों पर, जैसे दर्शन पर, समाजशास्त्र पर, मनोविज्ञान पर भी हिंदी में स्तरीय और अच्छा कुछ लोग लिखें, इसके लिए हम अपनी पत्रिका समास में प्रयास करते हैं. कुछ और पत्रिकाएं भी इस दृष्टि से कोशिश कर रही हैं. हमारा असल में दुर्भाग्य यही है कि हिंदी साहित्य में जिस प्रकार की आलोचनाएं होती हैं, वो खुद भी इतनी समाजशास्त्रीय हो जाती हैं कि अलग से समाजशास्त्र की ज़रूत नहीं पड़ती.

लेकिन धीरे-धीरे हिंदी में ये संभावना बढ़ेगी कि हिंदी में लोग अन्य विषयों पर लिखने का प्रयास करेंगे, जैसे मलयालम में भी हुआ है, हिंदी में भी निश्चय ही इसकी संभावना बढ़ गई है.

अरुण देव (लेखक, वेब पत्रिका ‘समालोचन’ के संपादक)

अरुण देव (फोटो साभार: स्पेशल अरेंजमेंट)

वर्तमान समय में हिंदी साहित्य अपनी जटिलताओं और अंतर्विरोधों के बावजूद एक संभावनाशील परिदृश्य प्रस्तुत करता है. रचनात्मक लेखन के साथ-साथ कथेतर साहित्य का एक व्यापक और सजग पाठक-वर्ग विकसित हुआ है. कला, विचार, इतिहास और समाज-विज्ञान से जुड़ी पुस्तकों में बढ़ती रुचि इस बात का संकेत है कि हिंदी अब केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति की भाषा नहीं रही, बल्कि वैचारिक हस्तक्षेप की भी एक सशक्त माध्यम बन रही है.

हाल के वर्षों में हिंदी साहित्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय मान्यता मिली है. विनोद कुमार शुक्ल को 2023 में मिला ‘पेन-नाबोकोव अवॉर्ड फॉर अचीवमेंट इन इंटरनेशनल लिटरेचर’ इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है. इसी क्रम में गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत-समाधि’, उसके अंग्रेज़ी अनुवाद ‘टूम ऑफ सैंड’ और अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार ने हिंदी साहित्य को वैश्विक परिदृश्य में दृश्यमान किया. यह तथ्य विशेष महत्व रखता है कि रवीन्द्रनाथ टैगोर के 1913 के नोबेल पुरस्कार के बाद किसी भारतीय भाषा के लेखक को इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक स्वीकृति नहीं मिली थी. कविता, कहानी और उपन्यास तीनों विधाओं में कई पीढ़ियां एक साथ सक्रिय हैं. आलोचना और विचार के क्षेत्र में मौलिक तथा अनूदित-दोनों तरह की महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं.

कुल मिलाकर, साहित्य के साथ-साथ कला, विचार और समाज से जुड़ी पुस्तकों ने हिंदी के सार्वजनिक चेहरे को बदला है. नई पीढ़ी, विशेषकर जेन-ज़ी—इस बहुविध पाठ में अपनी पसंद और सवाल तलाश रही है. इसके समानांतर, क्षेत्रीय भाषाओं में भी उल्लेखनीय साहित्यिक गतिविधियां अनवरत हैं, जो भारतीय साहित्य के समग्र परिदृश्य को जीवंत और संवादधर्मी बनाती हैं.

हिंदी और उसके साहित्य का अनुवाद कितना हो रहा है, क्या हिंदी भारत की अन्य भाषाओं में या दक्षिण एशिया या वैश्विक स्तर की भाषाओं में अनूदित हो रही है और अन्य भाषाओं के साहित्य के हिंदी में अनुवाद की स्थिति क्या है?

उदयन वाजपेयी: मैं पूरे हिंदी साहित्य के सिंहावलोकन से तो नहीं बता सकता पर अपनी किताबों के हवाले से अगर बात करूं तो, कह सकता हूं कि अनुवाद की स्थिति बेहतर हुई है. प्रायः अपनी रचनाओं का विदेशी भाषाओं में अनुवाद लाने में हिंदी के प्रकाशकों की कोई भूमिका नहीं होती. लेखक भी प्रायः अपनी तरफ़ से नहीं कराते.

मेरी अपनी किताब क़यास का ब्लूम्सबेरी ने अंग्रेजी अनुवाद ‘लव इज़ पार्टिसिपेशन इन इटर्निटी’, शीर्षक से हाल ही में प्रकाशित किया है. मेरी कविताओं का भी फ़्रेंच, पोलिश, स्वीडिश और अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है. इससे एक वृहत्तर बात जो स्थापित होती है वह यह कि साहित्य मनुष्य की संवेदनाओं को जागृत करने का काम करता है जहां फिर देश और भाषा की सीमाएं सब अदृश्य हो जाती हैं. क्योंकि अगर आप मनुष्य हैं, तो संवेदना तो आपकी जीवन का आप चाहें ना चाहें अंग है ही. आप कितने ही कठोर क्यों न बन जाएं, लेकिन अंततः करुणा, प्रेम, लगाव, यह सब तो आपके अंदर आता ही है. यह ही तो मानवीय अस्तित्व का लक्षण है.

बहरहाल, हिंदी या हिंदी की जो किताबें हैं, उनमें से काफी सारी किताबें अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं में भी आपको मिलेंगी. निर्मल वर्मा के उपन्यास अंग्रेजी, फ्रेंच और जर्मन में भी मिलेंगे. यही बात कृष्ण बलदेव वैद के लिए भी मिलेगी. कई हमारे समकालीन लेखकों की भी किताबें अंग्रेजी में तो निश्चय ही हैं, अन्य भारतीय भाषाओं में भी, अन्य विदेशी भाषाओं में भी आपको मिल जाएंगी. और अनुवाद हैं तो इसका मतलब तो यह है कि लोग पढ़ते हैं, इसलिए इनके अनुवाद हुए हैं.

हिंदी साहित्य में दुनिया के प्रकाशकों की और प्रकाशकों के रास्ते पाठकों की रुचि तो अवश्य बढ़ी है, इसमें कोई शक़ नहीं है. काफी सारी किताबों के या कृतियों के अनुवाद विदेशी भाषाओं में, विदेशी लोगों की इच्छा के कारण हुए हैं. हालांकि हमारी सरकारों ने इसमें कोई मदद नहीं की. उदाहरण के लिए जैसे चीन में, चीन के लेखकों के अनुवाद दूसरी भाषाओं में हों, इसमें दूसरी भाषाओं के लोगों ने या प्रकाशकों ने जितनी रुचि ली, उससे ज़्यादा रुचि चीन की सरकार ने ली. क्योंकि साहित्य जो है, वह कमोडिटी (उपभोग की वस्तु) तो है नहीं.

पूरी दुनिया में लोग साहित्य इसीलिए पढ़ते हैं ताकि उनको अपनी एकवचनात्मकता का, अपने अद्वितीय होने का बोध हो. इसके लिए तो सरकार को कलाओं को, साहित्य को संरक्षण देना चाहिए और वह संरक्षण, वह पैसा वह कोई अपनी तरफ़ से तो दे नहीं रहे हैं. यह तो उस समाज का पैसा है जो उसने सरकार को सौंपा है कि इसका एक हिस्सा वह संस्कृति-कलाओं के संरक्षण पर भी लगाए. और यह तो कोई नई बात नहीं है. सभ्यताएं जब से बनी हैं तब से ऐसा होता आया है.

लेकिन हमारे यहां सरकारों ने इसमें रुचि नहीं ली. जो पिछली सरकारें थी उनमें थोड़ी रुचि अधिक थी, हालांकि ये मैं नहीं कहूंगा कि बड़ी गहरी रुचि थी लेकिन कुछ-एक अफसर वग़ैरह अगर बड़े मंत्रालयों में रहे तो उन्होंने कलाओं में फिर भी थोड़ा चाव लिया, पर आज तो ऐसे अफ़सर भी नहीं हैं जो साहित्य और कलाओं के लिए कोई प्रयास करे. हमारे यहां ऐसे इम्तिहानों से चुनकर जो अफ़सर आते हैं वह अपनी स्वार्थसिद्धि की रेस में कलाओं में क्या ही रुचि लेंगे.

हमारे समय का यह दुर्भाग्य है कि किसी लेखक ने अगर कोई नई पुस्तक लिखी है, या किसी पेंटर ने कोई बड़ी तस्वीर बनायी है, या कोई प्रदर्शनी लगी हो, उसकी कभी कोई हेडलाइन नहीं बनती. हमारे अख़बार इन भावी अफ़सरों या यूं कह लें इन संभावित डाकुओं की फ़ोटो तो छापते हैं पर अपने समय-समाज के लेखकों की तस्वीरें नहीं छापतें.

बहरहाल, आज जहां कहीं भी, जिस किसी भाषा में भी हिंदी पुस्तकों के अनुवाद हो रहे हैं, उससे यह बात ज़रूर पता लगती है कि इन किताबों ने उन समाजों में अवश्य ही अपनी जगह बनायी होगी. ऐसे समय में सरकारों का प्रयास बढ़ना चाहिए था.

अरुण देव: हिंदी साहित्य, विशेषतः कथा-साहित्य के अंग्रेज़ी अनुवाद हाल के वर्षों में जिस तरह सामने आए हैं, उन्होंने एक साथ उम्मीद भी जगाई है और कई बुनियादी सीमाओं को भी रेखांकित किया है. यह सच है कि अनुवाद का प्रवाह बढ़ा है, पर गुणवत्ता अब भी निर्णायक प्रश्न बनी हुई है. कुछ अनुवाद सचमुच सर्जनात्मक और विश्वसनीय हैं, जबकि अधिकांश कामचलाऊ, यानी केवल अंतरराष्ट्रीय दृश्यता की न्यूनतम शर्तें पूरी करने वाले. बिना सक्षम, संवेदनशील और साहित्यिक विवेक से संपन्न अनुवादकों के हिंदी कथा-साहित्य का विश्व साहित्य में सार्थक प्रवेश संभव नहीं है.

गीतांजलि श्री के रेत-समाधि और उसके अंग्रेज़ी अनुवाद टूम ऑफ सैंड ने इस बहस को एक ठोस उदाहरण दिया. डेज़ी रॉकवेल का यह अनुवाद महज़ भाषिक रूपांतरण नहीं, बल्कि शैली, लय और सांस्कृतिक बारीकियों का रचनात्मक पुनर्निर्माण था. 2022 का इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ इस बात की पुष्टि करता है कि अच्छा अनुवाद मूल कृति के लिए एक नया साहित्यिक जीवन खोल सकता है. फ्रेंच में एनी मोंटो द्वारा इसका अनुवाद हुआ. फिर भी अंग्रेज़ी के अतिरिक्त फ्रेंच या जर्मन जैसी भाषाओं में हिंदी साहित्य के अनुवाद अब भी सीमित और अपवादस्वरूप ही हैं.

इसके विपरीत, हिंदी में अनुवाद का एक बड़ा और सक्रिय बाज़ार मौजूद है. समस्या यह है कि अन्य भाषाओं से हिंदी में होने वाले अधिकांश अनुवाद अंग्रेज़ी के माध्यम से होते हैं. मूल भाषा से सीधे अनुवाद अब भी कम हैं. यह स्थिति हिंदी को एक समृद्ध ग्रहणशील भाषा तो बनाती है, लेकिन बहुभाषिक साहित्यिक संवाद को सीमित भी करती है.

समकालीन वैश्विक साहित्य के उदाहरण इस असंतुलन को और स्पष्ट करते हैं. 2025 का नोबेल पुरस्कार पाने वाले लाज़्लो क्राज़्नाहोरकाई का कोई उपन्यास अभी तक हिंदी में उपलब्ध नहीं है. 2025 का इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ पाने वाली 77 वर्षीय बानू मुश्ताक को हिंदी पाठकों ने उनके अंग्रेज़ी अनुवादक दीपा भास्थी के माध्यम से जाना. यानी विश्व साहित्य तक हमारी पहुंच अब भी प्रायः अंग्रेज़ी की मध्यस्थता से तय होती है.

इसके साथ यह भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि हिंदी में विश्व साहित्य के अनुवाद की एक सुदृढ़ और ऐतिहासिक परंपरा रही है. अल्बेयर कामू, काफ्का और जॉर्ज ऑरवेल के अनुवाद उपलब्ध हैं. गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ और हारुकी मुराकामी की कहानियां हिंदी में पर्याप्त हैं. निर्मल वर्मा ने अनुवाद को एक रचनात्मक अभ्यास के रूप में स्थापित किया था और उनके अनुवाद महत्वपूर्ण हैं. ख़ासकर चेक साहित्य के तो वे दूत हैं. कविता के क्षेत्र में स्थिति समृद्ध रही है. संसार के लगभग सभी प्रमुख कवियों के अनुवाद हिंदी में उपलब्ध हैं. ‘तनाव’ जैसी पत्रिका ने तो स्वयं को केवल कविता-अनुवाद के लिए समर्पित रखा है.

कुल मिलाकर, हिंदी में अनुवाद का परिदृश्य गहमागहमी भरा है. एक ओर विश्व साहित्य की व्यापक उपस्थिति और सुदीर्घ परंपरा है, दूसरी ओर मूल से सीधे, उच्चस्तरीय और उत्तरदायी अनुवादों की कमी. वहीं, हिंदी साहित्य के अंग्रेज़ी और अन्य भाषाओं में अनुवाद अभी भी प्रारंभिक अवस्था में हैं.

आज अनुवाद केवल भाषा-परिवर्तन नहीं, बल्कि साहित्यिक विश्वसनीयता, सांस्कृतिक आत्मसम्मान और वैश्विक संवाद की अनिवार्य शर्त बन चुका है. जब तक अनुवाद को एक गंभीर, सृजनात्मक और संस्थागत परियोजना के रूप में नहीं देखा जाएगा, हिंदी साहित्य का वैश्विक प्रवेश कुछ अपवादों और संयोगों तक ही सीमित बना रहेगा.

क्या हिंदी वैश्विक भाषा बन पाई है?

उदयन वाजपेयी: हर भाषा वैश्विक होती है. एक भाषा अगर पचास लोग भी बोल रहे होते हैं, तो उसमें भी समूह की शक्ति होती है. इसलिए एक भी भाषा चाहे इसको बहुत थोड़े लोग ही बोलते रहे हों, उसमें समूचे विश्व का एक चित्र अवश्य होता है. तो पहली बात तो यह कि हिंदी भी अन्य भाषाओं की तरह ही एक वैश्विक भाषा है, लेकिन अगर वैश्विक भाषा से तात्पर्य यह है कि क्या दुनिया भर में लोग हिंदी पहचानते हैं? तो हां, लोग पहचानते अवश्य हैं कि हिंदी भी एक भाषा है.

दूसरा तात्पर्य यह कि क्या दुनिया के लोग हिंदी में बात करना चाहते हैं? तो होंडूरास का आदमी स्पैनिश में बोलता है या उनकी अपनी जो स्थानीय भाषाएं हैं, उनमें बात करेगा तो वो हिंदी में बात क्यों करेगा? तो इसलिए दुनिया भर के लोग अपने दैनंदिन जीवन में उन भाषाओं का प्रयोग करते हैं, जिसमें वो सहज होते हैं.

रहा हिंदी पढ़ने का प्रश्न, तो दुनिया में अनेक विश्वविद्यालयों में हिंदी के विभाग हैं. उन हिंदी विभागों में कुछ लोग जाकर हिंदी बोलना- पढ़ना सीखते हैं. हमारे देश में भी कई जगहों से लोग आकर हमारे विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ते हैं. पर हिंदी भाषा वैश्विक बोलचाल की भाषा केवल तब बन पाएगी, जब हम इंग्लैंड या अमेरिका की तरह एक व्यापारी देश हो जाएं. जब हमारी भाषा व्यापार के लिए अनिवार्य हो जाएगी तब लोग हमारी हिंदी सीख लेंगे. लेकिन जब भी भाषा मूलतः व्यापार के काम में आने लगती है तो, उस भाषा में जो बारीक अनुभूतियां या भाव-संपदाएं हैं उनके लिए स्थान कम होने लगता है.

आज सबसे अच्छी अंग्रेजी इंग्लैंड के लोग नहीं लिखते, बल्कि नाईजीरिया के लोग लिखते हैं या अफ़्रीका के लोग लिखते हैं. क्यों? क्योंकि वो उस भाषा में व्यापार नहीं कर रहे हैं. वो उसको अपनी संवेदना के अनुरूप बनाने में लगे रहते हैं. उसे तोड़ते-मरोड़ते भी हैं और आकार देते हैं. इसलिए ये कहना कि हिंदी एक वैश्विक भाषा बन जाए इस तरह से, तो एक तो ऐसे सपने ही क्यों देखना और दूसरा ये कि अपने भारत में हिंदी भाषा का जो लेखक है या बोलने वाला है, वो भी दुनिया की कल्पना अपने ढंग से करता है. उसका कहीं अधिक जुड़ाव है लोगों से और उस जुड़ाव का कारण इस भाषा से है और इस भाषा से अधिक इस सभ्यता से है. क्योंकि हमारी सभ्यता करुणा पर बनी है.

इसी में उसकी जीवंतता है और अगर ये देश अपवर्जना (exclusion) पर खड़ा हो गया, जिसके कि प्रयास हो रहे हैं, तो ये देश ख़त्म हो जाएगा, ये सभ्यता ख़त्म हो जाएगी. ये गौतम बुद्ध जो हैं वह यूं ही थोड़े न भारत में हो गए थे, उसका कोई कारण था. और उन्होंने कहा था कि करुणा सब से बड़ा मूल्य है, और वह इसलिए कहा था क्योंकि इस सभ्यता में यह कहने का अवकाश था.

अरुण देव: हिंदी की स्थिति आज एक विचित्र द्वंद्व से घिरी हुई है. वह अभी तक ढंग से अखिल भारतीय भाषा नहीं बन पाई है, न प्रशासनिक अर्थों में, न ही सांस्कृतिक स्वीकृति के सर्वमान्य स्तर पर. ऐसे में उसके ‘वैश्विक भाषा’ बनने की आकांक्षा पहली नज़र में विरोधाभासी प्रतीत होती है. फिर भी, यथार्थ यह है कि हिंदी अपने औपचारिक दर्जे से अधिक, अपने व्यवहारिक प्रसार के कारण एक व्यापक भाषिक उपस्थिति दर्ज करा रही है.

भारत के भीतर भले ही हिंदी को लेकर असहमतियां और प्रतिरोध मौजूद हों, पर उपमहाद्वीप और उसके बाहर उसका फैलाव उल्लेखनीय है. भारत के साथ-साथ पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में हिंदी एक समझी जाने वाली भाषा के रूप में मौजूद है. इसके अतिरिक्त मध्य एशिया और खाड़ी देशों में-जहां बड़ी संख्या में भारतीय कामगार रहते और काम करते हैं-हिंदी ने एक कार्यकारी संपर्क-भाषा का रूप ग्रहण किया है. यह प्रसार किसी नीतिगत योजना का परिणाम नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के श्रम, बाज़ार और आपसी संवाद की ज़रूरतों से उपजा हुआ है.

इस प्रक्रिया में सिनेमा और प्रवासी श्रमिकों की भूमिका निर्णायक रही है. हिंदी सिनेमा अपने लोकप्रिय, मिश्रित और संवादधर्मी स्वरूप में भाषा को सीमाओं के पार ले गया है. वहीं, कामगारों के साथ हिंदी ने भी यात्रा की है; निर्माण स्थलों, कारखानों, बाज़ारों और श्रम शिविरों में उसने संवाद की साझा ज़मीन तैयार की है. इस अर्थ में हिंदी का वैश्वीकरण किसी सांस्कृतिक वर्चस्व का नहीं, बल्कि व्यवहारिक उपयोगिता और साझा ज़रूरतों का परिणाम है.

साहित्य के स्तर पर भी एक दिलचस्प परिवर्तन दिखाई देता है. हाल के वर्षों में हिंदी साहित्य पर अंग्रेज़ी में कई गंभीर और शोधपरक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जो इसे वैश्विक अकादमिक विमर्श का हिस्सा बना रही हैं. अक्षय मुकुल की ‘अज्ञेय: राइटर, रेबल, सोल्जर’ न केवल अज्ञेय के बहुआयामी व्यक्तित्व को सामने लाती है, बल्कि हिंदी आधुनिकता को एक व्यापक बौद्धिक परिप्रेक्ष्य में रखती है. ‘द हिंदी पब्लिक स्फीयर’ की लेखिका प्रोफ़ेसर फ़्रांचेस्का ऑर्सीनी की नई पुस्तक, ‘ईस्ट ऑफ दिल्ली: मल्टीलिंग्वल लिटरेरी कल्चर एंड वर्ल्ड लिट्रेचर’ इधर प्रकाशित हुई है.

हिंदी का भविष्य एक सरल रेखा में नहीं, बल्कि कई परस्पर-विरोधी धाराओं के बीच आकार ले रहा है. वह एक ओर अखिल भारतीय स्वीकृति के संघर्ष से जूझ रही है, दूसरी ओर उपमहाद्वीप, प्रवास और लोकप्रिय संस्कृति के सहारे एक दूसरी लिंगुआ फ़्रांका (संपर्क भाषा) बनने की दिशा में बढ़ रही है. यही द्वंद्व हिंदी की सबसे बड़ी सीमा भी है और उसकी सबसे बड़ी संभावना भी.

(अंकित राज के सहयोग के साथ)