श्रीनगर: इस महीने की शुरुआत में कटरा स्थित श्री माता वैष्णो देवी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस (एसएमवीडीआईएमई) का पंजीकरण रद्द किए जाने के बाद से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके सहयोगी दलों के हौसले बुलंद हैं.
ये लोग अब केंद्र शासित प्रदेश में आगामी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू) को कश्मीर घाटी से जम्मू स्थानांतरित करने की मांग कर रहे हैं.
मालूम हो कि विधि विश्वविद्यालय को लेकर उठा विवाद जम्मू-कश्मीर में हिंदू बहुल जम्मू और कश्मीर के बीच के गहरे विभाजन को उजागर करता है. जम्मू हाल के वर्षों में भाजपा का गढ़ बनकर उभरा है, जबकि कश्मीर घाटी में विपक्षी दल भाजपा पर बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय को कमजोर करने का आरोप लगाते रहे हैं.
विधि विश्वविद्यालय का संचालन इस वर्ष अप्रैल से मध्य कश्मीर के बडगाम जिले में एक अस्थायी परिसर से शुरू होना निर्धारित है. इस संबंध में 2 फरवरी से शीतकालीन राजधानी में शुरू होने वाले विधानसभा सत्र से पहले भाजपा समर्थित जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन (जम्मू) ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को पत्र लिखकर इस विश्वविद्यालय को जम्मू स्थानांतरित करने की मांग की है.
सोमवार (12 जनवरी) को मुख्यमंत्री को दिए गए एक ज्ञापन में बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता के. निर्मल किशोर कोटवाल और कोषाध्यक्ष राहुल अग्रवाल ने विश्वविद्यालय को स्थानांतरित करने की मांग को जम्मू-कश्मीर में ‘समावेशी विकास और क्षेत्रीय न्याय के पुनर्गठन के बाद के दृष्टिकोण’ से जोड़ने का प्रयास किया है.
बार एसोसिएशन ने यह भी आरोप लगाया है कि यदि विश्वविद्यालय कश्मीर घाटी में स्थापित किया जाता है, तो इससे ‘क्षेत्रीय असंतुलन बना रहेगा.’
एसोसिएशन का दावा है कि कश्मीर में विश्विविद्यालय स्थापित करने से ‘जम्मू और देश के अन्य हिस्सों के छात्रों को रसद, जलवायु और पहुंच संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.’
हालांकि, मुख्यमंत्री ने इस मांग को खारिज करते हुए तर्क दिया कि जम्मू में हाल ही में दो प्रमुख संस्थान – भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) – स्थापित किए गए हैं.
इन दोनों संस्थानों की घोषणा पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी)-भाजपा गठबंधन के कार्य समझौते के तहत की गई थी, जिसने 2015 से 2018 तक तत्कालीन राज्य पर शासन किया था.
इस मामले पर सीएम अब्दुल्ला ने सोमवार को कहा, ‘उस समय क्षेत्रीय संतुलन की कोई मांग नहीं थी.’
हालांकि, कश्मीर में विधि विश्वविद्यालय की स्थापना के अपने पूर्व रुख से पीछे हटते हुए अब्दुल्ला ने कहा, ‘निर्णय लेने से पहले ही भेदभाव के आरोप लग रहे हैं. अभी तक इस बारे में कोई फैसला नहीं लिया गया है. पहले निर्णय तो लिया जाए.’
मालूम हो कि पिछले साल अक्टूबर में बडगाम विधानसभा के उपचुनाव से पहले मुख्यमंत्री, जिन पर सत्ता में आने के बाद भाजपा के साथ संबंध सुधारने के आरोप लगे हैं, ने कहा था कि उनकी सरकार सूबे में विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए संभावित स्थलों की पहचान कर रही है.
तब उन्होंने कहा था, ‘मेरी राय में मध्य कश्मीर के बडगाम में स्थित ओमपोरा एक उपयुक्त स्थान है. यह एक विशाल परिसर है, जो फिलहाल उपयोग में नहीं है. यदि कोई बेहतर जगह उपलब्ध नहीं होती है, तो विधि विश्वविद्यालय स्थायी परिसर विकसित होने तक वहां से काम शुरू कर सकता है.’
अब्दुल्ला ने यह भी बताया था कि विश्वविद्यालय के स्थायी स्थान पर अंतिम निर्णय जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और केंद्र शासित प्रदेश के मुख्य सचिव सहित अन्य हितधारकों से परामर्श के बाद लिया जाएगा.
उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा श्रीनगर में विधि विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए पहले ही एक प्रस्ताव पारित कर चुकी है.
मुख्यमंत्री की यह टिप्पणी उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा से कांग्रेस विधायक निज़ाम-उद-दीन भट द्वारा इस मुद्दे पर लाए गए एक निजी प्रस्ताव पर आई है.
पिछले वर्ष ध्वनि मत से पारित इस प्रस्ताव में कहा गया है, ‘यह सदन सर्वसम्मति से सरकार से आग्रह करता है कि वह श्रीनगर में जम्मू और कश्मीर राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय की स्थापना की प्रक्रिया को बिना किसी देरी के शुरू करे, क्योंकि पहले चरण के लिए आवंटित धनराशि पहले ही उपलब्ध करा दी गई है.’
मालूम हो कि इस प्रस्ताव को दोनों दलों का भरपूर समर्थन मिला था.
उधर, रियासी जिले में मेडिकल कॉलेज बंद होने का जश्न मनाने के बाद भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने कश्मीर में विधि विश्वविद्यालय स्थापित करने के कदम का विरोध करने की घोषणा की है और चेतावनी दी है कि अगर अब्दुल्ला सरकार अपना रुख नहीं बदलती है तो उनके नेता सड़कों पर उतरेंगे.
इस संबंध में उधमपुर पूर्व से भाजपा विधायक आरएस पठानिया ने कहा, ‘जम्मू विधि विश्वविद्यालय के लिए आदर्श स्थान है. हम यह सुनिश्चित करेंगे कि यह संस्थान केवल जम्मू में ही खुले.’
इस विवाद ने कश्मीर में चिंताएं भी बढ़ा दी हैं क्योंकि यह हिंदू दक्षिणपंथी समूहों के नैरेटिव को बल देता है, जो जम्मू में कथित राजनीतिक और आर्थिक पिछड़ेपन के लिए घाटी के लोगों और राजनीतिक दलों को जिम्मेदार ठहराते हैं.
हालांकि, कश्मीरी छात्र नेता मीर मुजीब ने कहा कि जम्मू शहर में केंद्रित ‘छोटा लेकिन मुखर वर्ग’ खुद को पीड़ित के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है और खुद को पीड़ित के रूप में पेश कर रहा है, जो तथ्यों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता.
उन्होंने कहा, ‘जम्मू शहर जम्मू और कश्मीर के सबसे विकसित शहरी क्षेत्रों में से एक है, जहां बेहतर बुनियादी ढांचा, प्रशासनिक एकाग्रता और अवसरों तक पहुंच है. इस पृष्ठभूमि में मौजूदा चर्चा एक संकीर्ण समूह से उपजी प्रतीत होती है, न कि व्यापक या क्षेत्रीय भावना से.’
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