नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाज़ा शांति योजना के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाज़ा’ में शामिल होने का आमंत्रण दिया है. यह बोर्ड गाज़ा में जारी संघर्ष के समाधान और पुनर्निर्माण से जुड़ी एक नई अंतरराष्ट्रीय पहल का हिस्सा है.
यह निमंत्रण अमेरिका और भारत के संबंधों के नाज़ुक समय में आया है, जब मोदी सरकार ट्रंप प्रशासन के साथ एक व्यापार समझौते पर काम कर रही है, ताकि भारतीय निर्यात पर लगे 50% शुल्क को कम किया जा सके.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, 16 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र में ट्रंप ने कहा कि भारत की भागीदारी से मध्य पूर्व में शांति की दिशा में एक ‘ऐतिहासिक और निर्णायक प्रयास’ को मजबूती मिलेगी. उन्होंने इसे 7 अक्टूबर 2023 से जारी गाज़ा संघर्ष को समाप्त करने के लिए एक नए और साहसिक वैश्विक दृष्टिकोण के रूप में पेश किया.
ट्रंप के मुताबिक, उन्होंने 29 सितंबर, 2025 को गाज़ा संकट को खत्म करने के लिए 20-बिंदुओं वाली योजना की घोषणा की थी, जिसे अरब देशों, इज़रायल और यूरोप सहित कई वैश्विक नेताओं का समर्थन मिला. इसी के तहत 17 नवंबर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 2803 पारित कर इस योजना का स्वागत किया.
Honored to convey @POTUS invitation to Prime Minister @narendramodi to participate in the Board of Peace which will bring lasting peace to Gaza. The Board will support effective governance to achieve stability and prosperity! pic.twitter.com/HikLnXFFMp
— Ambassador Sergio Gor (@USAmbIndia) January 18, 2026
अपने पत्र में ट्रंप ने कहा कि अब इस योजना को ज़मीनी स्तर पर लागू करने का समय आ गया है. उन्होंने लिखा कि इस पूरी पहल के केंद्र में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ होगा, जिसे एक नए अंतरराष्ट्रीय संगठन और अंतरिम प्रशासनिक ढांचे के रूप में स्थापित किया जाएगा.
ट्रंप के शब्दों में, यह ‘अब तक गठित होने वाला सबसे प्रभावशाली और निर्णायक वैश्विक बोर्ड’ होगा.
संघर्षविराम के दूसरे चरण में बोर्ड की भूमिका
ह्वाइट हाउस के अनुसार, यह बोर्ड गाज़ा में इज़रायल और हमास के बीच हुए संघर्षविराम के दूसरे चरण के तहत काम करेगा. पिछले वर्ष अक्टूबर में दोनों पक्षों ने ट्रंप की शांति योजना पर सहमति जताई थी.
सरकार का कहना है कि बोर्ड रणनीतिक निगरानी करेगा, अंतरराष्ट्रीय संसाधन जुटाएगा और जवाबदेही सुनिश्चित करेगा, ताकि गाज़ा को संघर्ष से निकालकर शांति और विकास की राह पर ले जाया जा सके. इस योजना में गाज़ा को कट्टरता और आतंकवाद से मुक्त क्षेत्र बनाना, सुरक्षा ढांचा तैयार करना और पुनर्निर्माण शामिल है.
इज़रायल की आपत्ति, कार्यकारी समिति पर सवाल
हालांकि, इस पहल पर इज़रायल ने आपत्ति भी जताई है. ह्वाइट हाउस ने पहले ही बोर्ड की कार्यकारी समिति की घोषणा कर दी थी, लेकिन इज़रायल का कहना है कि इस समिति के गठन में उससे कोई समन्वय नहीं किया गया और यह उसकी नीति के विपरीत है. इसे अमेरिका जैसे करीबी सहयोगी के प्रति अप्रत्यक्ष आलोचना के रूप में देखा जा रहा है.
कार्यकारी समिति में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, मध्य पूर्व के लिए अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, ट्रंप के दामाद और व्यवसायी जेरेड कुशनर तथा विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा शामिल हैं.
इसके अलावा अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के सीईओ मार्क रोवन और अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट गैब्रियल भी समिति का हिस्सा हैं.
यह कार्यकारी बोर्ड गाज़ा के प्रशासन के लिए गठित नेशनल कमिटी फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ गाज़ा की निगरानी करेगा.
कई देशों को न्योता, पाकिस्तान ने पुष्टि की
समाचार एजेंसी एपी के मुताबिक, पाकिस्तान, जॉर्डन, ग्रीस, साइप्रस, कनाडा, तुर्की, मिस्र, पैराग्वे, अर्जेंटीना और अल्बानिया को भी इस बोर्ड में शामिल होने का आमंत्रण दिया गया है.
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को अमेरिका के राष्ट्रपति की ओर से औपचारिक निमंत्रण मिला है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान गाज़ा में शांति और सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाता रहेगा, ताकि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के अनुरूप फिलिस्तीन मुद्दे का स्थायी समाधान निकाला जा सके.
स्थायी सदस्यता के लिए एक अरब डॉलर की शर्त
एपी की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप के नेतृत्व वाले इस बोर्ड में स्थायी सदस्यता पाने के लिए एक अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान करना होगा. वहीं, तीन साल की अस्थायी सदस्यता के लिए किसी वित्तीय योगदान की शर्त नहीं रखी गई है. एक अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, इस फंड का इस्तेमाल गाज़ा के पुनर्निर्माण में किया जाएगा. बोर्ड का चार्टर अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है.
इसी बीच, हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान ने इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता स्वीकार कर लिया है. हंगरी के विदेश मंत्री पीटर सिज्जार्तो ने इसकी पुष्टि की है. ओर्बान को यूरोप में ट्रंप के सबसे मजबूत समर्थकों में गिना जाता है.
गाज़ा का अगला चरण: सुरक्षा, प्रशासन और पुनर्निर्माण
इस बोर्ड में संघर्षविराम की निगरानी कर रहे क़तर, मिस्र और तुर्की के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे. तुर्की के इज़रायल से संबंध तनावपूर्ण हैं, लेकिन उसके हमास से संपर्क हैं. ऐसे में तुर्की की भूमिका हमास को सत्ता छोड़ने और निरस्त्रीकरण के लिए राज़ी करने में अहम मानी जा रही है.
अमेरिका के जल्द ही बोर्ड के सदस्यों की आधिकारिक सूची जारी करने की संभावना है. यह घोषणा स्विट्ज़रलैंड के दावोस में होने वाली वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की बैठक के दौरान हो सकती है.
संघर्षविराम के दूसरे चरण में बोर्ड गाज़ा में नई फ़िलिस्तीनी प्रशासनिक समिति के गठन, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल की तैनाती, हमास के निरस्त्रीकरण और गाज़ा पट्टी के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया की निगरानी करेगा.
‘पैरलल यूएन’ की आशंका: बदले स्वरूप में सामने आया ‘बोर्ड ऑफ पीस’
शुरुआत में ‘बोर्ड ऑफ पीस फॉर गाज़ा’ को गाज़ा तक सीमित एक अंतरराष्ट्रीय निगरानी तंत्र के तौर पर पेश किया गया था, लेकिन अब इसके चार्टर और संरचना को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. विशेषज्ञों और राजनयिक हलकों में इसे एक तरह का ‘पैरलल यूनाइटेड नेशंस’ बताया जा रहा है.
डोनाल्ड ट्रंप ने सितंबर 2025 में गाज़ा के लिए जिस 20-बिंदुओं वाली शांति योजना का प्रस्ताव रखा था, उसके तहत गाज़ा को एक ‘अस्थायी संक्रमणकालीन शासन’ के तहत रखा जाना था. इस व्यवस्था में एक तकनीकी और गैर-राजनीतिक फ़िलिस्तीनी समिति को रोज़मर्रा के प्रशासन की ज़िम्मेदारी दी जानी थी, जिसकी निगरानी एक नए अंतरराष्ट्रीय निकाय- ‘बोर्ड ऑफ पीस’-द्वारा की जानी थी.
उस समय इस बोर्ड की भूमिका गाज़ा तक सीमित थी और इसे संयुक्त राष्ट्र की स्वीकृति भी प्राप्त थी.
गाज़ा से आगे ‘वैश्विक संघर्ष समाधान’ का दावा
भारत को भेजे गए निमंत्रण पत्र में बोर्ड को ‘अब तक गठित होने वाला सबसे प्रभावशाली और निर्णायक बोर्ड’ बताया गया है और इसे न सिर्फ मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने, बल्कि ‘वैश्विक संघर्षों के समाधान के लिए एक नए दृष्टिकोण’ के रूप में पेश किया गया है.
इज़रायल के ‘टाइम्स ऑफ इज़रायल’ द्वारा सत्यापित चार्टर के मुताबिक, बोर्ड को एक नए अंतरराष्ट्रीय संगठन और संक्रमणकालीन शासकीय प्रशासन के रूप में स्थापित किया जाएगा.
दिलचस्प बात यह है कि चार्टर में गाज़ा का स्पष्ट उल्लेख तक नहीं है, बल्कि यह उन ‘संस्थागत ढांचों से आगे बढ़ने’ की बात करता है, जो अब तक शांति स्थापित करने में विफल रहे हैं.
चार्टर में बोर्ड को एक तेज़, लचीला और प्रभावी अंतरराष्ट्रीय शांति-निर्माण निकाय के रूप में परिभाषित किया गया है-ऐसी भाषा जो संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की अप्रत्यक्ष आलोचना के तौर पर देखी जा रही है.
ट्रंप की स्थायी भूमिका और संप्रभुता का सवाल
चार्टर के सबसे विवादास्पद बिंदुओं में से एक है डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका. दस्तावेज़ के अनुसार, ट्रंप ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के प्रारंभिक अध्यक्ष (इनॉग्युरल चेयरमैन) होंगे और वे अमेरिका के प्रतिनिधि के रूप में भी अलग से नामित रहेंगे.
चार्टर में यह भी प्रावधान है कि ट्रंप को अध्यक्ष पद से केवल दो ही स्थितियों में हटाया जा सकता है-
या तो वे स्वयं इस्तीफा दें, या फिर उनके द्वारा नियुक्त कार्यकारी बोर्ड के सभी सदस्य सर्वसम्मति से उन्हें अक्षम घोषित करें. ऐसी स्थिति में भी उत्तराधिकारी वही होगा, जिसे ट्रंप नामित करेंगे.
जानकारों का कहना है कि इसका अर्थ यह हुआ कि कोई भी देश यदि इस बोर्ड की सदस्यता स्वीकार करता है, तो वह एक ऐसे संगठन का हिस्सा बनेगा, जिसका अध्यक्ष डोनाल्ड ट्रंप रहेंगे-चाहे वे भविष्य में अमेरिका के राष्ट्रपति हों या नहीं.
चार्टर में साफ तौर पर कहा गया है कि सदस्य देशों को ‘इस चार्टर से बंधे रहने’ की सहमति देनी होगी, जिससे राष्ट्रीय संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
तीन साल या स्थायी सदस्यता: नया ढांचा
चार्टर के अनुसार, बोर्ड की सदस्यता सामान्यतः तीन वर्षों के लिए होगी. हालांकि, यदि कोई देश सदस्यता के पहले वर्ष में एक अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान देता है, तो उसे स्थायी सदस्यता मिल सकती है.
गौरतलब है कि जब नवंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र ने इस पहल को मंजूरी दी थी, तब बोर्ड का कार्यकाल 2027 तक सीमित था और न तो स्थायी सदस्यता का प्रावधान था और न ही इतने बड़े वित्तीय योगदान की शर्त.
कार्यकारी बोर्ड और ट्रंप के करीबी
बोर्ड की कार्यकारी समिति में वे चेहरे शामिल हैं, जिन्हें ट्रंप का करीबी माना जाता है-जैसे अमेरिकी विदेश मंत्री, मध्य पूर्व के लिए विशेष दूत, उनके दामाद जेरेड कुशनर, और कुछ कॉरपोरेट व अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़े प्रमुख नाम.
राजनयिक हलकों में यह भी चर्चा है कि अब तक करीब 60 देशों को सदस्यता का निमंत्रण भेजा जा चुका है, हालांकि फिलहाल केवल हंगरी ने आधिकारिक रूप से इसमें शामिल होने की घोषणा की है.
क्यों बढ़ रही हैं चिंताएं?
विश्लेषकों का मानना है कि बोर्ड ऑफ पीस का यह बदला हुआ स्वरूप, जिसमें संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं के समान चार्टर है, वैश्विक संघर्षों में हस्तक्षेप की खुली परिभाषा है और एक व्यक्ति को लगभग स्थायी नेतृत्व है, इन सबके चलते यह पहल केवल गाज़ा शांति योजना से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के समानांतर ढांचा बनती दिख रही है.
ऐसे में भारत समेत जिन देशों को निमंत्रण मिला है, उनके सामने यह फैसला सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक संतुलन से जुड़ा एक जटिल प्रश्न बन गया है.
