मोदी के भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ सरकारी बदला: ज़मींदोज़ हुआ परवीन फ़ातिमा का घर

उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रयागराज के एक एक्टिविस्ट के परिवार के घर को गिरा दिया, जिन्होंने बिना किसी जुर्म के 21 महीने जेल में बिताए. जब वे पुलिस हिरासत में अस्पताल में थे, तब बुलडोज़र से उनका वो घर तोड़ा गया, जो असल में उनकी पत्नी के नाम पर था.

परवीन फ़ातिमा का घर. बुलडोज़र एक्शन से पहले और बाद में.

भारत के विभिन्न राज्यों में ‘बुलडोज़र के क़हर’ पर छह लेखों की शृंखला का यह पहला लेख है. इस लेख में यह बताया गया है कि कैसे उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रयागराज के एक एक्टिविस्ट के परिवार के घर को गिरा दिया, जिन्होंने बिना किसी जुर्म के 21 महीने जेल में बिताए. जब वह पुलिस हिरासत में अस्पताल में थे, तब बुलडोज़र से घर तोड़ दिया गया, जो घर उनकी पत्नी का था. ‘बुलडोज़र राज’ भारतीय जनता पार्टी द्वारा शासित राज्यों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से बदले की कार्रवाई एक हॉलमार्क तरीक़ा बन गया है, भीड़ जिसका जश्न मनाती है जबकि न्यायपालिका चुपचाप तमाशा देखती है.

§

नई दिल्ली: अप्रैल 2024 में मैं मोहम्मद जावेद से उनकी बेटी के घर पर मिला-जो नई दिल्ली के भीड़भाड़ वाले जामिया नगर में दो-बेडरूम का एक फ़्लैट है. सरकारी बुलडोज़रों ने प्रयागराज (पहले इलाहाबाद) में उनकी पत्नी के दो मंज़िला घर को गिरा दिया था, जिससे उनकी ज़िंदगी भर की कमाई का बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया.

साफ़ सुथरे चेहरे पर सफ़ेद मगर सलीक़े से तराशी हुई दाढ़ी रखने वाले शांत स्वभाव के जावेद की उम्र अब 59 साल हो गई है. उन्होंने आठ आपराधिक आरोपों और प्रिवेंटिव डिटेंशन का सामना करते हुए 21 महीने जेल में बिताए थे. जजों को कोई भी ऐसा पक्का सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने वे अपराध किए थे जिनका उन पर आरोप था इसलिए 16 मार्च 2024 को उन्हें रिहा कर दिया गया.

जावेद की रिहाई के कुछ हफ़्ते बाद ही मैं उनसे मिला. वह दुखी थे लेकिन टूटे नहीं थे. उनकी जोशीली बेटियां- एक 26 साल की रिसर्चर और एक्टिविस्ट, दूसरी 22 साल की (उस समय) स्टूडेंट- अभी भी ग़ुस्से में थीं.

जिस चिंगारी ने जावेद के घर और उनकी ज़िंदगी के 21 महीनों को जला दिया, वह चिंगारी 27 मई 2022 को टाइम्स नाउ पर एक टेलीविज़न डिबेट में भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा द्वारा पैगंबर मोहम्मद के ख़िलाफ़ की गई अपमानजनक टिप्पणियों से भड़की थी. उनकी टिप्पणियों की रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर फैलाई गई जिससे भारत और विदेशों में मुसलमान ग़ुस्से से भर उठे और विरोध प्रदर्शन किया.

पुलिस फ़ायरिंग और नफ़रत भरे हमलों में कई लोगों की मौत

इनमें से पहला मामला 3 जून 2022 को उत्तर प्रदेश के कानपुर में सामने आया, जहां शुक्रवार की नमाज़ के बाद हुए विरोध प्रदर्शन हुए. पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर किया और कई लोगों को गिरफ़्तार किया. लेकिन यह आग देश के कई हिस्सों में फैल गई, जिसमें रांची, हावड़ा, भिवंडी और उदयपुर शामिल हैं, जहां पत्थर फेंके गए, और पुलिस फ़ायरिंग तथा नफ़रत भरे हमलों में कई लोग मारे गए.

प्रयागराज के रहने वाले जावेद ने कानपुर में पुलिस द्वारा की गई एकतरफ़ा कार्रवाई से क्षुब्ध होकर फ़ेसबुक पर पोस्ट लिखा (जिसे अब सरकारी दबाव के बाद हटा दिया गया है): ‘कानपुर में हिंसा क्यों हुई? राज्य सरकार असली बीमारी का इलाज क्यों नहीं करती? नूपुर शर्मा और यति नरसिंहानंद जैसे लोग पैगंबर मुहम्मद के ख़िलाफ़ कब तक आपत्तिजनक टिप्पणी करते रहेंगे और सरकार और पुलिस चुप रहेगी…’

अगले हफ़्ते, 10 जून 2022 को प्रयागराज में शुक्रवार की नमाज़ के बाद बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी इकट्ठा हुए. कुछ युवकों ने पत्थरबाज़ी की, लेकिन पुलिस ने हल्का बल प्रयोग करके भीड़ को जल्दी तितर-बितर कर दिया.

जावेद प्रदर्शनकारियों में शामिल नहीं थे. उन्होंने तो फ़ेसबुक पर पोस्ट करके लोगों से शांति बनाए रखने की अपील भी की थी. उन्होंने मुसलमानों से अपील की कि वे शुक्रवार की नमाज़ के बाद इकट्ठा न हों और अपने-अपने घर चले जाएं, दुआ करें कि सद्भाव, शांति और प्यार बना रहे.

पर बाद में 10 जून को, पुलिस ने जावेद को लगभग 125 अन्य लोगों के साथ हिरासत में ले लिया. उन सभी को पूरी रात पुलिस लाइंस में ज़मीन पर बिठाकर रखा गया. जावेद ने बताया, अगली सुबह एक सीनियर पुलिस ऑफिसर ने उन्हें मारा, उनसे अपनी चप्पल चाटने को कहा और उन पर ‘जिहादी सोच’ रखने का आरोप लगाया.

उन्होंने आरोप लगाया कि कई दूसरे आदमियों को भी पीटा गया और टॉर्चर किया गया. किसी ने उन्हें खाना या पानी भी नहीं दिया. उस रात, उन्हें नैनी जेल ले जाया गया. पुलिस की हिंसा के कारण बुरी तरह घायल और ख़ून से लथपथ कुछ लोगों को, और जावेद को, जिनका ब्लड प्रेशर बढ़ गया था, जेल अस्पताल में भर्ती कराया गया.

इस बीच, घर पर उनके परिवार के लोग – पत्नी, दो बेटियां और गर्भवती बहू – बेहद डरे हुए और परेशान थे.

सोशल मीडिया पोस्ट में उनके घर को गिराने की मांग की गई थी. सरकारी अधिकारियों के पोस्ट खुलेआम धमकाने वाले थे. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट किया कि उनका प्रशासन विरोध प्रदर्शनों से सख़्ती से निपटेगा, जिसमें 1980 के राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ़्तारियां और तोड़फोड़ शामिल है.

राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (रासुका) पुलिस को आरोपियों को बिना मुक़दमे के एक साल तक हिरासत में रखने की इजाज़त देता है. हाल ही में लद्दाखी कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के ख़िलाफ़ इसी तरह के हालात में एक दंगे के बाद रासुका का इस्तेमाल किया गया था, पुलिस का आरोप है कि उन्होंने यह दंगा भड़काया था.

राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून का ग़लत इस्तेमाल

आंकड़ों से रासुका के ग़लत इस्तेमाल का पता चलता है, जैसा कि आर्टिकल 14 ने 2023 में रिपोर्ट किया था, नौ सालों के 101 मामलों का उदाहरण देते हुए दिखाया गया कि रासुका और इसके जैसे दूसरे क़ानून न्याय तथा निष्पक्षता के स्थापित सिद्धांतों में कैसे बाधक हैं.

जावेद की बहादुर बड़ी बेटी ने ऑनलाइन एक वीडियो पोस्ट किया जिसमें उसने इस बात की आशंका व्यक्त की कि सरकार उनके घर पर बुलडोज़र चला सकती है.

10 जून की आधी रात के आसपास एक पुलिस यूनिट उनके घर आई, जिनमें महिला पुलिस अधिकारी भी थीं. उन्होंने कहा कि जावेद का परिवार उनसे पुलिस लॉकअप में मिल सकता है और उन्हें कुछ कपड़े और उनकी दवाएं दे सकता है.

जावेद की पत्नी परवीन फ़ातिमा और छोटी बेटी सुमैया फ़ातिमा ने उनका सामान पैक किया और महिला अधिकारियों के साथ चली गईं. लेकिन, पुलिस लॉकअप में उन्हें जावेद से तो नहीं मिलने दिया गया, बल्कि उन्हें भी एक थाने में बिठा लिया गया. उन्होंने लकड़ी की बेंचों पर बैठकर एक डरावनी रात बिताई.

सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद जावेद.

अगला दिन भी बीत गया, फिर भी पुलिस ने उन्हें रिहा नहीं किया. एक और रात आ गई. इस बार उन्हें थाने में ज़मीन पर लेटने और सोने के लिए दरी दी गई.

तीसरे दिन सुबह, पुलिस ने जावेद की पत्नी परवीन फ़ातिमा और बेटी को रिहा कर दिया, लेकिन उन्हें घर न जाने का निर्देश दिया. इसके बजाय उन्हें उनके रिश्तेदारों के घर पहुंचा दिया गया. उसी सुबह, उनके घर पर बुलडोज़र चला दिया गया. आफ़रीन और उसकी गर्भवती भाभी गिरफ़्तारी के डर से भाग गई थीं. घर पर कोई नहीं था.

§

जावेद के परिवार के घर से भागने के लगभग तीन साल बाद, 1,640 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में, महाराष्ट्र के मालवन शहर में एक मुस्लिम कबाड़ व्यापारी का किशोर बेटा अपने माता-पिता के साथ अपने छोटे से अपार्टमेंट में टीवी देख रहा था. 23 फरवरी 2025 को भारत और पाकिस्तान के बीच एक रोमांचक क्रिकेट मैच हो रहा था.

एक स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता, सचिन संदीप वराडकर ने दावा किया कि जब वह उनके घर के पास से गुज़र रहा था, तो उसने लड़के को पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाते सुना. वराडकर ने स्थानीय पुलिस में शिकायत की.

लड़के और उसके माता-पिता के ख़िलाफ़ कई धाराओं के तहत आरोप लगाए गए, जिसमें सांप्रदायिक शांति भंग करने और राष्ट्रीय एकता के ख़िलाफ़ काम करने का आरोप शामिल था.

तीन दिन बाद, लड़के को हिरासत में ले लिया गया और क़ानून हाथ में लेने वाले नाबालिग़ों के लिए बने एक ऑब्ज़र्वेशन होम में भेज दिया गया, और उसके माता-पिता को गिरफ़्तार कर लिया गया.

फिर बिना किसी नोटिस और बिना किसी क़ानूनी प्रक्रिया के स्क्रैप डीलर की दुकान को गिराने के लिए बुलडोज़र आ गए.

यह ध्यान देने वाली बात थी कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि तीन महीने से भी कम समय पहले, 9 नवंबर 2024 को, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एक ऐसा फ़ैसला सुनाया था जिसे बड़े पैमाने पर एक ऐतिहासिक फ़ैसला माना गया था.

तब तक यह साफ़ हो गया था कि भारत में तोड़फोड़ की घटनाएं बढ़ गई थीं, और मुसलमान ख़ास तौर पर निशाने पर थे.

ऐसी घटनाओं से सुरक्षा

वकीलों के एक ग्रुप, हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क (एचएलआरएन) ने 2024 की एक रिपोर्ट में बताया कि वे 2017 से रिकॉर्ड रख रहे हैं उसके बाद से अब तक 2024 में सबसे ज़्यादा तोड़फोड़ हुई है.

उसी साल, ग्लोबल एडवोकेसी ग्रुप एमनेस्टी इंटरनेशनल ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें चार भाजपा राज्यों में 128 तोड़फोड़ की घटनाओं का अध्ययन किया गया और पाया गया कि ‘राज्य अधिकारी यह सुनिश्चित करने में पूरी तरह से नाकाम रहे कि इस तरह की तोड़फोड़ से प्रभावित लोगों को उचित क़ानूनी सुरक्षा मिले.’

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में पाया गया कि पूरे परिवार को सज़ा दी जा रही थी, ‘जिसमें परिवार के सदस्यों को मनमाने ढंग से हिरासत में लेना, और उनके घरों और व्यावसायिक स्थलों को ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से तोड़ना शामिल है… यह सामूहिक और मनमाने ढंग से दी जाने वाली सज़ा का एक रूप है जो निष्पक्ष सुनवाई, पर्याप्त आवास, गरिमा और समानता के अधिकारों का घोर उल्लंघन करता है.’

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में कहा गया कि बिना उचित प्रक्रिया के, सिर्फ़ कथित आपराधिक गतिविधि के आधार पर किसी व्यक्ति की संपत्ति को गिराना असंवैधानिक है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 अंतर्गत जीवन के मौलिक अधिकार के तहत मिले आश्रय के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है.

जस्टिस गवई और जस्टिस विश्वनाथन ने ऐसी तोड़फोड़ पर रोक लगा दी क्योंकि ये अन्यायपूर्ण ‘सामूहिक सज़ा’ के बराबर थीं, जिसका असर न सिर्फ़ आरोपी पर बल्कि उसके निर्दोष परिवार के सदस्यों पर भी पड़ता था.

फिर भी, जब मालवन में घर गिराया गया, तो सत्ताधारी शिंदे शिवसेना के एक विधायक, नीलेश राणे, जो अब महाराष्ट्र सरकार में मंत्री हैं, ने सोशल मीडिया पर तोड़फोड़ की तस्वीरें और वीडियो पोस्ट की, और पुलिस तथा नगर प्रशासन के द्वारा की गई तेज़ कार्रवाई की तारीफ़ की.

2025 में, आर्टिकल 14 ने रिपोर्ट किया कि कैसे राणे ने मुसलमानों को ‘पाकिस्तानी दलाल, हरा सुअर और हरा सांप’ कहकर, उन्हें कपड़े उतारकर पीटने की धमकी देकर और हिंदुओं से उनका बहिष्कार करने तथा मस्जिदों को गिराने की अपील करके राजनीतिक पूंजी बनाई. पुलिस ने कोर्ट के निर्देश पर उनके ख़िलाफ़ 20 एफआईआर दर्ज कीं, जिनमें से 19 पिछले दो सालों में दर्ज की गईं.

15 दिसंबर 2024 को, राणे, जो पहले कांग्रेसी थे और जिन्होंने कभी नरेंद्र मोदी की आलोचना की थी और आरएसएस का मज़ाक़ उड़ाया था, ने कैबिनेट मंत्री के तौर पर शपथ ली, जो न सिर्फ़ भाजपा की राजनीतिक सहनशीलता बल्कि नफ़रत भरी बातों के लिए इनाम देने के उसके अपने पैटर्न के अनुकूल था.

फरवरी 2025 में, इंडिया हेट लैब ने पिछले साल अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हेट स्पीच की 1,165 घटनाओं को डॉक्यूमेंट किया, जिनमें सबसे ज़्यादा हेट स्पीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने दिए थे- और मुसलमान सबसे ज़्यादा निशाने पर थे, हेट स्पीच की रिकॉर्ड की गई 98.5% घटनाएं उन्हीं के ख़िलाफ़ थीं.

§

मेरा तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला काफ़ी नहीं था, क्योंकि इस फ़ैसले में इस बात को नहीं माना गया कि तोड़फोड़ की हाल की कई घटनाएं ग़ैर-क़ानूनी और असंवैधानिक थीं, न सिर्फ़ इसलिए कि सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया-जो कई दशकों से होता आ रहा है-बल्कि इसलिए भी कि ये मुख्य रूप से सिर्फ़ एक समुदाय, भारतीय मुसलमानों को निशाना बनाती थीं.

जैसा कि हम इस सीरीज़ में देखेंगे, केंद्र सरकार और भाजपा शासित राज्यों में कार्यपालिका, सुप्रीम कोर्ट के साफ़ निर्देशों की अवहेलना करते हुए, बदले की भावना के साथ पूरी दबंगई का प्रदर्शन करते हुए, मुख्य रूप से मुसलमानों को निशाना बनाने वाली इन ग़ैर-क़ानूनी तोड़फोड़ को जारी रखे हुए है.

राजनीतिक नेतृत्व के ग़ैर-क़ानूनी कामों को रोकने में असमर्थता

मेरा यह तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि, कम से कम मेरे लिखने के समय तक, उसने सीनियर राजनीतिक नेतृत्व को इन सरकारी ग़ैर-क़ानूनी कामों को करने से रोकने की ज़रूरत महसूस नहीं की, जो इन कामों का आदेश देते हैं और राज्य की अराजकता का जश्न मनाते हैं, उन्हें सज़ा देना तो दूर की बात है.

दरअसल, 3 जून 2025 को, मॉरीशस यूनिवर्सिटी में पहले सर मॉरिस राल्ट मेमोरियल लेक्चर में बोलते हुए जस्टिस गवई ने अवैध तोड़फोड़ पर अपने 2024 के फ़ैसले का ज़िक्र किया.

उन्होंने कहा, ‘सिर्फ़ क़ानूनी होने से निष्पक्षता या न्याय नहीं मिलता. यह याद रखना ज़रूरी है कि किसी चीज़ के सिर्फ़ क़ानूनी होने का मतलब यह नहीं है कि वह सही है.’

जस्टिस गवई ने कहा, ‘इतिहास में इस दर्दनाक सच्चाई के कई उदाहरण मिलते हैं. क़ानून का राज सिर्फ़ नियमों का एक सेट नहीं है. यह एक नैतिक ढांचा है जिसे समानता बनाए रखने, इंसानी गरिमा की रक्षा करने और एक विविध तथा जटिल समाज में शासन का पथप्रदर्शन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है. इस फ़ैसले ने एक साफ़ संदेश दिया कि भारतीय न्याय व्यवस्था क़ानून के राज से चलता है, न कि बुलडोज़र के राज से.’

जब तोड़फोड़ का इस्तेमाल मुस्लिम विरोधी उग्र-राष्ट्रवाद की मदद के लिए किया जाता है तो उन्हें ख़ास तौर पर सेलिब्रेट किया जाता है. 22 अप्रैल 2025 को जम्मू और कश्मीर  के पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा 26 नागरिकों की हत्या के बाद इस आतंकी हमले से जुड़े होने के शक के आधार पर राज्य सरकार ने ‘कंट्रोल्ड धमाकों’ का इस्तेमाल करके कम से कम आठ लोगों के घरों को गिरा दिया.

ऐसा बदला सिर्फ़ कश्मीर तक ही सीमित नहीं था. उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के हिस्से गुरुग्राम में भी, असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले 300 बांग्ला भाषी मुस्लिम प्रवासी मज़दूरों के घरों को गिरा दिया गया, और उन्हें सिर्फ़ उनकी धार्मिक पहचान की वजह से संदिग्ध रूप से आतंकी हमले से जोड़ा गया.

§

इस तरह के सरकारी हमलों को छह महीने बाद फिर दोहराया गया, जब 10 नवंबर को देश की राजधानी के पुराने शहर में ऐतिहासिक लाल क़िले के पास एक कार में धमाका हुआ, जिसमें कम से कम 12 लोग मारे गए.

केंद्र सरकार ने घोषणा की कि उनकी जांच में पता चला है कि धमाके वाली कार को डॉ. उमर नबी चला रहे थे, क्योंकि धमाके वाली जगह से लिए गए डीएनए सैंपल डॉ. उमर की माँ के सैंपल से मैच हो गए हैं.

जल्द ही बदले की कार्रवाई करते हुए अधिकारियों ने जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में मुख्य संदिग्ध डॉ. नबी के परिवार के घर को धमाके से उड़ा दिया. घर मलबे में तब्दील हो गया, और धमाके से आस-पास के कई घरों को भी नुक़सान पहुंचा. अधिकारियों के लिए शायद यह गर्व की बात रही होगी कि उन्होंने घर को तबाह करने से पहले परिवार को कोई नोटिस भी नहीं दिया.

इस विध्वंस की आलोचना करते हुए, श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने 14 नवंबर 2025 को एक्स (पहले ट्विटर) पर पोस्ट किया कि ‘घर गिराने से ‘सज़ा’ नहीं मिलेगी’. इससे सिर्फ़ ‘सामूहिक पीड़ा’ ही होगी.

मेहदी ने अपनी पोस्ट में लिखा, ‘कश्मीर की कड़ाके की ठंड में बिना किसी सबूत/कोर्ट के आदेश या किसी क़ानून के, जो उन्हें घटना से जोड़ता हो, पूरे परिवार को बेघर करना क्रूरता का काम है. इससे आतंकी हमले में खोई गई बेगुनाह ज़िंदगियों को न्याय नहीं मिल जाता है, और न ही इससे न्याय का मक़सद पूरा होता है.’

मेहदी ने लिखा, ‘क़ानूनी जांच के ज़रिए असली अपराधियों को जवाबदेह ठहराया जाए. बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां, ज़बरन पूछताछ और ग़ैर-क़ानूनी तोड़फोड़ से शांति नहीं आएगी; ये कश्मीर को दशकों पीछे धकेल देंगे.’

घर उजाड़ने से आतंकवाद रुका क्या?

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी लाल क़िले धमाके के आरोपी के घर को गिराए जाने की आलोचना की. उन्होंने 14 नवंबर 2025 को पत्रकारों से कहा, ‘अगर ऐसे कामों से आतंकवाद रुक सकता, तो अब तक रुक गया होता. पहलगाम हमले के बाद कितने घर उड़ाए गए? क्या इससे (आतंकवाद) रुका? मुझे डर है कि ऐसे काम ग़ुस्से को और भड़काते हैं.’

जम्मू-कश्मीर में ये तोड़फोड़ कोई अपवाद नहीं थे.

जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता ख़ुर्रम परवेज़ – जो पिछले चार सालों से जेल में हैं – के नेतृत्व वाले जम्मू और कश्मीर कोएलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी और लीगल फोरम फॉर कश्मीर ने 2020 और 2024 के बीच सेना या अर्धसैनिक बलों द्वारा सैन्य अभियानों या आतंकवादी हिंसा के आरोपी कश्मीरी पुरुषों के ख़िलाफ़ बदले की कार्रवाई के बहाने कम से कम 1,172 नागरिक घरों को गिराए जाने का रिकॉर्ड दर्ज किया है.

राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय क़ानून में ऐसा कुछ भी नहीं है जो क़ानूनी तौर पर ऐसे विध्वंस को मंज़ूरी देता हो या सिफ़ारिश करता हो.

विध्वंस पर 2024 की एमनेस्टी इंटरनेशनल रिपोर्ट ने राज्य के नगर पालिका और भूमि विनियमन क़ानूनों की समीक्षा की, और पाया कि वे पहले ‘वास्तविक’ परामर्श, पर्याप्त नोटिस, मुआवज़े और वैकल्पिक निपटान के मामले में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों से काफ़ी नीचे थे.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘राज्य के अधिकारी तोड़फोड़ की ऐसी कार्रवाई करते समय घरेलू क़ानूनों में बताए गए मामूली प्रक्रियाओं का पालन करने में भी नाकाम रहे.’

§

हथियारों से लैस गार्ड की निगरानी में जावेद को जिस हॉस्पिटल वार्ड में भर्ती किया गया था वहां एक बड़ा टेलीविज़न था. 12 जून 2022, रविवार को, उन्होंने न्यूज़ रिपोर्ट सुनीं जिनमें उन्हें शुक्रवार के विरोध प्रदर्शनों का ‘मास्टरमाइंड’ बताया गया था.

रविवार सुबह, उन्होंने देखा – जैसा कि उन्होंने बताया, वह हैरान और दुखी थे – कि बुलडोज़र उनके घर को गिरा रहे थे. अपने रिश्तेदारों के घर में, उनकी पत्नी और बेटियों ने भी टेलीविज़न पर देखा कि बुलडोज़र उनके घर को गिरा रहे हैं.

ध्वस्त के जाने से पहले (बाएं) और बाद में जावेद मोहम्मद का घर. (फोटो साभार: हरकारा)

दो मंज़िला घर और जिस ज़मीन पर वह बना था, वह जावेद की पत्नी परवीन का था. अगर शुक्रवार के विरोध प्रदर्शनों में जावेद की कथित भूमिका के कारण उन्हें सज़ा देने के लिए घर गिराया जा रहा था, तो प्रशासन को इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा कि घर के मालिक वह नहीं थे.

नगरपालिका अधिकारियों ने दावा किया कि घर अवैध रूप से बनाया गया था और उन्होंने 25 मई को नोटिस भेजा था. परिवार ने इस बात से इनकार किया. अधिकारियों ने घर के दरवाज़े पर नोटिस सिर्फ़ एक रात पहले चिपकाया था, जब घर के सभी लोगों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया था या वे घर से चले गए थे.

नगरपालिका सालों से उस घर से टैक्स वसूल रही थी, लेकिन उसने कभी नहीं कहा कि बिल्डिंग अवैध है. उन्होंने तर्क दिया, और अगर सच में घर अवैध रूप से बनाया गया था, तो उसी गली और दूसरी गलियों के दर्जनों घरों को क्यों नहीं गिराया गया, जबकि उनकी क़ानूनी स्थिति भी परवीन फ़ातिमा के घर जैसी ही थी?

बुलडोज़र द्वारा घर गिराए जाने से पहले अधिकारियों ने पड़ोसियों से कहा कि उनके पास घर से क़ीमती सामान निकालने के लिए बस कुछ ही मिनट है, वे जो सामान निकाल सकते हैं निकाल लें. ज़्यादातर पड़ोसी इतने डरे हुए थे कि हिल भी नहीं पाए. कुछ पड़ोसी भागकर घर के अंदर गए और जो भी क़ीमती चीज़ें उन्हें दिखीं, उन्हें बाहर निकाल लाए.

उसके बाद, एक बड़ी भीड़ और टेलीविज़न कैमरों वाले रिपोर्टरों के सामने घर को गिरा दिया गया.

लाइव रिपोर्टिंग करते हुए कुछ टेलीविज़न रिपोर्टर अपने सामने घर को ढहते हुए देखकर ख़ुश हो रहे थे. एक ने कहा, ‘यह किसी आदमी का घर नहीं है. यह एक दंगाई का घर है, और उसे वही मिला है जिसका वह हक़दार था.’ दूसरे ने कहा, ‘देखो उसके पास कितनी किताबें हैं. उसे आतंकवादी बनने के बजाय ये किताबें पढ़नी चाहिए थीं!’

घर गिरा दिया गया, बुलडोज़र चले गए, पत्रकार चले गए, और फिर लोग मलबे की छानबीन करने आ गए ताकि वे लूटने लायक़ कुछ भी ढूंढ़ सकें.

जावेद ने उस पल को याद करते हुए मुझे बताया कि जब वह अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए अपना घर तबाह होते देख रहे थे तब उन्हें कैसा लग रहा था.

उन्होंने कहा, ‘अंदर से मेरी आत्मा रो रही थी. मैं रोने लगा, और जल्द ही मेरे साथ मौजूद दूसरे लोगों की आंखों में भी आंसू आ गए. उन्होंने मुझसे न देखने के लिए कहा, लेकिन मैं कैसे नज़रें हटा सकता था? हमारी ज़िंदगी भर की सारी जमा-पूंजी मलबे में तब्दील हो गई थी. मैंने सोचा-क्या मेरी समाज सेवा की वजह से मेरे परिवार को यह सब भुगतना पड़ रहा है?’

‘मेरी पत्नी और छोटी बेटी ने कितनी बार मुझसे यह सब छोड़ने और घर पर शांति से रहने की गुज़ारिश की थी. अगर मैंने उनकी बात मान ली होती, तो वे बेघर नहीं होते.’

एक्टिविस्ट जावेद के घर पर बुलडोज़र एक्शन.

‘अपना घर टूटने से बड़ा कोई दर्द नहीं है’

जावेद की पत्नी और बेटियों के पास सच में ऐसी कोई जगह नहीं थी जहां वे जा सकें. कुछ रिश्तेदारों ने उन्हें कुछ रातों के लिए पनाह दी. लेकिन हर कोई डरा हुआ था कि अगर उन्होंने उन्हें ज़्यादा समय तक अपने पास रखा, तो बुलडोज़र उनके घरों तक भी पहुंच सकते हैं.

बेटियों ने रोते हुए बताया, ‘अपने घर के टूटने से बड़ी कोई पीड़ा नहीं है. जेल भी इतनी बुरी नहीं होती.’

प्रयागराज में लोग उन्हें घर किराए पर देने से भी डर रहे थे. आख़िरकार, एक दूर के रिश्तेदार ने उन्हें शहर के बाहरी इलाक़े में एक छोटा-सा घर किराए पर दिया. उन्हें पता चला कि नौ दिन बाद, जावेद और कुछ दूसरे क़ैदियों को 320 किलोमीटर दूर देवरिया की दूसरी जेल में भेज दिया गया. इससे उनके परिवार के लिए उनसे जेल में मिलना और भी मुश्किल हो गया.

उनकी बेटी ने मुझे बताया, ‘जेल बहुत महंगी जगह है. हर बार जब हम उनसे मिलने जाते थे, तो पैसे ख़र्च होते थे. हम उन्हें हर महीने के ख़र्च के लिए पैसे देते थे. और फिर किराया भी देना होता था. लेकिन हमारा घर और हमारा सारा सामान बर्बाद हो चुका था. हमारे पिता जेल में थे, हर महीने पैसे कमाने वाला कोई नहीं था, और समुदाय के लोग हमारी मदद करने से कतराते थे कि कहीं उनकी निशानदेही न हो जाए. वे बहुत मुश्किल महीने थे.’

जावेद पर सबसे पहले शुक्रवार की नमाज़ के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों और हिंसा से जुड़े पांच अपराधों का आरोप लगाया गया. इसके बाद, उन पर रासुका के तहत आरोप लगाया गया. इस क़ानून के तहत गठित सलाहकार पैनल के सामने उन्हें अपने बचाव के लिए किसी वकील की मदद लेने की इजाज़त नहीं दी गई, जिससे उनकी ज़मानत की संभावना ख़त्म हो गई.

इलाहाबाद हाईकोर्ट को उनकी निवारक हिरासत के ख़िलाफ़ उनकी याचिका पर सुनवाई करने में 10 महीने लग गए, लेकिन उसने तुरंत कोई आदेश पारित नहीं किया.

इसके बाद, उनके ख़िलाफ़ तीन और आपराधिक मामले दर्ज किए गए. फिर उन पर गैंगस्टर्स और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत आरोप लगाया गया. इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा आख़िरकार उन्हें ज़मानत दिए जाने के बाद, उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन पर शस्त्र अधिनियम, 1959 के तहत आरोप लगाया.

इस बार आरोप यह था कि पुलिस ने घर गिराए जाने के बाद उनके घर से एक 12-बोर और एक 315-बोर की पिस्तौल बरामद की. घर गिराए जाने के दौरान बहुत से लोग और पत्रकार वहां मौजूद थे मगर किसी ने भी घर गिराए जाने के दौरान या बाद में कोई पिस्तौल नहीं देखा. जावेद ने इस बात से इनकार किया कि उसके पास कोई पिस्तौल थी.

आख़िरकार, 21 महीने बाद और कई सख़्त क़ानूनों के तहत कई आपराधिक आरोप झेलने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया.

जावेद के ख़िलाफ़ इन मामलों की सुनवाई करने वाली अलग-अलग अदालतों के क्या निष्कर्ष थे? ज़िला अदालत के जजों ने पाया कि जावेद का नाम आरोपी के तौर पर दर्ज नहीं था. हालांकि पुलिस ने दावा किया कि जावेद का आपराधिक इतिहास है, लेकिन वह यह जानकारी नहीं दे पाई कि उनको कब और किस अपराध में सज़ा मिली.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस विक्रम डी. चौहान ने 5 फरवरी 2024 को जावेद को ज़मानत देते हुए अपने आदेश में कहा कि पुलिस के आरोप ‘अस्पष्ट’ थे और उनका कोई ‘ठोस आधार’ नहीं था. पुलिस ने यह साबित करने के लिए ‘कोई ख़ास साक्ष्य’ नहीं दिया जिससे साबित हो सके कि वे किसी गैंग के लीडर या ऑर्गनाइज़र थे.

जस्टिस चौहान ने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि मोहम्मद जावेद की हिंसा में ‘मुख्य भूमिका’ थी या उन्होंने भीड़ को उकसाया था. जस्टिस चौहान ने कहा, ‘भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के आलोक में, आवेदक के ख़िलाफ़ बिना किसी ठोस जानकारी और सबूत के लगाए गए सामान्य आरोप अपने आप में आवेदक को ज़मानत देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकते.’

जस्टिस अजय भनोट ने पूरे मामले से जावेद को पूरी तरह बरी कर दिया.

जस्टिस भनोट ने कहा, ‘वह क़ानून मानने वाला नागरिक है जो देश की एकता और अलग-अलग समुदायों के बीच भाईचारे को अपने दिल के बहुत क़रीब रखता है. आवेदक ने न तो कोई ऐसा मैसेज पोस्ट किया है और न ही करेगा जो समाज में सामाजिक सद्भाव को बिगाड़े. शुक्रवार की नमाज़ के बाद कई लोग इकट्ठा हुए थे, जिसके लिए आवेदक को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. न ही आवेदक कुछ लोगों द्वारा की गई हिंसा की ग़ैर-ज़िम्मेदाराना हरकतों के लिए दोषी है.’

(हर्ष मंदर शांति तथा न्याय कार्यकर्ता और लेखक है. लेख के लिए उमैर ख़ान ने शोध सहायता की है. इस लेख के लिए डायसपोरा इन एक्शन फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स से सहयोग मिला है.)

(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)