मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने शुक्रवार (23 जनवरी) को सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं सागर गोरखे और रमेश गायचोर को ज़मानत दे दी, जिन्हें 2018 के एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार किया गया था. गोरखे और गायचोर दोनों को 2 सितंबर, 2020 को गिरफ्तार किया गया था और तब से वे जेल में बंद हैं.
उल्लेखनीय है कि जस्टिस एएस गडकरी और जस्टिस एससी चंदक की खंडपीठ ने मुंबई की विशेष एनआईए अदालत के फरवरी 2022 के आदेश के ख़िलाफ़ दायर अपील आवेदनों पर ज़मानत दी.
गोरखे और गायचोर उन 16 लोगों में शामिल हैं, जिन्हें एल्गार परिषद मामले में अलग-अलग समय पर गिरफ्तार किया गया था. इनमें से झारखंड के 84 वर्षीय पादरी और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी की जुलाई 2021 में हिरासत में मृत्यु हो गई. उनके वकील और समर्थकों ने जेल अधिकारियों पर चिकित्सीय लापरवाही का आरोप लगाया है.
अन्य जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया, उनमें प्रमुख वकील, कार्यकर्ता और शिक्षाविद शामिल थे, जिन्हें राज्य पुलिस और बाद में एनआईए ने प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का सदस्य बताया है.
कुल 10 आरोपियों—वरवरा राव, सुधा भारद्वाज, आनंद तेलतुंबडे, वर्णन गोंजाल्विस, अरुण फरेरा, शोमा सेन, गौतम नवलखा, सुधीर धवले और रोना विल्सन – को ज़मानत मिल चुकी है और वे रिहा हो चुके हैं.
नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने ज्योति जगताप को अंतरिम ज़मानत दी. आरोपी महेश राउत को भी सुप्रीम कोर्ट ने छह हफ्ते की मेडिकल ज़मानत पर रिहा किया था, जिसे बाद में बढ़ाया गया.
मालूम हो कि दोनों सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं की रिहाई के आदेश के बाद अब गिरफ्तार किए गए 16 लोगों में से केवल मानवाधिकार कार्यकर्ता सुरेंद्र गाडलिंग ही जेल में रहेंगे. इस मामले में गाडलिंग को जून 2018 में सबसे पहले गिरफ्तार किया गया था और तब से वे जेल में हैं.
ज्ञात हो कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर हेनी बाबू को पिछले महीने ही ज़मानत मिली थी.
सागर गोरखे और रमेश गायचोर के ज़मानत आदेश के विस्तृत दस्तावेज अभी अदालत द्वारा उपलब्ध नहीं कराए गए हैं. इन दोनों कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ वकील मिहिर देसाई ने किया था.
हालांकि, दोनों को 1 लाख रुपये के ज़मानत बॉन्ड जमा करने होंगे और प्रत्येक को ज़मानतदार के साथ एनआईए के मुंबई कार्यालय में हर महीने के पहले सोमवार को उपस्थित होना होगा.
एफआईआर में आरोपी के रूप में नामजद होने बावजूद गोरखे और गायचोर को अन्य आरोपियों के दो साल बाद गिरफ्तार किया गया था. दोनों का संबंध कबीर कला मंच से रहा है, जो महाराष्ट्र में जाति-विरोधी अभियानों में शामिल एक सांस्कृतिक समूह है.
2011 में तत्कालीन कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने इस संगठन पर राज्य में प्रतिबंधित नक्सल आंदोलन का मुखौटा होने का आरोप लगाया था. तब से कबीर कला मंच से किसी भी तरह का संबंध कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा अवैध माना जाता है.
गोरखे और गायचोर दोनों को पहले भी जेल हो चुकी है और उनके ख़िलाफ़ एक पुराना मामला अभी भी लंबित है.
एल्गार परिषद मामले में, जिसे पहले पुणे की स्थानीय पुलिस संभाल रही थी और बाद में एनआईए ने अपने हाथ में ले लिया, इन दोनों और अन्य लोगों पर ‘अर्बन नक्सल’ होने का आरोप लगाया गया है.
इससे पहले उनकी ज़मानत याचिका खारिज करते हुए विशेष एनआईए अदालत ने एल्गार परिषद कार्यक्रम में आरोपियों की कथित भूमिका और प्रतिबंधित संगठनों से उनके संबंधों के एनआईए के दावों को स्वीकार कर लिया था. इन पर कड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए हैं.
गौरतलब है कि केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार को मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को अन्यायपूर्ण तरीके से गिरफ्तार करने और उन्हें लंबे समय तक जेल में रखने के लिए वैश्विक स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ा है.
हालांकि, एनआईए ने इस मामले में आरोपपत्र दाखिल कर दिया है, लेकिन सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई है – यह इस देश में यूएपीए के मामलों की धीमी गति का एक और उदाहरण है. ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया का मतलब हमेशा सज़ा ही होता है.
इस केस में एनआईए ने अभी तक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी आरोपियों को नहीं सौंपे हैं, जिन्हें वह महत्वपूर्ण बता रही है. आरोप अभी तक तय नहीं किए गए हैं.
(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
