श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर में सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के एक वरिष्ठ नेता नासिर असलम वानी को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिए जाने पर विपक्षी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और अन्य दलों ने कड़ी आलोचना की है.
इस संबंध में शनिवार (24 जनवरी) को जारी एक आदेश में सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) ने कहा कि वानी को जम्मू-कश्मीर के कैबिनेट मंत्री का दर्जा और सुविधाएं मिलेंगी. इसके तहत वानी को 80,000 रुपये का समेकित वेतन, दोनों राजधानियों में आवासीय सुविधा और मोटर गैराज विभाग से मुफ्त परिवहन सेवा दी जाएगी.
जीएडी ने बताया कि वानी की पदोन्नति को जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के आदेश से मंजूरी मिल गई है.
यह आदेश 16 अक्टूबर, 2024 को जीएडी द्वारा वानी को ‘जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री का सलाहकार’ नियुक्त किए जाने के एक साल से अधिक समय बाद जारी किया गया है. तब इस संबंध में कहा गया था कि उनकी नियुक्ति के नियम और शर्तें अलग से अधिसूचित की जाएंगी.
मालूम हो कि वानी श्रीनगर के खानयार से सांसद रह चुके हैं और वे 2024 में उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव हार गए थे. वानी जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के करीबी दोस्त और सत्तारूढ़ पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं. दोनों को अक्सर देश-विदेश में सार्वजनिक और निजी कार्यक्रमों में एक साथ देखा जाता है.
पीडीपी का विरोध
हालांकि, वानी को सरकार में शामिल किए जाने से नेशनल काउंसिल (एनसी) पर भाई-भतीजावाद के आरोप लगने लगे हैं. इससे सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा 2024 के चुनाव घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा करने में निर्वाचित सरकार की कथित विफलता के सवाल भी फिर से उठने लगे हैं.
इस मामले पर शनिवार को जीएडी द्वारा जारी आदेश की तस्वीर वाले एक पोस्ट में महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली पीडीपी ने वानी की पदोन्नति को एनसी के चुनावी घोषणापत्र के उन वादों में से एक से जोड़ा, जिसमें अनुच्छेद 370 की बहाली का आह्वान किया गया था.
पार्टी ने एक्स पर एक तंजभरे पोस्ट में कहा, ‘अनुच्छेद 370 का समाधान (अनुच्छेद 370 के लिए संघर्ष का संकल्प).’
अब्दुल्ला सरकार पर हमला करते हुए पीडीपी के वरिष्ठ नेता नईम अख्तर ने वानी की पदोन्नति को ‘महत्वपूर्ण उपलब्धि’ बताया, क्योंकि 2019 में अनुच्छेद 333 को निरस्त किए जाने के बाद भारत सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर को दी गई यह एकमात्र रियायत है.
अख्तर ने 2015 से 2018 तक जम्मू-कश्मीर में सत्ता संभालने वाली पीडीपी-भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में कार्य किया था.
गौरतलब है कि वानी की पदोन्नति अब्दुल्ला द्वारा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से राजधानी में मुलाकात के कुछ दिनों बाद सामने आई है. 2024 में सीएम का पदभार संभालने के बाद यह उनकी तीसरी मुलाकात थी.
21 जनवरी को जारी एक बयान में मुख्यमंत्री कार्यालय ने कहा था कि बैठक में ‘जम्मू और कश्मीर से संबंधित विभिन्न मामलों’ पर चर्चा हुई. हालांकि, वानी की पदोन्नति से कुछ दिन पहले हुई इस बैठक के समय को लेकर कश्मीर में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं.
उधर, जम्मू-कश्मीर भाजपा नेता शेख खालिद जहांगीर ने कहा कि वानी की पदोन्नति केंद्र सरकार द्वारा ‘ईमानदारी, योग्यता और राष्ट्रवादी प्रतिबद्धता’ को ‘स्वीकृति’ है.
वहीं, श्रीनगर के पूर्व मेयर जुनैद मट्टू ने संकेत दिया कि अब्दुल्ला ने शाह के साथ अपनी बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा की थी.
इस संबंध में सारा शाहीन ने एक्स पर पोस्ट किया, ‘नासिर असलम वानी बिना चुनाव लड़े या जीते ही मंत्री का दर्जा बनाए हुए हैं. वहीं उमर अब्दुल्ला सरकार की बहुचर्चित रोज़गार सृजन योजनाएं कागजों पर ही अटकी हुई हैं. बेरोज़गार युवा अभी भी घोषणापत्र के वादों के हकीकत में बदलने का इंतजार कर रहे हैं.’
अब्दुल्ला सरकार की विवादित नियुक्तियां
हालांकि, वानी की पदोन्नति पहला मुद्दा नहीं है जब सत्ता में आने के बाद अब्दुल्ला सरकार पर भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने के आरोप लगे हैं.
अब्दुल्ला के पदभार ग्रहण करने के कुछ महीनों बाद ही जम्मू-कश्मीर विधानसभा अध्यक्ष और वरिष्ठ राष्ट्रीय राष्ट्रीय नेता अब्दुल रहीम राथर के चचेरे भाई को सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद पर्यटन विभाग में ‘सलाहकार’ के रूप में नियुक्त किया गया था.
यह नियुक्ति स्पष्ट रूप से अब्दुल्ला के उन निर्देशों का उल्लंघन थी, जिनमें सरकार में सेवानिवृत्त अधिकारियों की ‘असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर पुन: नियुक्ति और कार्यकाल विस्तार’ पर रोक लगाई गई थी.
इस नियुक्ति की जम्मू-कश्मीर में कुछ विपक्षी दलों ने आलोचना की थी, जहां देश में बेरोज़गारी दर सबसे अधिक है.
जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, जिसके तहत पूर्ववर्ती राज्य को 2019 में विभाजित करके केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया था, में जम्मू और कश्मीर के उपराज्यपाल या मुख्यमंत्री के लिए ‘सलाहकार’ नियुक्त करने का कोई प्रावधान नहीं है.
हालांकि, पुनर्गठन अधिनियम केंद्र सरकार को लद्दाख के उपराज्यपाल के लिए सलाहकार नियुक्त करने का अधिकार देता है, जिसे 2019 में विधायिका रहित केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया था.
एनसी सरकार के 2024 में शपथ ग्रहण करने से पहले जम्मू-कश्मीर के पूर्व उपराज्यपाल जी.सी. मुर्मू के लिए कुछ सलाहकार नियुक्त किए गए थे. इसके बाद वर्तमान उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने पदभार संभाला था.
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