बीबीसी के युग पुरुष मार्क टली का जाना मेरे लिए निजी सदमा है जबकि उनके लाखों-करोड़ों चाहने वालों के लिए एक तकलीफ़देह ख़बर. उनका जाना पत्रकारिता ख़ासकर ‘रेडियो जर्नलिज़्म’ के लिए एक ऐसा नुक़सान है जिसकी शायद अब कभी भरपाई नहीं हो पाएगी.
मार्क टली 90 वर्ष पहले कलकत्ता में पैदा हुए थे लेकिन आज़ादी के बाद जब उनके माता-पिता इंग्लैंड वापस चले गए तो उनकी पढ़ाई-लिखाई लंदन में ही हुई. शुरू में उनका मन ईसाई पादरी बनने का था लेकिन चर्च के प्रतिबंध उन्हें रास नहीं आए और फिर उन्होंने बीबीसी से जुड़कर अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की.
मार्क टली ने 1964 में बीबीसी में काम करना शुरू किया. पहले वे बीबीसी हिंदी सर्विस के प्रमुख (प्रोग्राम ऑर्गनाइज़र) बने और फिर 1971 में इसके दक्षिण एशिया संवाददाता और दिल्ली में ब्यूरो प्रमुख बने. दरअसल, मार्क टली की दक्षिण एशिया ख़ासकर भारत-पाकिस्तान और बांग्लादेश के घर-घर में पहचान 1971 का बांग्लादेश युद्ध ‘कवर’ करने के कारण बनी.
रिपोर्टिंग के उस्ताद
बीबीसी से अपने लगभग तीन दशक के कार्यकाल (1964-94) के दौरान मार्क टली ने भारतीय उपमहाद्वीप की शायद ही ऐसी कोई बड़ी घटना हो जिसे उन्होंने कवर न किया हो. 1974-75 के जेपी आंदोलन की उन्होंने खूब रिपोर्टिंग की जिसकी परिणति में जून 1975 में आपातकाल लगा और प्रेस सेंसरशिप लागू की गई. जब मार्क टली ने सरकार के निर्देशों को मानने से इनकार कर दिया तो इसके नतीजे में उन्हें 24 घंटों के अंदर देश छोड़कर चले जाने को कहा गया.
1971-94 के 23 वर्षों के दौरान इमरजेंसी के 17-18 महीने ऐसे थे जब मार्क टली को भारत से दूर रहना पड़ा. लेकिन जैसे ही इमरजेंसी ख़त्म हुई और लोकसभा चुनावों की घोषणा हुई मार्क दिल्ली आ गए. उन्होंने इन चुनावों की धुआंधार रिपोर्टिंग की और इंदिरा गांधी को सत्ता के शिखर से उतरते और जनता पार्टी की सरकार को बनते हुए देखा. उन्होंने ढाई साल के दौरान (1977-80) जनता पार्टी और उसकी सरकार को भी ध्वस्त होते देखा और इंदिरा गांधी की सरकार में वापसी को भी.
इसी दौरान उन्होंने पाकिस्तान में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकार का तख़्तापलट, ज़िया उल हक़ की सैनिक तानाशाही और पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को फांसी दिए जाने की घटनाओं को भी कवर किया.
1980-84 के दौरान मार्क टली ने भारत की लगभग सभी प्रमुख घटनाओं को अपने सहयोगी सतीश जैकब के साथ कवर किया जिनमें असम की हिंसा और नेल्ली नरसंहार (1983), पंजाब में आतंकवाद और ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार’ राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और उस के बाद हुई हिंसा और सिखों का क़त्लेआम (1984), दिसंबर (1984) में हुई भोपाल गैस त्रासदी और लोकसभा चुनाव प्रमुख रूप से शामिल हैं.
‘ऑपरेशन ब्लूस्टार’ के दौरान अन्य विदेशी पत्रकारों के साथ मार्क टली को भी पंजाब छोड़ने का आदेश दे दिया गया था लेकिन उन्होंने अपने सहयोगी सतीश जैकब को अमृतसर में तैनात कर खुद दिल्ली में मोर्चा संभाला और कई माह तक इस घटना की रिपोर्टिंग की. बाद में मार्क टली और सतीश जैकब की जोड़ी ने मिलकर एक शानदार किताब लिखी ‘अमृतसर-मिसेज़ गांधीज़ लास्ट बैटल’.
यूं तो मैं मार्क टली का 1974-75 से श्रोता और शैदाई था जब वह जेपी आंदोलन और आपातकाल की घटनाओं की रिपोर्टिंग बीबीसी के लिए कर रहे थे लेकिन उनसे मुलाक़ात 1980 के दशक में उस समय हुई जब में लखनऊ में साप्ताहिक ‘रविवार’ का संवाददाता था और उन्होंने मुझे उत्तर प्रदेश में बीबीसी का ‘स्ट्रिंगर’ नियुक्त किया था. उसके बाद तो उनसे लगातार संपर्क बना रहा. 1989 के लोकसभा और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, 1991के लोकसभा और विधानसभा चुनाव 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस और फिर 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हमने साथ-साथ कवर किए.
6 दिसंबर की याद
इनमें सबसे यादगार घटना 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने और उस दिन हमारे साथ जो कुछ हुआ उससे जुड़ी हुई है. आपके जीवन में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिनके आप चश्मदीद गवाह होते हैं और जो आपके दिल दिमाग़ से कभी हटने का नाम नहीं लेती हैं और लगातार ‘कौंधती’ करती रहती हैं. 6 दिसंबर, 1992 को दिन दहाड़े अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ध्वस्त किया जाना मेरे जीवन की एक ऐसी ही घटना है जिसका मैं, मार्क टली के साथ खामोश तमाशाई था और जो एक ‘फ़्लैशबैक’ की तरह मेरे दिल में चलती रहती है.
उस समय मैं ‘हिंदी संडे ऑब्जर्वर’ के लिए काम कर रहा था और बीबीसी का स्ट्रिंगर भी था. साथ ही बीबीसी हिंदी और उर्दू सेवाओं के लिए ‘फोनो’ भी किया करता था. इसी सिलसिले में 5 दिसंबर को मैं फ़ैज़ाबाद पहुंचा और मार्क टली के साथ होटल शान-ए-अवध में रुका, जो अयोध्या को कवर करने वाले पत्रकारों का पसंदीदा ठिकाना हुआ करता था.
6 दिसंबर की सुबह, ठीक 10 बजे अयोध्या में संघ परिवार समर्थक कारसेवक बड़ी तादाद में इकठ्ठा होना शुरू हो गए. देश विदेश के सैकड़ों पत्रकारों ने भी बाबरी मस्जिद के सामने एक छत पर खुद को तैनात कर लिया. कारसेवक धीरे धीरे मस्जिद के पास जमा होने लगे और सुरक्षा घेरे की कंटीली तारों को तोड़कर मस्जिद में घुसना शुरू हो गए. उन्हें अब मस्जिद की दीवारों पर चढ़ते हुए और गुंबदों पर बैठे देखा जा सकता था.
मैं उस समय मार्क टली के साथ था. 11 बजकर 20 मिनट पर जैसे ही बाबरी मस्जिद का एक गुंबद गिरा मार्क ने फैजाबाद जाने का फैसला किया ताकि वे बाबरी मस्जिद पर हमले की पहली खबर दे सकें. उस समय मोबाइल फोन नहीं थे और लंदन में बीबीसी मुख्यालय से संपर्क का एकमात्र तरीका फैजाबाद में सेंट्रल टेलीग्राफ ऑफिस (सीटीओ) था.
मैं और मार्क दोपहर 12 बजे के करीब फैजाबाद पहुंचे जहां मार्क ने अपनी पहली रिपोर्ट फ़ाइल की. दोपहर 1 बजे हम अयोध्या वापस आने लगे जहां मस्जिद का बड़ा हिस्सा गिराया जा चुका था. हमें शहर के बाहरी इलाके में भीड़ ने रोक लिया. हम फैजाबाद वापस गए और पैरा मिलिट्री फोर्स यानी आरएएफ और सीआरपीएफ के अयोध्या जाने का इंतज़ार करने लगे. लेकिन उन्मादी भीड़ ने इन अर्ध सैनिक बलों को अयोध्या और फ़ैज़ाबाद के बीच एक रेलवे क्रॉसिंग पर रोक दिया. क्रासिंग बंद कर दिया गया और रास्ते में जले हुए टायर डाल दिए गए.
जब अयोध्या पहुंचने के हमारे सारे प्रयास विफल हो गए, तो एक पत्रकार मित्र विनोद शुक्ला की मदद से हम क़रीब 2 बजे बाबरी मस्जिद के पीछे तक पहुंचने में कामयाब हो गए, लेकिन तब तक वहां बाबरी मस्जिद के तीनों गुंबदों को ध्वस्त कर दिया गया था. जैसे ही हम अपनी कार से उतरे, त्रिशूल और लाठियों से लैस हिंसक कारसेवकों के एक समूह ने हम पर हमला कर दिया. उनमें से ज्यादातर स्थानीय निवासी थे और मार्क टली को हमारे साथ देखकर वे बेहद नाराज थे. वे जानते थे कि मार्क बीबीसी के पत्रकार हैं और वे अयोध्या के उनके कवरेज से नाखुश थे.
जैसे ही भीड़ हमारे ऊपर हमला करने के लिए इकट्ठी हुई और शायद हमें मार भी देती है लेकिन तभी उत्तेजित कारसेवकों में से एक ने सुझाव दिया कि हमें मारने से वहां चल रही विध्वंस की कारसेवा में बाधा आ सकती है और यह बेहतर होगा कि हमें बंद कर दिया जाए और बाद में हमें मारा जाए. हम पांच लोगों को पास की एक इमारत के एक कमरे में बंद कर दिया गया.
अगले दो घंटों में, भावनाओं का एक सैलाब हमारे ऊपर था क्योंकि एक ओर हम मस्जिद को तोड़े जाने की घटना कवर नहीं कर पा रहे थे और दूसरी ओर मौत का खतरा हमारे ऊपर मंडरा रहा था.
किसी तरह अयोध्या में एक महंत के ज़रिये शाम को लगभग 6 बजे हमें मुक्त कराया गया. हमें विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के स्थानीय कार्यालय में ले जाया गया, जहां अशोक सिंघल, प्रवीण तोगड़िया और भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं सहित प्रमुख विहिप नेता विध्वंस का जश्न मना रहे थे. मस्जिद से हटाई गई ‘रामलला’ की मूर्ति अब विहिप कार्यालय में थी, जहां नेताओं ने ‘रामलला के दर्शन’ के लिए लाइन लगाई हुई थी. विश्व हिंदू परिषद के स्थानीय कार्यालय में हमारे सिर पर ‘कारसेवकों’ वाली पट्टी बांधी गई और हमें उत्तर प्रदेश पुलिस के एक ट्रक में बिठा कर रात 8 बजे फ़ैज़ाबाद के होटल शान-ए-अवध पर उतार दिया गया.
दिलचस्प बात यह है कि इस घटना के बाद भी मार्क टली ने अयोध्या छोड़ने का फैसला नहीं किया जबकि हममें से बहुत से पत्रकार उसी रात अयोध्या से रवाना हो गए थे.
‘बहुत आला इंसान है साहब! बढ़िया ख़बरें देता है’
मार्क टली, भारतीय उपमहाद्वीप में किस प्रकार बीबीसी के पर्याय थे यह जानने के लिए 1990 में बीबीसी हिंदी सेवा के पचास वर्ष पूरे होने पर बीबीसी पूर्वी सेवा के उप प्रमुख डेविड पेज का एक एक लेख उद्धृत करना प्रासंगिक होगा.
अपने दिल्ली दफ्तर का ज़िक्र करते हुए वह लिखते हैं, ‘बीबीसी हिंदी सर्विस की चर्चा दिल्ली दफ़्तर के बिना पूरी नहीं हो सकती. हमारे दिल्ली संवाददाताओं का काम केंद्रीय महत्व का है. उसका मुख्यालय हज़रत ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास ही निजामुद्दीन ईस्ट में है और पास ही मुग़ल बादशाह हुमायूं का शानदार मक़बरा है. दफ्तर की इमारत मुख्य सड़क से हटकर एक पेट्रोल स्टेशन और टैक्सी स्टैंड के पीछे है जहां टैक्सी ड्राइवर धंधे के इंतज़ार में धूप सेंकते और ऊंघते रहते हैं. यह इमारत एक घर जैसी ही है बस बाहर लगे एक साइनबोर्ड से भेद खुल जाता है जिस पर लिखा है ‘मार्क टली’!’
एक वरिष्ठ ब्रितानी पत्रकार इयान जैक ने लिखा की एक बार एक टैक्सी ड्राइवर ने मुझसे पूछा कि ‘क्या आप मार्क टली को जानते हैं? मेरे हां कहने पर ऐसा लगा मनो दिन में पहली बार उस पर मेरा कुछ रोब पड़ा हो. कहने लगा ‘बहुत आला इंसान है साहब! बढ़िया ख़बरें देता है, नब्बे फ़ीसदी सही.’
मार्क टली ने अपनी रिपोर्टिंग के ज़रिए जो साख बनाई वह बहुत कम लोगों को नसीब हो पाती है. उनके नाम के साथ बीबीसी की किसी भी भाषा में पढ़ा गया उनका डिस्पैच या उनका ट्रेडमार्क साइन ऑफ ‘मार्क टली बीबीसी डेल्ही’ दुनिया को ये यक़ीन दिलाने के लिए काफी होता था कि ख़बर एक दम सही, खरी और सटीक है. इसमें कोई किंतु-परंतु नहीं है. ऐसी साख शायद अब किसी दूसरे पत्रकार को नसीब नहीं होगी.
बक़ौल मिर्ज़ा ग़ालिब ‘आईना क्यूं न दूं कि तमाशा कहें जिसे, ऐसा कहां से लाऊं कि तुझ-सा कहें जिसे’ मार्क साहब आपकी बहुत याद आएगी!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों देश में समाजवादी आंदोलन के इतिहास का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं.)
