अगस्त 1993 में बांकुड़ा ज़िले में अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट (एडीएम) एवं ज़िला परिषद के अतिरिक्त कार्यकारी अधिकारी का पद ग्रहण करने के कुछ दिनों बाद मैं अपने प्रथम दौरे पर निकला. पास के गांव से गुज़रते हुए मैंने एक झोपड़ी के सामने महिलाओं और बच्चों की भीड़ देखी. सेहुंड, जिसे बांग्ला में सीज गाछ कहते हैं, के लंबे कंटीले पौधों से घिरी फूस की छत वाली वह छोटी सी मिट्टी की झोंपड़ी थी.
बिना गाड़ी रुकवाए मैंने जिज्ञासा-वश साथ बैठे अपने वरिष्ठ सहकर्मी मुशिब साहब से पूछा, ‘ओखाने की होच्चे (वहां क्या हो रहा है)?’
मुशिब साहब राज्य के बाशिंदे तो थे ही उनका गांव भी बांकुड़ा ज़िले में ही था. उन्होंने सहजता से उत्तर दिया, ‘ओटा मनशार मंदिर, सार, आर आज के तो मनशार पूजो (वह मनसा मंदिर है, सर, और आज मनसा देवी की पूजा है).
ऐसा फूस-आच्छादित मंदिर मैंने कभी नहीं देखा था. कुछ दूर आगे एक और गांव में उसी तरह के मंदिर के पास हमने रुककर कुछ घड़ियां बिताईं. आज की पूजा उस छोटे मंदिर के अंदर न होकर उसके ठीक पास में सेहुंड की झाड़ के सामने हो रही थी. गोबर से लीपी हुई वेदी पर एक छोटा घड़ा और कुछ मिट्टी के हाथी-घोड़े स्थापित किए गए थे. यहीं मैंने बांकुड़ा के मशहूर मिट्टी के घोड़े को पहली बार अपने ग्रामीण परिवेश में, धार्मिक और लोक-सांस्कृतिक संदर्भ में देखा. वे घोड़े-हाथी उस पूजा में क्यों उपस्थित थे यह मैं उस समय नहीं जान पाया था.
इस वेदी पर मनसा देवी की मूर्ति न थी. वहां पर बिठाए उस घड़े को मनसा देवी का प्रतीक मान कर उसकी पूजा की जा रही थी. जब मनसा की मूर्ति बनाई जाती है तो अक्सर उनके सिर के ऊपर पांच, सात या और अधिक नागों की छतरी भी बनी होती है. ऐसी मूर्ति को मनशार चाल कहते हैं. वेदी के समक्ष पूजा तथा प्रसाद की कुछ सामग्री- कच्चे चावल, केले, इत्यादि रखे हुए थे. मिट्टी के एक छिछले पात्र का हवन कुंड बना लिया गया था और वयोवृद्ध पुजारी पूजा आरंभ कर चुके थे.
कुछ नवयुवतियां बैठी आपस में हंसी-मज़ाक़ कर रही थीं और कुछ महिलाएं खेलते बच्चों को बिठाने में जुटी हुई थीं. मुझे श्री मुशिब ने बताया कि मनसा पूजा का दिन व्रत का दिन होता है तथा कई घरों में खाना भी नहीं बनता. उस दिन हर घर में सेहुंड की एक छोटी-सी टहनी लाकर रख दी जाती है.

मनसा देवी की पूजा
मनसा सर्पों की देवी हैं. उनकी पूजा पश्चिम बंगाल में ही नहीं देश के कई उत्तरी राज्यों-राजस्थान, हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश, कुछ दक्षिणी राज्यों-आंध्र और छत्तीसगढ़, तथा कई पूर्वी राज्यों-बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और ओडिशा, में की जाती है.
बंगाल में पश्चिमी तथा दक्षिणी जिलों में-पुरुलिया, बांकुड़ा, पश्चिम मेदिनीपुर, बर्द्धमान, तथा दक्षिण 24 परगना में-मनसा देवी का विशेष महत्व तथा प्रचलन है. लेकिन उनकी जितनी व्यापक उपस्थिति या लोक संस्कृति पर जितना गहरा प्रभाव बांकुड़ा ज़िले में दिखता है उतना मुझे कहीं और देखने को नहीं मिला.
मनसा को कई कारणों से पूजा जाता है. जन-गण का विश्वास है कि वह सर्पों से उनकी रक्षा करती हैं, उनका विष हर लेती हैं. महिलाओं में मनसा देवी का एक विशेष स्थान है चूंकि उन्हें प्रजनन शक्ति के संरक्षण तथा इसकी वृद्धि के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है.
यह अचंभे की बात नहीं कि मनसा की सर्वाधिक मान्यता समाज के पिछड़े, गरीब तथा दलित वर्गों- जैसे बागदी या बाउड़ी जातियों-में है, उनमें जिन्हें सांपों का सबसे ज़्यादा भय है. ये समाज के वह समूह हैं जो खेत, जंगल या जलाशयों में ख़ाली पांव परिश्रम कर अपना जीवन यापन करते हैं, जिनके घर की मिट्टी की दीवारें और फूस की छतें सर्पों को भी शरण देती हैं, जिनके लिए विपत्ति के विरुद्ध आस्था ही सबसे शक्तिशाली कवच है.
इनमें वो जातियां भी हैं जो मूलतः इस क्षेत्र के आदिवासी थे तथा जिनकी पुरातन मान्यताओं को ब्राह्मणवादी मुख्यधारा में अल्प जगह मिलने में भी सदियां लग गयी है. इस श्रेणी में मनसा ही नहीं और भी कुछ देवी देवता हैं जिनकी उत्पत्ति वेदों या पुराणों में नहीं बल्कि देशज जनजातियों तथा दलित समाज में हुई, जैसे चंडी- लेकिन दुर्गा नहीं, एक अन्य स्थानीय उपज, फसल और वर्षा की देवी, धर्म ठाकुर-स्थानीय देवता, तथा षष्ठी-शिशुओं की रक्षक.
ऐसे देवी-देवताओं का प्रचार और प्रसार 13वीं से 18वीं सदी के बीच इनके लिए लिखे मंगल काव्यों द्वारा हुआ जो इनकी शक्ति, महिमा एवं क्रोधी व घातक मनोभाव का बखान करते हैं. बंगाल में मनसा देवी के पंथ के विस्तार को देख कर भान होता है कि सम्भवतः मनसा मंगल इन काव्यों में सबसे ज़्यादा कारगर रहा है.
मनसा मंगल की कहानी
मनसा मंगल की कहानी उतनी ही सरल है जितनी इसकी सीख. मनसा शिव की पुत्री हैं. पर चूंकि उनकी माता अनार्य हैं उनका अपने परिवार में तिरस्कार ही होता है. इसके बावजूद कई समूहों में उन्हें मान मिलता है और उनकी पूजा की जाती है. लेकिन एक उच्च कुल का लोहे का धनाढ्य व्यापारी जिसका नाम चांद सौदागर है शिव का भक्त तो है किंतु मनसा देवी को प्रणाम करने से साफ़ इनकार कर देता है.
मनसा इस धृष्टता से अत्यंत क्रुद्ध हो जाती हैं. एक-एक कर चांद सौदागर के छह पुत्रों की सर्पदंश से मृत्यु हो जाती है और साथ ही वह अपनी धन-संपत्ति से भी हाथ खो बैठता है. फिर भी चांद सौदागर अपने हठ से डिगता नहीं. उसके सातवें और अंतिम पुत्र लखिंदर की शादी बेहुला नाम की कन्या से होती है. विवाह की रात ही लखिंदर को एक विषैला सांप डंस लेता है और उसकी मृत्यु हो जाती है. पर बेहुला नियति के इस वार को मानने से राज़ी नहीं होती. वह लखिंदर के प्राणहीन शरीर को लेकर इंद्र के दरबार में जा पहुंचती है और अपनी भक्ति, पवित्रता तथा वाक्कुशलता से देवताओं को द्रवित कर देती है.
देवताओं के तीव्र दबाव के कारण चांद सौदागर मनसा की पूजा करने को तैयार तो हो जाता है परंतु वह बाएं हाथ से उन्हें अर्चना अर्पण करता है. मनसा को भी देवलोक के दबाव के चलते इस अर्चना को स्वीकार कर लखिंदर तथा उसके छह भाइयों को जीवित कर वापस पृथ्वी लोक में लाना पड़ता है.
मंगल काव्यों का ढांचा काफ़ी हद तक समरूप है. कोई देवी या देव हैं जिनकी पूजा करने से लोग, विशेष रूप से जो धनवान और सामर्थ्यवान हैं, कतराते हैं. समाज का बड़ा अंश उन देव-देवियों के सामने नतमस्तक हो जाता है परंतु एक अत्यंत ही अभिमानी व्यक्ति अपने हठ पर अड़ा रहता है और उनकी महिमा को मानने से इनकार करता रहता है. वह देव या देवी तब तक उस पर तरह-तरह के क़हर बरपाते हैं जब तक वह हार मानकर उनकी शरण में न आ जाता है. इस तरह उन देव-देवियों की मान्यता स्थापित हो जाती है.
मनसा देवी की गाथा को हम अपने देश के आदिवासी तथा देशज सांस्कृतिक परंपराओं दोनों का ही मुख्य सामाजिक धारा में लड़खड़ाते, बाधित, और अधूरे समावेश की कहानी समझ सकते है. शिव की पुत्री होकर भी वह सवर्ण जातियों की श्रद्धा का पात्र नहीं हो सकतीं क्योंकि उनकी माता अनार्य हैं, क्योंकि वह परलोक की नहीं इहलोक की हैं, इसी धरती और जंगल की हैं, आदिवासी हैं. यही कारण है कि गांवों में मनसा देवी की पूजा-अर्चना ब्राह्मण पुजारी परिचालित नहीं करते और न ही पूजा के दौरान संस्कृत मंत्रों का उच्चारण किया जाता है.
मनसा के पुजारी दलित समाज से ही होते हैं जिन्हें देयासी के नाम से जाना जाता है. हां, बांकुड़ा में मनसा देवी के कुछ भव्य मंदिर भी हैं जिन्हें मल्ल राजाओं तथा ज़मींदारों द्वारा भूमि अनुदान भी मिला है तथा जिनकी आमदनी और संपत्ति भी काफ़ी है. कई ज़िलों तथा कलकत्ता में भी ऐसे कुछ विशाल मंदिर हैं. ऐसे बड़े और समृद्ध मंदिरों में हर वर्ग के श्रद्धालु जाते हैं तथा अच्छा ख़ासा चढ़ावा चढ़ता है. इन मंदिरों में ब्राह्मण पुरोहित ही पाए जाते हैं.
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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