यूजीसी नियम: लोकतांत्रिक समाज में समानता और न्याय के प्रति बैर-विरोध क्यों?

लोकतांत्रिक भागीदारी, समानता की भावना और समावेशी समाज बनाने की दिशा में अहम यूजीसी की नियमावली पर इतना हंगामा क्यों हुआ? क्या किसी भी क़ानून के दुरुपयोग की छिटपुट आशंकाओं के आधार पर उस क़ानून द्वारा बेहतरी लाने की कोशिश को ही ख़ारिज कर दिया जाना चाहिए?

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा ‘समानता प्रोत्साहन बिल’ (इक्वालिटी प्रमोशन बिल, 2026) को लागू करने की घोषणा के बाद देश भर से कथित ‘उच्च वर्ण’ के विद्यार्थियों के बीच से जो प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, वे 2005 के दौरान आरक्षण विरोधी आंदोलन की यादें ताज़ा करने वाली हैं.

तब ‘यूथ फॉर इक्वालिटी’ के बैनर तले संगठित होकर मेडिकल की पढ़ाई कर रहे अधिकतर ‘सवर्ण’ विद्यार्थियों ने ओबीसी के आरक्षण के खिलाफ मोर्चाबंदी की थी. यूजीसी के समानता नियम के विरोध में इस बाद तर्क दिया जा रहा है कि इस नियम की परिभाषाओं के अनुसार विश्वविद्यालय परिसरों में ‘सामान्य’ श्रेणी के विद्यार्थी स्वाभाविक ‘अपराधी’ बना दिए गए हैं.

कहने की ज़रूरत है कि यह तर्क न सिर्फ बेतुका है बल्कि भारतीय समाज की एक प्रमुख विशेषता ‘जाति’ से संबंधित विशेषधिकारों के प्रति आपराधिक अवहेलना पर ही टिका हुआ है. यह बुनियादी सार्वभौमिक मानवाधिकारों की निर्मम उपेक्षा तो करता ही है, समसामयिक यथार्थ के प्रति भी अनजान बने रहने का अभिनय करता है.

इस समानता नियम पर जो कड़ा प्रतिवाद देखने को मिल रहा है, उसके सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक पहलुओं पर गौर करने से पहले हमें यह देखना चाहिए कि इस नियम में मुख्यतः कहा क्या गया है?

यह एक तरह से 1948 में ‘मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा पत्र’ की बुनियादी भावना को ही सिंचित करता है, जिसमें कहा गया था कि ‘सभी मनुष्य पैदाइशी तौर पर स्वतंत्र होते हैं और किसी भी व्यक्ति के साथ जन्म, लिंग, भाषा, क्षेत्र, धर्म और नस्ल के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा.’

परिसरों का हाल

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि हमारा समाज बहुसंस्तरीय जातिगत पदानुक्रम पर आधारित है. गणतंत्र के 77 वर्षों बाद भी सामाजिक समानता का लक्ष्य अधिकतर एक मृगमरीचिका जैसा ही है. देश के बहुसंख्य उच्च शिक्षण संस्थानों के परिसर सामाजिक प्रभुता (सोशल हेराइरकी) की संरचना के बारे में यथास्थितिवादी हैं. वे समतामूलक समाज बनाने की दिशा में किसी तरह के प्रगतिशील कदम के धुर-विरोधी हैं.

अभी दिल्ली आईआईटी में जाति-व्यवस्था के बारे में हुई एक अकादमिक संगोष्ठी पर जांच-समिति का गठन किया गया है. मानो, हमारे राष्ट्र-राज्य और समाज की प्रतिगामी संरचनाओं और शक्तियों पर चर्चा करना कोई गुनाह हो!

एशिया के सबसे बड़े आवासीय परिसर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की अंदरूनी स्थितियां और भी खतरनाक हैं. स्नातक के दिनों में हम विद्यार्थियों के बीच यह चर्चा आम थी कि अधिकतर विभाग कथित उच्च जातियों के ‘श्रेष्ठताबोध’ के बजबजाते नाले हैं. यहां तर्क और असहमति की कोई गुंजाइश नहीं होती थी. अधिकतर प्रोफ़ेसर्स अपने जातीय दंभ का अहमक प्रदर्शन करते थे.

पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा से वंचित रहने वाली परंपरागत जातियों के विद्यार्थियों की उच्च शिक्षा में भागीदारी बढ़ रही है. लोकतांत्रिक गोलबंदी ने विश्वविद्यालय परिसरों की समकालीन जनसांख्यिकी को बदला है. इन सभी संदर्भों में हाशिये की जातियों और महिला विद्यार्थियों के लिए अधिकतर उच्च शिक्षा के परिसर एक बेहद घुटनभरा और असुरक्षित वातावरण तैयार करते हैं.

अभी हाल ही में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक में असम के एक विद्यार्थी पर जानलेवा नस्लीय अपराध किया गया. मामला जब सुर्खियों में आया तक विवि प्रशासन कुछ दिखावे भारी कार्यवाहियां करने पर मजबूर हुआ.

यूजीसी ने उच्च शिक्षा परिसरों में समानता को प्रोत्साहित करने के लिए जो नियमावली तैयार की है वो देश भर में उच्च शिक्षा संस्थानों में व्याप्त जातीय दुर्भावना के तथ्यात्मक आंकड़े इकट्ठा करने के बाद की है. ध्यान रखना चाहिए कि इसमें उच्चतम न्यायालय में दाखिल याचिकाओं का भी योगदान है.

इन याचिकाओं के माध्यम से आईआईटी जैसे संस्थानों में व्याप्त आपराधिक जातीय भेदभाव के बाद कई प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की अप्राकृतिक मौतों की रोकथाम के लिए दिशानिर्देश बनाने की मांग की गई थी. स्कूल स्तर पर नवोदय विद्यालयों में भी जातीय दुर्भावना से प्रेरित भेदभाव के ऐसे कई मामले दर्ज हुए हैं.

समानता और न्याय से बैर क्यों?

अब सवाल ये उभरता है कि लोकतांत्रिक भागीदारी, समानता की भावना और समावेशी समाज बनाने की दिशा में इस अहम नियमावली पर इतना हंगामा क्यों हो रहा है? क्या किसी भी कानून के दुरुपयोग की छिटपुट आशंकाओं के आधार पर उस कानून द्वारा बेहतरी लाने की कोशिश को ही खारिज कर दिया जाना चाहिए?

क्या प्रभुतावादी समूहों के प्रतिवाद लोकतांत्रिक विमर्श की संभावना को कमजोर नहीं कर रहे हैं? उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव क्या इक्का दुक्का, असंबद्ध घटनाएं हैं या वे भारतीय समाज की आंतरिक विशेषताओं का ही प्रतिबिंबन हैं? बेहतर, प्रगतिशील और समावेशी गणतंत्र के लिए ये क्यों जरूरी है कि यूजीसी की समानता प्रोत्साहन नियमावली को ‘शब्द और भावना’ दोनों में सही अर्थों में लागू किए जाने के लिए कारगर संस्थानिक प्रणालियां विकसित की जाएं?

मेरी दृष्टि में उपरोक्त कई सवालों के सही-सही जवाब इस तथ्य पर निर्भर करते हैं कि कोई व्यक्ति अपने सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषाधिकारों के प्रति कितना सजग है? अर्थात यह कि आप किस सामाजिक-सांस्कृतिक धरातल पर खड़े हैं, इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है. साथ ही, भारत जैसे बहुलतावादी देश की सांस्कृतिक और समावेशी परंपराओं के कोई प्रति कोई कितना उदार और खुला है, यह प्रस्थान बिंदु भी निर्णायक है.

आपका सामाजिक विशेषाधिकार अगर जातीय दंभ, शोषण और दमन के क्रियान्वयन का उपकरण हैं तो यकीनन आप इन नियमों से असहज होंगे. वरना, अमेरिका के डाइवर्सिटी कानून से तो हमें फायदे चाहिए और अपने यहां आप विविधता का सम्मान और ऐसे संरक्षित संस्थानिक समावेशीकरण का प्रयास करने वाले एक प्रगतिशील नियम के विरोध में खड़े होते हैं!

यह दोहरे मापदंड बताते हैं कि इन प्रतिवाद के पीछे मूल मंशा अपने विशिष्ट सामाजिक विशेषाधिकारों की रक्षा करने की है. वरना, समानता और न्याय के प्रति किसी आधुनिक और तार्किक इंसान का बैर-विरोध कैसे हो सकता है?

जबकि, समानता के उसूलों को लागू करने के लिए एक लंबी जद्दोजहद की भी की गई हो.

लोकतांत्रिक पहल

याद कीजिए, मजदूरों को 8 घंटे काम के नियम कैसे बने? महिलाओं को मताधिकार कैसे हासिल हुआ? भारत में, जिन्हें अछूत कहा गया, उनकी मानवीय गरिमा की बहाली के लिए डॉ. आंबेडकर जैसे लोगों ने कितना न संघर्ष किया? कार्यस्थल पर यौन-उत्पीड़न की रोकथाम के लिए विशाखा गाइडलाइन कैसे बनी? सूचना का अधिकार कानून कैसे बना? शिक्षा का अधिकार कानून कैसे बना? ये सब ऐतिहासिक कार्यभार एक बेहतर लोकतंत्र बनाने की दिशा में मील के पत्थर जैसे हैं.

हालांकि, सभी कानूनों को सच्चे अर्थों में लागू करने की दिशा में अभी भी बहुत से प्रयास किए जाने शेष हैं, लेकिन आज अगर इनके अस्तित्व या अनिवार्यता पर ही कोई सवाल उठाने लगे तो निश्चय ही उसे विश्वसनीय नहीं माना जाता है.

यूजीसी का समानता को प्रोत्साहित करने वाला नियम एक ऐसा ही प्रगतिशील कदम है. बेहतर गणतंत्र बनाने की दिशा में यह एक बहुत जरूरी प्रस्तावना है. इसका खुले दिल से स्वागत किया जाना चाहिए. जो काम स्वतंत्रता प्रति के कुछेक वर्षों के भीतर ही प्राथमिकता से पूरा हो जाना चाहिए था, अगर वह गणतंत्र के 77 वर्षों बाद भी फलीभूत हो रहा है तो यह आश्चर्य मिश्रित खुशी और इतने वर्षों के अनगिनत लोगों के संघर्ष को याद करते हुए ऐसे लोगों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर है.

इससे असहज हो रहे लोगों को घर, परिवार, स्कूल, संस्थान और कार्यालयों में बराबरी, मानवीय गरिमा और परस्पर सम्मान की तहजीब सीखने की कोशिश करनी चाहिए, न कि उन्माद का शिगूफ़ा छोड़ना चाहिए!

हालांकि उच्चतम न्यायालय ने समानता को प्रोत्साहित करने वाली यूजीसी की इस नियमावली पर अस्थायी रोक लगा दी है. साथ ही, कुछ सख्त टिप्पणी भी की है. उम्मीद की जानी चाहिए कि उच्चतम न्यायालय का यह कदम वर्तमान कानून-व्यवस्था की चुनौतियों को ध्यान में रखकर उठाया गया है. न कि अपने पहले के निर्णय का पुनरीक्षण है.

हालांकि, इसके पहले ऐसे मामले आए हैं जब अदालतों ने जनमत के दवाब के आधार पर भी अपने फैसले सुनाए हैं. इस बेहद अनिवार्य और संवेदनशील मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय से अपेक्षा की जाती है कि वो ऐतिहासिक अन्याय की संरचनागत शक्तियों के दबाव में नहीं आएगा.

इस अवसर पर भारत के संविधान के शिल्पी डॉ. बीआर आंबेडकर के उस कथन को भी याद रखना चाहिए जिसमें उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक अनिवार्य शर्त यह बताया था कि वह हरेक मनुष्य की आत्मा का सर्वांगीण उत्थान करे.

संविधान सभा के अपने अंतिम संबोधन में (25 नवंबर 1949 को) उन्होंने कहा था, ‘राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिक नहीं सकता जब तक उसके आधार में सामाजिक लोकतंत्र न हो.’ भारत जैसे गहरी सामाजिक संस्तरीयता वाले देश में यूजीसी की हालिया नियमावली सामाजिक लोकतंत्र की एक आवश्यक पहल है, इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए.

(लेखक हरिदेव जोशी पत्रकारिता और जनसंचार विश्वविद्यालय, जयपुर में पढ़ाते हैं.)