बजट 2026: केंद्र सरकार ने बीते साल सामाजिक योजनाओं पर वादे से कहीं कम ख़र्च किया

केंद्रीय बजट 2026-27 के दस्तावेज़ों से पता चला है कि पिछले वित्त वर्ष में केंद्र सरकार ने सामाजिक क्षेत्र में वादे के मुताबिक़ धनराशि ख़र्च नहीं की है. इससे पहले सरकार की प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं के लिए अपर्याप्त धनराशि आवंटित न करने को लेकर व्यापक आलोचना देखने को मिली थी.

पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में एक निर्माण स्थल पर मजदूर ईंटें ढोते हुए. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: पिछले केंद्रीय बजट 2025-26 में सरकार ने सामाजिक क्षेत्र के खर्च को पर्याप्त रूप से उजागर न कर, प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं के लिए अपर्याप्त धनराशि आवंटित की थी, जिसे लेकर व्यापक आलोचना देखने को मिली थी.

हालांकि, अब केंद्रीय बजट 2026-27 के दस्तावेजों से पता चला है कि केंद्र सरकार ने वादे के मुताबिक धनराशि भी खर्च नहीं की है.

इस संबंध में द वायर ने 20 सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के लिए जारी आंकड़ों का विश्लेषण किया है, जिससे यह चल सके कि सरकार वास्तव में अपने वादों को पूरा कर रही है या नहीं.

रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 के लिए संशोधित अनुमान केवल दो योजनाओं – पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना और मनरेगा – के बजट अनुमानों से अधिक हैं. यह बात चौंकाने वाली है क्योंकि इनमें से एक – मनरेगा – को असल में बंद कर दिया गया है.

मनरेगा की जगह सरकार जिस विकसित भारत ‘जी राम जी’ योजना को लेकर आई है, उसके लिए बजट में 95,692 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं.

हालांकि, सामाजिक कार्यकर्ताओं इस नई योजना को कई महत्वपूर्ण मायनों में अलग बताया है.

उदाहरण के लिए, नई योजना सार्वभौमिक होने के बजाय केंद्र सरकार को उन क्षेत्रों को ‘अधिसूचित’ करने का अधिकार देती है, जहां योजना लागू की जाएगी. इससे विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों के साथ मोदी सरकार के नाजुक संबंधों को देखते हुए गंभीर चिंताएं उत्पन्न हुई हैं.

कई विशेषज्ञों ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने सामाजिक क्षेत्र को प्राथमिकता नहीं दी है, और इस महत्वपूर्ण क्षेत्र पर खर्च स्थिर बना हुआ है.

रविवार को पेश किए गए केंद्रीय बजट 2026-27 से यह स्पष्ट होता है कि इस प्रवृत्ति के न केवल जारी रहने की संभावना है, बल्कि स्थिति और भी बिगड़ सकती है, क्योंकि कई योजनाओं में केंद्र सरकार द्वारा खर्च की गई राशि और वास्तव में खर्च की गई राशि में भारी अंतर दिखाई देता है.

विश्लेषण की गई एक और योजना, पीएम-किसान के लिए बजट अनुमान संशोधित अनुमानों से बिल्कुल मेल खाते हैं. हालांकि, शेष 17 योजनाओं के लिए केंद्र सरकार ने उतना खर्च नहीं किया जितना उसने करने का वादा किया था. कुछ मामलों में बजट अनुमानों और संशोधित अनुमानों के बीच का अंतर बहुत अधिक है.

देश में व्याप्त विभिन्न बुनियादी संकटों पर नज़र रखने वालों के लिए इनमें से कुछ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. उदाहरण के लिए जल जीवन मिशन, जिसे स्वयं मोदी सरकार द्वारा सामाजिक योजनाओं पर किए गए वादे के अनुसार खर्च न करने की बात सर्वविदित है.

अर्थशास्त्री जयति घोष और सीपी चंद्रशेखर ने हाल ही में बताया कि पिछले दशकों में भारत में सामाजिक व्यय में जो वृद्धि हुई है, वह राज्य सरकारों के योगदान से ही संभव हो पाई है क्योंकि केंद्र सरकार से मिलने वाली अनुदान राशि में कमी आई है.

2019 में सभी ग्रामीण भारतीयों को स्वच्छ नल जल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू किया था, पर 67,000 करोड़ रुपये खर्च होने थे. लेकिन संशोधित अनुमानों से पता चलता है कि सरकार ने इस योजना पर केवल 17,000 करोड़ रुपये ही खर्च किए, जिसका उद्देश्य लाखों लोगों के जीवन को बदलना था.

इंदौर की हाल की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्वच्छ नल जल की उपलब्धता कितनी महत्वपूर्ण है, फिर भी इसे प्राथमिकता नहीं दी गई है.

इसी तरह केंद्र सरकार की आवास योजना – ग्रामीण और शहरी दोनों – पर खर्च भी वादों के अनुरूप नहीं रहा. यह इस तथ्य के बावजूद है कि मोदी सरकार ने 2024 में पीएमएवाई-शहरी का ‘2.0’ संस्करण शुरू किया था.

बजट अनुमान पीएमएवाई-शहरी के लिए संशोधित अनुमानों से 19,794 करोड़ रुपये, पीएमएवाई-शहरी 2.0 के लिए 3,200 करोड़ रुपये और पीएमएवाई-ग्रामीण के लिए 22,332 करोड़ रुपये अधिक थे.

गौरतलब है कि मोदी सरकार भले ही जोर-शोर से यह दावा करती हो कि वह कल्याणकारी योजनाओं को गंभीरता से लेती है, लेकिन आज जारी किए गए आंकड़े इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं.